मध्यप्रदेश ने नई एकीकृत मत्स्य नीति-2026 और हजारों करोड़ रुपये के निवेश के साथ “ब्लू इकॉनमी” की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। लेकिन उत्पादन और निवेश केंद्रित इस मॉडल के बीच पारंपरिक मछुआरों के अधिकार, आजीविका, सहकारी व्यवस्था और जलाशयों की पारिस्थितिकी को लेकर गंभीर सवाल भी सामने खड़े हो रहे हैं।
10 जुलाई राष्ट्रीय मत्स्य पालक दिवस
मध्यप्रदेश में हाल ही में अपनी नई एकीकृत मत्स्य नीति 2026 लागू कर मत्स्य क्षेत्र में “ब्लू इकानामी” के एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में विकसित करने की दिशा में बङा कदम उठाया है। इसी क्रम में विगत 6 जुलाई को जबेदी अल कुवैत की अग्रणी कंपनी और कामदार्स केयर इंदौर के बीच मत्स्य पालन के लिये 7 हजार 430 करोड़ रुपये का अनुबंध संपादित हुआ। इस निवेश से इंदिरा सागर, बरगी बाणसागर और बारना जलाशय में केज कल्चर सहित बैकवर्ड और फारवर्ड लिंकेज आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा।
इस मौके पर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि एकिकृत मत्स्योद्योग नीति 2026 के अन्तर्गत गतिविधियों को अंतर्राष्ट्रीय विस्तार दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश में लगभग 15 से 16 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मत्स्य व्यवसाय से जुड़े माने जाते हैं। अधिकांश मछुआरे गरीबी रेखा या उसके आसपास जीवन यापन करते हैं।
बाजार का नियंत्रण ठेकेदारों या मध्यस्थों के पास होने से मछुआरों को वास्तविक लाभ कम मिलता है। जलाशयों को ठेकेदार या बाहरी व्यक्तियों को दिया जाता है। छोटे मछुआरे अधिकार विहीन और ठेकेदारों के अंदर मजदूर बन कर रह जाते हैं। जलाशय के नीलामी में स्थानीय मछुआरा की सहकारी समिति भाग ही नहीं ले पाता है। क्योंकि लीज की दरें बहुत अधिक होती है, प्रक्रियाएं जटिल और सरकारी अधिकारी एवं ठेकेदार के बीच गठजोड़ के कारण गरीब समूह भाग भी नहीं ले पाते। बड़े संविदाकार और मत्स्य विभाग के नियम छोटे मछुआरों को ठेका पद्वति में शामिल होने की संभावना को सीमित करता है।
बाज़ार में दलालों पर निर्भरता, उचित मूल्य का अभाव और मत्स्य भंडारण या कोल्ड चेन न होने से मछली तुरंत बेचनी पड़ती है जो शोषण का मुख्य कारण है। अधिकांश मछुआरे दुर्घटना, मौसम, बाजार से नुकसान में सुरक्षा रहित रहते हैं।
मध्यप्रदेश सरकार ने अपने पिछले 2008 की मछुआरा नीति में बदलाव करते हुए 2026 की नई मछुआरा नीति घोषित किया है। मध्यप्रदेश की 2008 की मछुआरा नीति और 2026 की नई एकीकृत मत्स्य नीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देते हैं। 2008 की नीति मुख्यतः जलाशयों के पट्टा प्रबंधन और पारंपरिक मत्स्य पालन पर केंद्रित थी, जबकि 2026 की नीति आधुनिक तकनीक, उत्पादन वृद्धि, निजी निवेश और व्यावसायिक मत्स्य पालन को बढ़ावा देने वाली नीति के रूप में सामने आई है।
2008 की नीति में मुख्य जोर तालाबों और जलाशयों के पट्टों के वितरण तथा मछुआ सहकारी समितियों की भूमिका पर था। जिला पंचायतों को जलाशय प्रबंधन का अधिकार दिया गया था। 2026 की नीति में मत्स्य क्षेत्र को“एग्री-बिजनेस” और “ब्लू इकॉनमी” के रूप में विकसित करने पर जोर है। इसमें उत्पादन बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और निर्यात क्षमता बढ़ाने की दिशा दिखाई देती है। केज कल्चर का बड़ा विस्तार है जबकि 2008 की नीति में पारंपरिक तालाब आधारित मछली पालन प्रमुख था।
2026 की नीति में बड़े पैमाने पर “केज कल्चर” को बढ़ावा दिया जा रहा है और लगभग एक लाख फिश केज स्थापित करने की योजना बताई गई है। इससे बड़े जलाशयों में औद्योगिक स्तर पर मछली उत्पादन संभव होगा। पुरानी नीति में सहकारी समितियों और स्थानीय मछुआरों की भूमिका अधिक थी। नई नीति में निजी कंपनियों, निवेशकों और आधुनिक एक्वाकल्चर मॉडल को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे मत्स्य पालन का कॉर्पोरेटकरण बढ़ने की संभावना ज्यादा है।
2008 की नीति में तकनीकी पहल सीमित थीं। जबकि 2026 नीति में आधुनिक हैचरी,रिसर्च सेंटर,एकीकृत एक्वा पार्क,फिश फीड, बायोफ्लॉक, डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है। 2008 नीति का उद्देश्य पारंपरिक मछुआ समुदाय की आजीविका सुरक्षा था। प्राकृतिक आपदा होने पर पट्टा राशि में राहत जैसी व्यवस्था भी थी।
2026 नीति में उत्पादन दोगुना करने और राजस्व बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। हालांकि सरकार इसे “मछुआ समृद्धि” से जोड़ रही है। 2008 में जलाशय स्थानीय सहकारी समितियों के नियंत्रण में अधिक थे। 2026 के मत्स्य नीति में बड़े जलाशयों के व्यावसायिक उपयोग, केज कल्चर और अनुबंध आधारित मत्स्य पालन के कारण स्थानीय मछुआरों की पारंपरिक पहुंच सीमित होने की आशंका है।
नई नीति में उत्पादन वृद्धि पर जोर होने से जल प्रदूषण, बाहरी मछली प्रजातियों का उपयोग, जलाशयों का निजीकरण, छोटे मछुआरों का विस्थापन जैसी खतरे संभावित हैं। समग्र रूप से देखें तो 2008 की नीति “सामुदायिक और सहकारी मत्स्य प्रबंधन” आधारित थी, जबकि 2026 की नीति “व्यावसायिक, तकनीक आधारित और निवेश उन्मुख मत्स्य अर्थव्यवस्था” की ओर बढ़ती दिखाई देती है।
नीली क्रांति को बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने इस वर्ष के बजट में मत्स्य उत्पादन क्षेत्र में 412 करोड़ रुपए के निवेश का प्रावधान किया है। मध्यप्रदेश की 2026 की एकीकृत मत्स्य नीति राज्य के मत्स्य क्षेत्र को पारंपरिक आजीविका आधारित व्यवस्था से निकालकर “ब्लू इकॉनमी” और निवेश आधारित व्यावसायिक मॉडल की ओर ले जाती दिखाई देती है।
सरकार उत्पादन वृद्धि, आधुनिक तकनीक, केज कल्चर, निजी निवेश और निर्यात क्षमता को बढ़ाने को विकास का आधार मान रही है। इससे मत्स्य उत्पादन और राजस्व में वृद्धि की संभावनाएं अवश्य बनती हैं, लेकिन इसके साथ कई गंभीर सामाजिक और पारिस्थितिक प्रश्न भी उभर रहे हैं।नई नीति के कारण जलाशयों पर कॉर्पोरेट और ठेकेदार आधारित नियंत्रण बढ़ने, छोटे मछुआरों की पारंपरिक पहुंच सीमित होने तथा सहकारी समितियों की भूमिका कमजोर पड़ने की आशंका है। पहले से ही गरीबी, बाजार शोषण, ऊंची लीज दरों, मध्यस्थों की पकड़ और संसाधनों की कमी से जूझ रहे लाखों मछुआरों के लिए यह परिवर्तन आजीविका संकट को और गहरा कर सकता है। दूसरी ओर केज कल्चर, बाहरी प्रजातियों के उपयोग, जल प्रदूषण, बांधों, फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं और अवैज्ञानिक मत्स्य प्रबंधन से जलाशयों की पारिस्थितिकी तथा जैव विविधता पर भी खतरा बढ़ रहा है। नर्मदा की महाशीर जैसी प्रजातियों का संकट इस पर्यावरणीय असंतुलन की गंभीर चेतावनी है। इसलिए आवश्यक है कि मत्स्य क्षेत्र का विकास केवल उत्पादन और निवेश के आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें पारंपरिक मछुआ समुदायों के अधिकार, आजीविका सुरक्षा, सहकारी प्रबंधन, जलाशयों की पारिस्थितिक रक्षा और सामाजिक न्याय को भी समान महत्व दिया जाए।
यदि नीति निर्माण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारदर्शी पट्टा व्यवस्था, उचित बाजार संरचना, कोल्ड चेन, बीमा सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन को केंद्र में नहीं रखा गया, तो “नीली क्रांति” का लाभ सीमित समूहों तक सिमट सकता है और पारंपरिक मछुआ समुदाय हाशिए पर चले जाएंगे। महिलाओं की भूमिका मछली प्रसंस्करण और विपणन में महत्वपूर्ण होने के बावजूद निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। मध्यप्रदेश कि राज्य मत्स्य महासंघ द्वारा 7 बङे और 19 मझौले मिलाकर कुल 26 जलाशयों का नियंत्रण किया जाता है। जिसका कुल क्षेत्रफल 2.29 लाख हेक्टेयर है। जिला पंचायतों के 79 और ग्राम पंचायतों के अन्तर्गत 3484 तालाब हैं। प्रदेश में 3.56 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र (जिसमें राज्य मत्स्य महासंघ के 26 जलाशय, पोखर और तालाब शामिल है) है, इसमें से 3.49 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र में मछली पालन किया जाता है।विधानसभा में पुछे गए सवाल के जबाब अनुसार मध्यप्रदेश के विभिन्न जलाशयों एवं तालाबों से विगत तीन वित्तीय वर्षो में 2019-20 में 3340.00, 2020-21 में 4538.197 और 2021-22 में 5381.00 मेट्रिक टन मत्स्य उत्पादन हुआ था।
बरगी जलाशय में सिवनी, मंडला और जबलपुर जिले के 54 प्राथमिक मछुआरा सहकारी समिति मत्स्याखेट कार्य करती है। परन्तु विगत पांच वर्षों से जलाशय में मत्स्य उत्पादन में भारी गिरावट के कारण सैकड़ों मछुआरे रोजगार के लिए पलायन को बाध्य होते हैं। मछुआरे काम की तलाश में बाणसागर जलाशय शहडोल, माचागोरा जलाशय छिंदवाड़ा और भीमगढ़ जलाशय सिवनी निकल जाते हैं।जहां ठेकेदार बहुत ही कम दरों पर मत्स्याखेट करा कर मछुआरों का आर्थिक शोषण करता है। जबकि 90 के दशक में मध्यप्रदेश के बरगी और तवा जलाशय में मत्स्याखेट का चर्चीत सहकारी मॉडल देश के महत्वपूर्ण सामुदायिक मत्स्य प्रबंधन प्रयोगों में माना जाता है।
नर्मदा नदी पर निर्मित इस विशाल जलाशय ने विस्थापन और आजीविका संकट के बीच स्थानीय मछुआ समुदायों को रोजगार का एक बड़ा आधार प्रदान किया। विशेष रूप से प्राथमिक मछुआ सहकारी समितियों के माध्यम से जलाशय आधारित मत्स्य उत्पादन और विपणन का जो ढांचा विकसित हुआ, उसने हजारों परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराया। इस मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें मछुआरों को केवल मजदूर नहीं बल्कि संसाधन प्रबंधन का सहभागी माना गया। सहकारी समितियां मत्स्य बीज संचयन, मत्स्याखेट, उत्पादन प्रबंधन और विपणन जैसे कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाती थीं। इससे स्थानीय स्तर पर सामूहिक स्वामित्व और आर्थिक भागीदारी की भावना विकसित हुई।आज जब नई मत्स्य नीतियों में केज कल्चर, निजी निवेश और व्यावसायिक उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, तब बरगी और तवा जलाशय का अनुभव यह संकेत देता है कि विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें उत्पादन वृद्धि के साथ स्थानीय मछुआरों के अधिकार, रोजगार और जलाशयों की पारिस्थितिकी भी सुरक्षित रहे। बरगी और तवा का सहकारी प्रयोग नीली क्रांति को सामाजिक न्याय और सामुदायिक भागीदारी से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यप्रदेश के पारम्परिक मछुआरे राज्य की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण भागीदार हैं, लेकिन उनकी आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक वंचना और संसाधनों पर घटते अधिकार गंभीर चिंता का विषय हैं। समावेशी नीतियों, संसाधनों पर न्यायपूर्ण अधिकार और आजीविका सुदृढ़ीकरण के माध्यम से ही उनके जीवन स्तर में स्थायी सुधार संभव है।

