युद्ध के दबाव में कृषि

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अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ा गया निरर्थक युद्ध अब असर दिखाने लगा है। भरे-पूरे, जीवित देशों की बरबादी और असंख्य मौतों के अलावा तेल की कमी से पैदा हुए कृषि, खाद्य, परिवहन और तरह-तरह की जरूरतों के संकट ने दुनिया भर को कुल तीन हफ्तों में हलाकान कर दिया है। क्या है, यह संकट? क्या हमारे देश में इससे कुछ सीखा भी जा सकता है?


निलेश देसाई

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक संकटों का असर अंततः आम लोगों की ज़िंदगी और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता ही है। हाल के घटनाक्रमों ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक, ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को अस्थिर बना दिया है। यह वही समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया का लगभग एक चौथाई कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में ‘तरलीकृत पैट्रोलियम गैस’ (एलपीजी) गुजरती है।

ऊर्जा बाजार में किसी भी प्रकार की हलचल का असर केवल पैट्रोल और डीज़ल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा प्रभाव उर्वरक, परिवहन और अंततः कृषि उत्पादन पर पड़ता है। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा और उर्वरकों के कच्चे माल के आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय है।

ऐसे समय में जब मानसून की खरीफ फसलों का मौसम सामने है, भारत की कृषि व्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है जहां की आधी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। ऐसे में यदि उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होती है या उनकी कीमतों में वृद्धि होती है, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी खाद्य व्यवस्था और उपभोक्ता बाजार तक पहुँचेगा।

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भारत की खेती का एक बड़ा हिस्सा खरीफ पर आधारित है। धान, सोयाबीन, मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलें इसी मौसम में बोई जाती हैं। इन फसलों के लिए किसानों को विशेष रूप से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम वाले यूरिया और ‘डीएपी’ जैसे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इनके उत्पादन में ऊर्जा और आयातित कच्चे माल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आती है या तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आता है, तो उर्वरकों की लागत बढ़ना लगभग तय है।

इसके साथ ही डीज़ल की बढ़ती कीमतें भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। देश के कई हिस्सों में आज भी सिंचाई के लिए डीज़ल पंपों का उपयोग होता है। डीज़ल महंगा होने पर केवल सिंचाई ही नहीं, बल्कि जुताई, कटाई और परिवहन सभी महंगे हो जाते हैं। खेती की लागत में यह बढ़ोतरी अंततः किसानों की आय को प्रभावित करती है और कई बार इसका असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है।

यह संकट केवल उत्पादन लागत तक सीमित नहीं है। भारत की खाद्य व्यवस्था भी कई महत्वपूर्ण कृषि उत्पादों के आयात पर निर्भर है। विशेष रूप से खाद्य तेलों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता होने पर इन वस्तुओं की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं। घरेलू उत्पादन को मजबूत करना और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।

याद कीजिए, रासायनिक खाद, दवाओं से मुक्ति के चक्कर में 2021 में श्रीलंका ने बिना पर्याप्त तैयारी के अचानक रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया था। इस फैसले का परिणाम यह हुआ कि कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, किसानों की आय घट गई और देश को गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ा। स्पष्ट है, कृषि में किसी भी परिवर्तन को बिना तैयारी और चरणबद्ध रणनीति के लागू करना गंभीर जोखिम खडा कर सकता है।

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भारत के लिए आज चुनौती यह है कि वह इस वैश्विक संकट को केवल एक खतरे के रूप में न देखे, बल्कि इसे कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने के अवसर के रूप में भी समझे। इसमें सबसे पहला कदम होना चाहिए, किसानों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाना। अक्सर संकट के समय सबसे बड़ी समस्या सूचना के अभाव की होती है। यदि किसानों को समय रहते यह बताया जाए कि उर्वरकों की उपलब्धता सीमित हो सकती है या उनकी कीमत बढ़ सकती है, तो वे अपनी फसल-योजना और पोषण-प्रबंधन को उसी के अनुरूप बदल सकते हैं।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम उर्वरकों के विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना है। कई बार किसान परंपरा या सलाह के अभाव में आवश्यकता से अधिक रासायनिक खाद का उपयोग करते हैं। यदि वैज्ञानिक तरीके से मृदा-परीक्षण, संतुलित पोषण और जैविक विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए, तो उर्वरकों की मांग को कम किया जा सकता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम स्थानीय संसाधनों पर आधारित उर्वरक व्यवस्था को मजबूत करना है। गोबर, फसल-अवशेष, हरी खाद और अन्य जैविक संसाधनों से बनने वाले कम्पोस्ट तथा जैविक खाद खेती की लागत को कम करने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाते हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर पर ‘जैविक कम्पोस्ट मिशन’ जैसी पहल शुरू की जाए तो यह दीर्घकालीन समाधान साबित हो सकती है।

इसके साथ ही ‘कृषि विज्ञान केंद्रों,’ कृषि विश्वविद्यालयों और किसान संगठनों को मिलकर प्राकृतिक खेती, कम लागत वाली खेती और पोषण प्रबंधन के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर चलाना चाहिए। किसानों को केवल सलाह देने की बजाय उन्हें व्यवहारिक प्रशिक्षण और सफल उदाहरणों से जोड़ना अधिक प्रभावी होगा। यह भी आवश्यक है कि दलहन और तिलहन उत्पादन को विशेष प्राथमिकता दी जाए। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है और देश की आयात निर्भरता भी कम हो सकती है।

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‘हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य’ में उत्पन्न संकट के दौरान यदि समय रहते दूरदर्शिता के साथ कदम उठाए गए, तो यह संकट भारतीय कृषि को अधिक मजबूत, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने का अवसर बन सकता है। यदि इसे केवल एक अस्थायी समस्या मानकर अनदेखा कर दिया गया, तो आने वाला समय किसानों और देश दोनों के लिए कठिन हो सकता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘खरीफ 2026’ केवल एक कृषि मौसम नहीं, बल्कि भारत की कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। (सप्रेस)

श्री निलेश देसाई झाबुआ जिले की ’संपर्क’ संस्था के संस्थापक निदेशक हैं। वे “जमनालाल बजाज पुरस्कार” से सम्मानित हो चुके हैं।

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