समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके मूल रूप में वापस लाने की पहल ने आज एक कमाल रच दिया है। क्या ऐसा हम भारतीय भी नहीं कर सकते? खासकर उस भारत में जिसे दुनिया का सर्वाधिक गर्म देश घोषित किया जा चुका हो?
अमेरिका का सबसे अधिक देखा जाने वाला ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ राष्ट्रीय उद्यान अपालाचियन पर्वतमाला में धुंध से ढकी घाटियों, हरित वनों और नीले पर्वतों का अद्भुत संसार रचता है। वृक्षों से उठने वाले प्राकृतिक वाष्प और आर्द्रता के कारण पर्वतों पर छाई नीली धुंध इन्हें ‘स्मोकी’ रूप देती है, मानो धरती ने अपना कोई स्वप्नलोक रच लिया हो। टेनेसी और नॉर्थ कैरोलिना की सीमाओं पर फैला यह ‘राष्ट्रीय उद्यान’ दोनों प्रांतों का हरित फेफड़ा है, जो प्रकृति, जैव-विविधता और इतिहास को जीवन प्रदान करता है। कभी ‘चेरोकी’ जनजाति का निवास रहा यह विशाल वन-प्रदेश अनेक पुष्पीय पौधों, वृक्ष प्रजातियों, पशु और पक्षियों का आश्रय है, जिसकी जैविक समृद्धि अत्यंत विलक्षण है।
विगत सदी में औद्योगीकरण और अंधाधुंध कटाई से यह क्षेत्र गंभीर संकट में पड़ गया था। तब प्रकृति-प्रेमियों और स्थानीय समुदायों के प्रयासों से अमेरिकी कांग्रेस ने कानून बनाकर 15 जून 1934 को ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स नेशनल पार्क’ की स्थापना की, जिसने इस पर्वतीय धरा को विनाश से बचा लिया। आज पार्क के ‘आगंतुक केंद्र’ पर्यावरण और पारिस्थितिकी का प्रशिक्षण देकर संरक्षण के लक्ष्य को साकार कर रहे हैं।
इन पर्वतों की पहचान इनके अद्भुत, बहुस्तरीय प्राचीन वनों से है। यहाँ केवल विशाल वृक्ष ही नहीं, बल्कि उनके बीच फैली लताएँ, झाड़ियाँ और भूमि-आवरण भी एक जीवित पारिस्थितिक संसार का निर्माण करते हैं। ‘लिटिल रिवर,’ ‘ओकोनालुफ्टी नदी’ और ‘डीप क्रीक’ जैसी जलधाराएँ तथा अनेक जलप्रपात इन वनों को निरंतर आर्द्रता और जीवन प्रदान करते हैं। वन‑पथ पर चलते हुए प्रतीत होता है कि प्रकृति ने हरियाली को कई स्तरों पर सजाया है।
ये पर्वत केवल वन नहीं, बल्कि ऊँचाइयों के साथ बदलती वनस्पतियों का जीवित संसार हैं। ऊँचे क्षेत्रों में लाल-स्प्रूस और फ्रेजर-फर के सदाबहार वृक्ष धुंध के बीच गहरे हरे प्रहरी जैसे दिखाई देते हैं। मध्यम ऊँचाइयों पर लाल-मेपल अपनी विशिष्ट पत्तियों के साथ आकर्षित करता है। अमेरिकी-बीच अपनी चिकनी धूसर छाल से आसानी से पहचाना जाता है। घाटियों और नदी तटों पर पीले‑हरे पुष्पों वाला ऊँचा, सीधा ट्यूलिप-पॉपलर, देवदार‑सा आभास देने वाला ईस्टर्न-हेमलॉक और पत्तियों के निचले भाग पर चाँदी‑सी चमक लिए सफेद-ओक शीतल छाया बिखेरते हैं। वाइल्ड-ग्रेपवाइन जैसी जंगली लताएँ वृक्षों पर चढ़कर जंगलों को रहस्यमयी हरित रूप देती हैं, और कई स्थानों पर पुराने वृक्षों को पूरी तरह ढँक लेती हैं।
सघन वनों में कई बार दो वृक्ष वर्षों तक रगड़ खाते‑खाते आपस में जुड़ जाते हैं। ‘इनोस्कुलेशन’ कहलाने वाली इस प्रक्रिया में दोनों तने एक हो जाते हैं। ‘स्मोकी’ पर्वतों में यह दृश्य सामान्य है और प्रकृति के सह‑अस्तित्व का सुंदर प्रतीक है। वसंत में ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ का जल-जगत भी रंगों और जीवन से भर उठता है। यहाँ की मछलियाँ प्रजनन काल में रंग बदलकर साथी को आकर्षित करती हैं या नदी की तलहटी में कंकड़ों से घोंसले बनाती हैं। इस प्रकार वसंत वनस्पतियों के साथ जल के भीतर भी नवजीवन और पुनर्सृजन की ऋतु बनकर उतरता है।
वसंत आते ही यह प्रदेश पुष्पों का जीवित उत्सव बन उठता है। ‘डॉगवुड,’ माउंटेन-लॉरेल, सर्विसबेरी और रोडोडेंड्रॉन के फूल धुंध और वर्षा से भीगे वनों को रंगों और सुगंध से भर देते हैं। प्रतीत होता है जैसे प्रकृति ने स्वयं इन पर्वतों पर रंगत बिखेर दी हो। इस समूचे पारिस्थितिकी-तंत्र की आधारशिला मधुमक्खियाँ हैं, जिनके परागण से फल, बीज और जीवन की पूरी श्रृंखला चलती रहती है। मधुमक्खियों का शहद काले भालुओं के सबसे प्रिय आकर्षणों में से एक है।
इस पर्वतमाला का वास्तविक सौंदर्य पतझड़ में प्रकट होता है। सितंबर के अंत से नवंबर तक शरद ऋतु में यह पर्वतमाला लाल, सुनहरे, ताम्र और नारंगी रंगों की अद्भुत चित्रावली बन जाती है। लाल-मेपल की रक्तिम पत्तियाँ, शुगर-मेपल के सुनहरे-नारंगी स्वर तथा बीच और बर्च के तीव्र रंग परिवर्तन पूरे परिदृश्य को जीवंत बना देते हैं, जबकि सदाबहार चीड़ और फर का गहरा हरा रंग इनके बीच सुंदर विरोधाभास रचता है। ऊँचाई और तापमान के अंतर के कारण पत्तियाँ अलग-अलग समय पर रंग बदलती हैं—ऊँचे क्षेत्रों में यह प्रक्रिया पहले शुरू होकर धीरे-धीरे घाटियों तक उतरती है, जिससे लगभग डेढ़ महीने तक यह प्राकृतिक रंगोत्सव बना रहता है।
इस ‘राष्ट्रीय उद्यान’ का प्रमुख वन्यजीवन पूरे पार्क में पाए जाने वाले काले भालू हैं। शक्ति के प्रतीक ये बुद्धिमान और अनुकूलनशील स्तनधारी जीव फुर्ती से पेड़ों पर चढ़ते और जंगलों में शांतिपूर्वक विचरण करते हैं। सुबह की धुंध में चरते एल्क इस पर्वतीय क्षेत्र के विशाल शाकाहारी जीव हैं, जिनके बड़े सींग उन्हें राजसी आभा देते हैं। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुँचे इन जीवों का पुनर्वास पर्यावरण संरक्षण की महत्वपूर्ण सफलता है।
‘केड्स-कोव’ जैसी घाटियों में आज भी पुराने लकड़ी के घर, लोकसंगीत, हस्तनिर्मित काष्ठ-शिल्प और ग्रामीण जीवन की झलक सुरक्षित है। ये इस बात के प्रमाण हैं कि कभी मनुष्य प्रकृति के साथ सीमित संसाधनों में भी संतुलित जीवन जीता था। ‘स्मोकी पर्वतों’ की यात्रा में प्रकृति के साथ भोजन का आनंद भी घुला रहता है—स्मोक्ड पोर्क बारबेक्यू, बेक्ड बीन्स, स्थानीय ब्रुअरी-वाइनरी और ताज़ी आइसक्रीम इस पर्वतीय अनुभव को स्वाद का उत्सव बना देते हैं।
‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ के मनोहारी विस्तार से गुजरने वाला ‘ब्लू-रिज पार्कवे’ स्थानीय पर्यटन और साहसिक गतिविधियों को गति देने के साथ अद्भुत दृश्य भी प्रदान करता है। यह सड़क अमेरिका के आर्थिक इतिहास का प्रतीक है—1935 में ‘वैश्विक मंदी’ के दौर में शुरू हुई इस परियोजना ने हजारों लोगों को रोजगार दिया और कठिन पर्वतीय भू‑भाग में प्राकृतिक सौंदर्य को संरक्षित रखते हुए 52 वर्षों में पूर्ण हुई।
जब ‘स्मोकी’ पर्वतों की धुंध से ढकी घाटियों पर दृष्टि जाती है, तो अनायास भारत का मेघालय स्मरण हो उठता है, जहाँ बादल धरती की गोद में उतर आते हैं। इसी अनुभूति में नीलगिरि की नीलिमा और यूकेलिप्टस की सुगंध भी ‘स्मोकी’ पर्वतों की ‘ब्लू स्मोक’ धुंध से एक अद्भुत साम्य रचती प्रतीत होती हैं। इसी प्रकृति-रस में डूबा मन भवानी प्रसाद मिश्र की अमर पंक्तियाँ भी धीरे-धीरे गुनगुनाने लगता है—‘सतपुड़ा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए से उंघते अनमने जंगल।’इन पर्वतों की धुंध और निस्तब्धता में चलते हुए मन लौट‑लौटकर यही कहता है कि प्रकृति से हमारा रिश्ता संरक्षण से ही जीवित रहता है। आज जलवायु परिवर्तन, कीट‑संक्रमण और बढ़ते पर्यटन दबाव के बीच पारिस्थितिक संतुलन बचाए रखना चुनौतीपूर्ण है। सभ्यता का सौंदर्य विकास और संरक्षण के संतुलन में ही निहित है — पर्वत, जंगल, नदियाँ और वन्यजीव पर्यटन की वस्तुएँ नहीं, पृथ्वी की जीवित स्मृतियाँ हैं जिन्हें सुरक्षित रखना अगली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। (सप्रेस)


