पश्चिम-एशिया में युद्ध : संकट में ऊर्जा

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पश्चिम एशिया में मची भारी उठा-पटक ने कई मानवीय त्रासदियों के साथ ऊर्जा संकट को भी गहरा दिया है। भारत जैसे, अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए करीब 90 फीसद आयात पर निर्भर देश इस मारा-मार में भारी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। भारत पर क्या होगा, पश्चिम एशिया के संकट का असर?


अशोक चौधरी

आज की दुनिया को अक्सर “वैश्विक गांव” कहा जाता है। तकनीक, व्यापार और संचार के विस्तार ने देशों को इतना परस्पर जुड़ा हुआ बना दिया है कि विश्व के किसी भी हिस्से में घटित घटना का प्रभाव सीमाओं से परे जाकर अन्य देशों तक पहुंच जाता है। पश्चिम-एशिया में हाल ही में बढ़े सैन्य तनाव और युद्ध की स्थिति ने इस वास्तविकता को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और उसके बाद उत्पन्न भू-राजनीतिक संकट ने केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित किया है। इसका असर भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देशों पर विशेष रूप से दिखाई दे रहा है।

पश्चिम एशिया विश्व की ऊर्जा राजनीति का केंद्र माना जाता है। तेल और गैस के विशाल भंडार के कारण यह क्षेत्र दशकों से वैश्विक अर्थव्यवस्था की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहा है, लेकिन जब भी इस क्षेत्र में संघर्ष या अस्थिरता पैदा होती है, तो उसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। वर्तमान संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में बाधा उत्पन्न हुई है, जिसका प्रभाव कई देशों के साथ-साथ भारत पर भी दिखाई देने लगा है। भारत में ‘एलपीजी’ (लिक्वीफाइड पैट्रोलियम गैस) गैस-सिलेंडरों की आपूर्ति में देरी, बुकिंग की अवधि में वृद्धि और होटल-रेस्टोरेंट उद्योग में गैस की कमी जैसी समस्याएँ इसी व्यापक संकट की ओर संकेत करती हैं।

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भारत की ऊर्जा संरचना को समझे बिना इस समस्या की गंभीरता को नहीं समझा जा सकता। भारत विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है, लेकिन उसकी घरेलू ऊर्जा उत्पादन क्षमता अभी भी सीमित है। ‘एलपीजी’ की मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है और इन आयातों का अधिकांश भाग पश्चिम एशियाई देशों से आता है। ऐसी स्थिति में यदि उस क्षेत्र में युद्ध या परिवहन मार्गों में बाधा उत्पन्न होती है, तो उसका सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ना स्वाभाविक है।

भारत में रसोई गैस केवल एक घरेलू ईंधन नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। पिछले दशक में विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से करोड़ों परिवारों को ‘एलपीजी’ कनेक्शन उपलब्ध कराया गया है। इससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम हुई है, लेकिन इस बढ़ती सहूलियत के साथ-साथ आयात पर बढ़ती निर्भरता भी एक चुनौती बनकर सामने आई है। यदि वैश्विक संकट के कारण गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल घरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि छोटे व्यापार, होटल-रेस्टोरेंट उद्योग और खाद्य क्षेत्र पर भी पड़ता है।

ऊर्जा संकट का आर्थिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं होता। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। परिवहन, उद्योग और उत्पादन की लागत बढ़ जाती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है। इसलिए ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।

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ऐसी परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है और उसकी विदेश नीति परंपरागत रूप से संतुलन, संवाद और शांति के सिद्धांतों पर आधारित रही है। भारत के संबंध पश्चिम-एशिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के साथ हैं – चाहे वह इज़राइल हो, ईरान हो या अरब देश। इसलिए भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी कूटनीतिक संतुलन क्षमता को बनाए रखते हुए क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाए।

भारत की विदेश नीति का मूल आधार हमेशा से यह रहा है कि वह किसी भी संघर्ष में पक्ष लेने के बजाय संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान का समर्थन करे। आज भी यही दृष्टिकोण सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत युद्ध के बजाय बातचीत, संघर्ष-विराम और बहुपक्षीय सहयोग का समर्थन करता है। भारत की छवि एक जिम्मेदार और शांति-समर्थक राष्ट्र की रही है और इस संकट के समय भी उसे इसी दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

हालांकि केवल कूटनीति ही पर्याप्त नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत को अपनी ऊर्जा नीति में दीर्घकालिक सुधार करने होंगे। इसके अंतर्गत ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण अत्यंत आवश्यक है, ताकि देश किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भर न रहे। इसके साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा—जैसे सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार भी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इसके अलावा घरेलू गैस उत्पादन को बढ़ाने, ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करने और वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों को प्रोत्साहित करने जैसे कदम भी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि भारत इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाता है तो भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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पश्चिम एशिया का वर्तमान संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि वैश्विक राजनीति और आम नागरिक का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। युद्ध केवल सीमाओं और सेनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी कीमत अंततः आम जनता को चुकानी पड़ती है। ऊर्जा संकट,महंगाई और आर्थिक अस्थिरता उसी के परिणाम हैं। ऐसे समय में भारत जैसे बड़े और जिम्मेदार लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामने दोहरी जिम्मेदारी है – एक ओर अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और दूसरी ओर वैश्विक शांति और स्थिरता के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाना। संतुलित कूटनीति,  दूरदर्शी ऊर्जा-नीति और वैश्विक सहयोग के माध्यम से ही भारत इस चुनौती का सामना कर सकता है। यही वह मार्ग है जो न केवल वर्तमान संकट का समाधान प्रस्तुत कर सकता है, बल्कि भविष्य में भी देश को वैश्विक अस्थिरता से सुरक्षित रखने में सहायक सिद्ध होगा। (सप्रेस)

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