वेनेज़ुएला पर साम्राज्यवादी आक्रमण : युद्ध, वर्चस्व और विश्व शांति का संकट

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वेनेज़ुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की खतरनाक मिसाल है। यह केवल वेनेज़ुएला की संप्रभुता पर हमला नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और संप्रभु समानता की पूरी व्यवस्था को कमजोर करने वाली घटना है।


अरविंद पोरवाल

वेनेज़ुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी, समकालीन विश्व राजनीति में साम्राज्यवादी बर्बरता की एक नई और खतरनाक मिसाल है। यह घटना केवल किसी एक देश की संप्रभुता पर हमला नहीं है, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जिसकी बुनियाद संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांतों पर रखी गई थी।

वेनेज़ुएला पिछले दो दशकों से अमेरिकी साम्राज्यवाद के निशाने पर रहा है। ह्यूगो चावेज़ के नेतृत्व में आरंभ हुई बोलिवेरियन क्रांति ने इस देश को नवउदारवादी पूंजीवाद की परिधि से बाहर निकालने का साहसिक प्रयास किया। तेल जैसे रणनीतिक संसाधनों का राष्ट्रीयकरण, सामाजिक कल्याण पर आधारित नीतियां और लैटिन अमेरिकी एकता की पहल—ये सभी कदम वैश्विक पूंजी और अमेरिकी प्रभुत्व के हितों के प्रतिकूल थे। चावेज़ के बाद मादुरो सरकार ने, तमाम आंतरिक और बाहरी दबावों के बावजूद, इसी संप्रभु और जनोन्मुखी दिशा को बनाए रखने का प्रयास किया। यही कारण है कि वेनेज़ुएला को आर्थिक प्रतिबंधों, वित्तीय नाकेबंदी, दुष्प्रचार और सत्ता परिवर्तन की साजिशों का सामना करना पड़ा।

राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी इस दीर्घकालिक साम्राज्यवादी परियोजना का सबसे नग्न और आक्रामक रूप है। यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और राजनयिक प्रतिरक्षा के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। यदि किसी संप्रभु देश के कार्यरत राष्ट्रपति को इस तरह हिरासत में लिया जा सकता है, तो इसका अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय कानून अब केवल कमजोर देशों के लिए है, जबकि शक्तिशाली राष्ट्र स्वयं को उससे ऊपर समझते हैं। 

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डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति ने इस साम्राज्यवादी चरित्र को बिना किसी नैतिक या कूटनीतिक आवरण के सामने रख दिया। क्यूबा पर नए सिरे से प्रतिबंध, कोलंबिया को वेनेज़ुएला के खिलाफ मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास, मैक्सिको को धमकियां, ग्रीनलैंड को “खरीदने” की पेशकश और चीन व ईरान के विरुद्ध खुली शत्रुता—ये सभी घटनाएं बताती हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद आज भी दुनिया को प्रभाव-क्षेत्रों और संसाधनों के नक्शे के रूप में देखता है।

इस आक्रामकता का असर वैश्विक स्तर पर दिखाई देता है। रूस–यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में यह दृष्टिकोण सैन्य समाधान को प्राथमिकता देता है और शांति वार्ताओं की संभावनाओं को कमजोर करता है। चीन–ताइवान प्रश्न में भी अमेरिकी हस्तक्षेप एशिया-प्रशांत क्षेत्र को एक संभावित युद्धक्षेत्र में बदलने की दिशा में काम कर रहा है। दक्षिण एशिया में, जहां भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव पहले से मौजूद है, ऐसे साम्राज्यवादी उदाहरण संवाद, संयम और आपसी विश्वास की जगह शक्ति-प्रदर्शन और सैन्यीकरण को वैध ठहराते हैं—जो एक परमाणु-संवेदनशील क्षेत्र के लिए अत्यंत घातक है।

पश्चिम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक हिस्सों में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और प्रतिबंधों ने पहले ही मानवीय संकट को गहराया है, समाजों को विभाजित किया है और संघर्षों को लंबा खींचा है। वेनेज़ुएला पर हमला वैश्विक स्तर पर एक ऐसे माहौल को मजबूत करता है, जहां युद्ध सामान्य और शांति अपवाद बनती जा रही है।

इन परिस्थितियों में भी एक सकारात्मक तथ्य यह है कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनता का प्रतिरोध कमजोर नहीं पड़ा है। लैटिन अमेरिका, यूरोप और एशिया के अनेक देशों में शांति आंदोलनों ने अमेरिकी हस्तक्षेप का विरोध किया है। उल्लेखनीय है कि स्वयं अमेरिका के भीतर भी हजारों लोग सड़कों पर उतरकर युद्ध, प्रतिबंधों और सत्ता परिवर्तन की राजनीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह विश्व शांति परिषद के उस दृष्टिकोण की पुष्टि करता है कि साम्राज्यवादी नीतियों का विरोध केवल राष्ट्र ही नहीं, बल्कि दुनिया की जनता भी करती है।

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इस पृष्ठभूमि में भारत की प्रतिक्रिया विशेष रूप से निराशाजनक है। औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत और गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की परंपरा रखने वाले देश से यह अपेक्षा थी कि वह स्पष्ट रूप से वेनेज़ुएला की संप्रभुता के पक्ष में खड़ा होगा। किंतु भारत की चुप्पी यह दर्शाती है कि वर्तमान विदेश नीति नैतिक सिद्धांतों से अधिक रणनीतिक समीकरणों से संचालित हो रही है।

भारत को साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की निंदा करनी चाहिए, राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी की तत्काल रिहाई की मांग करनी चाहिए और आर्थिक प्रतिबंधों व सत्ता परिवर्तन की राजनीति का विरोध करना चाहिए तथा संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में मजबूती से खड़ा होना चाहिए। भारत की भूमिका वैश्विक दक्षिण और शांति-प्रिय राष्ट्रों के साथ होनी चाहिए, न कि सैन्यवादी शक्ति गुटों के साथ। शांति का पक्ष लेना तटस्थता नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध सक्रिय हस्तक्षेप की मांग करता है।

वेनेज़ुएला पर हमला एक चेतावनी है कि साम्राज्यवाद आज भी युद्ध और अस्थिरता का सबसे बड़ा स्रोत है। शांति केवल घोषणाओं से नहीं आएगी; उसके लिए साम्राज्यवादी वर्चस्व के खिलाफ संगठित जनसंघर्ष, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और संप्रभुता आधारित विश्व व्यवस्था की पुनर्स्थापना आवश्यक है।

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