कम उपभोग, ज्यादा संरक्षण : यही है शून्य अपशिष्ट का मंत्र

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हर वर्ष 30 मार्च को मनाया जाने वाला ‘अंतरराष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस’ पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली का वैश्विक संदेश देता है। इसका उद्देश्य कचरा कम करना, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना है। बढ़ते प्लास्टिक उपयोग और खाद्य अपशिष्ट के बीच यह दिवस ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ अपनाकर संसाधनों के संरक्षण और भविष्य सुरक्षित करने की प्रेरणा देता है।


30 मार्च : अंतरराष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस

सुनील कुमार महला

हर वर्ष 30 मार्च को ‘अंतरराष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस’ मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य केवल धरती या अंतरिक्ष से कचरा कम करना ही नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पर्यावरण व हमारी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के प्रति व्यापक जागरूकता फैलाना और मानव जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाना है। यह दिवस कचरा प्रबंधन(वेस्ट मैनेजमेंट) करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक ऐसा वैश्विक आह्वान है, जो हमें टिकाऊ(सस्टेनेबल) और संतुलित जीवन(बैलेंस्ड लाइफ) की ओर प्रेरित करता है। इसका एक महत्वपूर्ण लक्ष्य पूरी दुनिया को ‘प्लास्टिक-मुक्त अर्थव्यवस्था’ की दिशा में ले जाना भी है, जहाँ पैकेजिंग के लिए मशरूम या समुद्री शैवाल जैसे व अन्य किन्हीं प्राकृतिक व बेहतरीन विकल्पों का उपयोग किया जा सके।

आज पूरी दुनिया की जनसंख्या बहुत ही तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ ही धरती पर व अंतरिक्ष तक में भी कचरे की मात्रा भी निरंतर बढ़ती जा रही है।सीधे शब्दों में कहें तो यह दिवस हमें कचरे को कम करने, पुनः उपयोग (री-यूज) और पुनर्चक्रण (री-साइक्लिंग) के महत्व को समझाने के लिए समर्पित है। सच तो यह है कि यह ‘रिड्यूस, री-यूज और रीसायकल’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। वर्तमान समय में प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग पृथ्वी के पर्यावरण और हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। ऐसे में यह बहुत ही आवश्यक व जरूरी है कि हम खाद्य अपशिष्ट को कम करें और धरती के सभी प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करें।

यह एक चिंताजनक तथ्य है कि हम हर वर्ष अरबों टन कचरा उत्पन्न करते हैं, लेकिन उसका बहुत कम हिस्सा ही पुनर्चक्रित कर पाते हैं। वास्तव में ‘शून्य अपशिष्ट’(जीरो वेस्ट) का अर्थ है ऐसी जीवनशैली अपनाना, जिसमें कचरा लगभग समाप्त हो जाए। इसका सीधा सा आशय यह है कि हम संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करें, उन्हें संरक्षित रखें और भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनाएं।कहना ग़लत नहीं होगा कि कचरे और जलवायु परिवर्तन के बीच गहरा संबंध है। कचरे की बढ़ती मात्रा ग्लोबल वार्मिंग को भी बढ़ाती है।

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एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार शहरी ठोस कचरा वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 3-5% हिस्सा है। जब जैविक कचरा, जैसे भोजन, लैंडफिल में सड़ता है, तो वह मीथेन गैस उत्पन्न करता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से गर्मी को अवशोषित करती है।

वास्तव में, यह दिवस उन लाखों अनौपचारिक श्रमिकों के योगदान को भी मान्यता देता है, जो कचरा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज दुनिया भर में लगभग 2 करोड़ लोग इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। साथ ही, यह दिवस उन कंपनियों की नीतियों पर भी प्रश्न उठाता है, जो जानबूझकर ऐसे उत्पाद बनाती हैं जो जल्दी खराब हो जाते हैं, ताकि उपभोक्ता बार-बार नए उत्पाद खरीदें। इसके समाधान के रूप में ‘राइट टू रिपेयर’ यानी मरम्मत का अधिकार एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा है, जो वस्तुओं के जीवनकाल को बढ़ाने पर जोर देता है।शून्य अपशिष्ट का एक अहम पहलू ‘कंपोस्टिंग’ भी है।

हमारे कुल कचरे का लगभग 50% हिस्सा जैविक होता है, जिसे खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे न केवल मीथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता घटती है। कचरा प्रबंधन में घरों, उद्योगों, सरकारों और आम नागरिकों हम सभी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण व अहम् है।

उल्लेखनीय है कि इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई थी। इसका प्रस्ताव तुर्की ने रखा था और इसे अनेक देशों का समर्थन प्राप्त हुआ। यह पहल संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और संयुक्त राष्ट्र मानव बस्तियां कार्यक्रम (यूएन-हेबीटेट) के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। यह भी उल्लेखनीय है कि पहली बार यह दिवस 30 मार्च 2023 को मनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य ‘लीनियर इकोनॉमी’ (बनाओ-इस्तेमाल करो-फेंक दो) की जगह ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ को बढ़ावा देना है। हर वर्ष इस दिवस की एक विशेष थीम निर्धारित की जाती है। वर्ष 2025 की थीम का उद्देश्य कपड़ा उद्योग में उत्पन्न होने वाले कचरे को कम करना था, क्योंकि ‘फास्ट फैशन’ के कारण हर वर्ष करोड़ों टन कपड़े बेकार हो जाते हैं। इसके समाधान के रूप में ‘स्लो फैशन’ और टिकाऊ फैशन को बढ़ावा दिया गया। इस साल यानी कि वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम ‘खाद्य अपशिष्ट’ रखी गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य भोजन की बर्बादी को रोकना है।

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आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष दुनिया में लगभग 1 अरब टन भोजन बर्बाद हो जाता है। यह न केवल भूख की समस्या को बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर भी गंभीर प्रभाव डालता है। अनुमान है कि विश्व में उत्पादित कुल भोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा व्यर्थ चला जाता है। यदि ‘फूड वेस्ट’ एक देश होता, तो यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक होता।

वर्ष 2026 की एक लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, यदि भोजन की बर्बादी को रोक दिया जाए, तो दुनिया के हर भूखे व्यक्ति का पेट चार बार भरा जा सकता है। इस वर्ष का संदेश स्पष्ट है- हमें जितनी आवश्यकता हो, उतना ही भोजन लें, शेष भोजन का पुनः उपयोग करें या दान करें, और जूठन न छोड़ें। साथ ही, खाद्य पदार्थों का उचित भंडारण भी आवश्यक है।

‘जीरो वेस्ट’ की अवधारणा 5R सिद्धांत पर आधारित है—रिफ्यूज (मना करना), रिड्यूस (कम करना), री-यूज (पुनः उपयोग), रीसायकल (पुनर्चक्रण) और रोट (खाद बनाना)।पाठकों को बताता चलूं कि कचरा कम करने का सीधा संबंध जल संरक्षण से भी है। उदाहरण के लिए, यदि हम एक कॉटन टी-शर्ट को फेंकने के बजाय पुनः उपयोग करें, तो लगभग 2700 लीटर पानी बचाया जा सकता है, जो एक व्यक्ति की लगभग ढाई वर्ष की पीने की आवश्यकता के बराबर है। आज दुनिया के कुछ शहर, जैसे सैन फ्रांसिस्को और सियोल, ‘जीरो वेस्ट’ शहर बनने की दिशा में अग्रणी हैं और उन्होंने लैंडफिल में जाने वाले कचरे को लगभग 80% तक कम कर दिया है। शून्य अपशिष्ट का अर्थ कंजूसी नहीं, बल्कि रचनात्मकता है। यह हमें सिखाता है कि हम वस्तुओं के मालिक नहीं, बल्कि उनके उपयोगकर्ता हैं।

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बहरहाल, लैंडफिल से निकलने वाला ‘लीचेट’ नामक जहरीला तरल भूजल को प्रदूषित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, शोध बताते हैं कि 1 टन ई-वेस्ट से 1 टन सोने के अयस्क की तुलना में अधिक सोना निकाला जा सकता है। शून्य अपशिष्ट नीतियां स्थानीय रोजगार भी बढ़ाती हैं-मरम्मत, पुनः उपयोग और रीसाइक्लिंग से 10 से 50 गुना अधिक रोजगार सृजित होते हैं। निष्कर्षतः, कचरा कोई प्राकृतिक वस्तु नहीं, बल्कि मानवीय भूल का परिणाम है।

अब समय आ गया है कि हम ‘उपभोक्ता’ से ‘संरक्षक’ बनें। यह दिवस हमें सिखाता है कि पृथ्वी के पास हमारी जरूरतों के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारी लालच के लिए नहीं। करोड़ों लोगों के छोटे-छोटे प्रयास मिलकर एक बड़े वैश्विक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

भारतीय पारंपरिक जीवनशैली-जैसे पत्तलों में भोजन, मिट्टी के कुल्हड़, और पुराने कपड़ों से उपयोगी वस्तुएं बनाना-पहले से ही ‘प्रोटो-जीरो वेस्ट’ के उदाहरण रहे हैं। आज आवश्यकता है कि हम इन परंपराओं को आधुनिक रूप में अपनाएं। धरती ही नहीं, आज ‘स्पेस जंक’ भी एक उभरती हुई समस्या है, जिससे स्पष्ट होता है कि शून्य अपशिष्ट की अवधारणा अब पृथ्वी से आगे अंतरिक्ष तक फैल चुकी है।

एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक लैपटॉप या स्मार्टफोन के निर्माण में उसके वजन से कई गुना अधिक कचरा उत्पन्न होता है, जो हमारे ‘अदृश्य पर्यावरणीय पदचिह्न’ को दर्शाता है। यह दिवस ‘रिपेयर कल्चर’ को पुनर्जीवित करने का संदेश भी देता है। एक गंभीर तथ्य यह है कि हम हर सप्ताह औसतन एक ‘क्रेडिट कार्ड’ के बराबर प्लास्टिक अपने शरीर में ले रहे हैं। इस प्रकार, शून्य अपशिष्ट केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।

अंततः, यह दिवस हमें सिखाता है कि समाधान लैंडफिल में नहीं, बल्कि हमारी दैनिक आदतों-जैसे समझदारी से खरीदारी करना, भोजन की बर्बादी रोकना और कचरे का सही प्रबंधन करना-में निहित है। यह एक ऐसी जीवनशैली की ओर वापसी का संदेश है, जो सरल, संतुलित और प्रकृति के अनुरूप हो।

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