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‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?

‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?
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क्या किसी नागरिक की पहचान उसके जीवन, समाज और इतिहास से तय होगी या केवल सरकारी अभिलेखों से? वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का मामला इस प्रश्न को नई गंभीरता से सामने लाता है। जब पासपोर्ट, आधार और मतदाता पहचान पत्र भी नागरिकता के पर्याप्त प्रमाण नहीं माने जाएं, तब चिंता केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की है जिसकी पहचान कागज़ों के भरोसे खड़ी है।


बात कोलकाता के प्रसिद्ध सत्ता-विरोधी अंग्रेज़ी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ के पूर्व संपादक-पत्रकार आर राजगोपाल की पीड़ा से शुरू करते हैं।राजगोपाल की पीड़ा हालाँकि काफ़ी चर्चा में आ चुकी है फिर भी मूल विषय को आगे बढ़ाने के लिए उसका उल्लेख ज़रूरी है।

पश्चिम बंगाल में हुए हाल के विधानसभा चुनावों में SIR के तहत जिन लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से बाहर कर दिये गए थे उनमें एक नाम राजगोपाल का भी था। इसके चलते उनके पासपोर्ट का नवीवीनीकरण नहीं हो सका। देश का नागरिक होते हुए भी राजगोपाल को नया पासपोर्ट अपनी सिटीजनशिप को प्रमाणित करने के लिए नहीं चाहिए था।वे उसे अपनी पत्रकार बेटी के विवाह में शामिल होने सेनफ़्रांसिस्को पहुँचने के लिये चाहते थे।

नवीनीकृत पासपोर्ट के लिए उनकी सारी अपीलें ठुकरा दी गई। ऐसा इसलिए किया गया कि 2002 की मतदाता सूची में न उनका नाम मिला और न ही उनके पिता का। राजगोपाल के पिता एक गांधीवादी, सेवा-निवृत प्रोफेसर और केरल में गांधी स्मारक निधि के राज्य सचिव रह चुके हैं। उनका 2016 में निधन हो चुका है।

डेढ़ सौ करोड़ के भारत देश में सिर्फ़ बारह-तेरह करोड़ लोगों के पास ही पासपोर्ट है।यानी सौ लोगों में सिर्फ़ आठ या नौ के पास।उसके बावजूद एक संपादक के साथ क्या हो सकता है यह उसकी कहानी है। वे करोड़ों लोग जिनके पास कोई काग़ज़ ही नहीं है उनकी व्यथा की केवल कल्पना ही की जा सकती है।क़ानूनन कहा जाए तो पासपोर्ट भी केवल एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, अपने आपको देश का नागरिक सिद्ध करने  का प्रमाणपत्र नहीं !

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केवल पासपोर्ट ही नहीं ! आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, या राशन कार्ड भी देश का नागरिक होने का क़ानून-सम्मत दस्तावेज़ नहीं माना गया है। भारत का वैध नागरिक होने अथवा बनने की क़ानून-सम्मत अहर्ताएं 1955 के सिटीज़न्स एक्ट में वर्णित है। वर्तमान सरकार उन्हीं अहर्ताओं का सख़्ती से पालन करवाना चाहती है।

जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को  परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने के लिए कि गवर्नेंस पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है ?

हुकूमत क़तई चिंतित नज़र नहीं आती कि लाखों की संख्या में हर साल पढ़े-लिखे और सामर्थ्य लोग क्यों भारत की नागरिकता को त्याग कर विदेशों में बसने रवाना हो रहे हैं।कोई तो बात होगी कि जो बाहर जा चुके हैं वापस नहीं लौटना चाहते और जो हैं वे जा रहे हैं।इन जाने वालों को प्रधानमंत्री देश में नहीं रोकते पर अपनी विदेश यात्राओं के दौरान ‘इंडियन डायस्पोरा’ के साथ मन की बात में उनसे स्वदेश लौटने की अपील ज़रूर करते हैं !

व्यवस्था ने अपने आपको इतना अधिकार-संपन्न कर लिया है कि वह न सिर्फ़ नया पासपोर्ट जारी करने अथवा उसका नवीनीकरण करने से इंकार कर सकती है, जन्म से देश में रह रहे प्रत्येक नागरिक की भारतीयता को चुनौती भी दे सकती है ! संबंधित व्यक्ति भारत का नागरिक है ऐसा उसे ही क़ानूनी आवश्यकताओं के आधार पर साबित करना होगा।

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एक ऐसी स्थिति अगर उत्पन्न हो जाए तो क्या होगा कि लाखों-करोड़ों की संख्या में देशवासियों को भारत का वैध नागरिक मानने से इनकार कर दिया जाए ? इतना ही नहीं ! इनमें भी एक बड़ी तादाद उन अल्पसंख्यकों की हो जिन्हें हिन्दूवादी सत्ता अपना नागरिक मानने से ही इंकार करती है।उनके नुमाइंदों को संसद और विधानसभाओं में नहीं भेजती। एक उल्लेखनीय संख्या उन सेक्युलर अथवा हिंदुओं की भी हो जिन्हें सत्ता-विरोधी मानकर लगातार चिन्हित किया जा रहा हो !

तो क्या ऐसे तमाम लोग अपने ही मुल्क में शरणार्थी करार दिये जाएँगे ? ऐसे शरणार्थी जिन्हें जीने का अधिकार तो प्राप्त होगा पर वोट डालकर सरकारें नहीं चुन सकेंगे, उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे ! विदेशों की यात्राएँ नहीं कर सकेंगे ! राजगोपाल की तरह अपने बच्चों से नहीं मिल सकेंगे !

जो कहा जा रहा है वह काल्पनिक और अतिरंजित भी हो सकता है ! सचाई यह भी है कि काल्पनिक भय तभी जन्म लेते हैं जब जो उपस्थित है उसके प्रति अविश्वास पुख़्ता होने लगता है।

धर्म के आधार पर किए गए बटवारे के बाद क्या मुल्क को किसी नए विभाजन की तरफ़ ले जाया जा रहा है ? वह यह कि एक ही मुल्क में रहने वाले कुछ लोग वोटर और नागरिक होंगे और शेष अनागरिक, शरणार्थी अथवा घुसपैठिए !

लेखक का परिचय

श्रवण गर्ग

करीब चार दशक के पत्रकारीय जीवन में आपका अधिकांश पत्रकारीय जीवन हिन्दी जगत में ही बीता है। आप 1972 से 1977 तक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सानिध्य में रहे। वे बिहार में करीब सालभर जयप्रकाश नारायण के साथ रहे। विभिन्न अखबारों में विभिन्न पदों पर काम किया। जीवन के पत्रकारिता के सफर का प्रारंभिक दौर सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) से शुरू हुआ उसके बाद सर्वोदय प्रजानीति, आसपास, फायनेंशियल एक्सप्रेस, नईदुनिया, फ्री प्रेस जनरल, एमपी क्रॉनिकल, शनिवार दर्पण, दैनिक भास्कर, दिव्य भास्कर और फिर नईदुनिया के प्रधान सम्पादक पद तक पहुंचा। आजकल स्‍वतंत्र रूप से लेखन कर्म जारी है।

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