भविष्य निधि : कर्मचारी हित बनाम प्रशासनिक सुविधा

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सम्पत्ति बढ़ाने की जुगत में सरकारें बीमा और बैंकों में लगी आम लोगों की पूंजी को बाजार के हवाले कर रही हैं। अब यह कारनामा कर्मचारियों की भविष्य निधि तक पहुंच गया है। ऐसा करने के लिए पारदर्शिता, आसान प्रक्रिया और कर्मचारियों के हितों को ठेंगे पर मारना जरूरी होता है। अभी हाल में ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन’ ने कथित कर्मचारी हित में कुछ फेर-बदल किए हैं। क्या हैं, ये बदलाव?


स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने अपने आर्थिक नियोजन की दिशा तय करने के साथ-साथ कामगार वर्ग को सुरक्षित भविष्य देने के उद्देश्य से सन् 1952 में ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन’ (ईपीएफओ) की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य प्रत्येक नियोजित कर्मचारी की आय का एक अंश सुरक्षित रखकर सेवानिवृत्ति या आपात-स्थिति में आर्थिक सहारा प्रदान करना था। बाद में पेंशन और बीमा योजनाएँ जुड़ीं, जिनका संयुक्त लक्ष्य था — सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सम्मानजनक वृद्धावस्था।

‘ईपीएफओ’ की सदस्यता आज 30 करोड़ से अधिक श्रमिकों तक पहुँच चुकी है। इसका आकार लगभग 20 लाख करोड़ रुपये के आसपास माना जाता है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े भविष्यनिधि कोषों में स्थान देता है, परंतु इतने विशाल संगठन के भीतर जो नौकरशाही और नीतिगत जटिलता व्याप्त है, वह अक्सर लेटलतीफी और असुविधा के लिए बदनाम है। 

‘ईपीएफओ’ का निवेश ढाँचा जटिल और अपारदर्शी है। लगभग 15% राशि शेयर बाजार में तथा शेष सरकारी व कॉरपोरेट बॉन्ड में लगाई जाती है, फिर भी ब्याज दर 1990 के दशक की 12% से घटकर लगभग 8% रह गई है, जो मुद्रास्फीति के अनुपात में नगण्य है। निवेश प्रक्रिया पर नियंत्रण और जवाबदेही का अभाव है। नौकरशाही में पेशेवर दक्षता की कमी और राजनीतिक दबाव के कारण कर्मचारियों की पूँजी अक्सर जोखिम में पड़ जाती है। ‘भारतीय रिजर्व बेंक’ (आरबीआई) द्वारा सुझाए गए ‘ईपीएफओ’ निवेश सुधारों को सरकार को शीघ्र लागू करना चाहिए, ताकि फंड प्रबंधन पारदर्शी और लाभकारी हो सके।

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संसद से श्रमिक वर्ग की आवाज़ लगभग गायब है। एके गोपालन, जार्ज फर्नांडिस, गुरुदास दासगुप्ता और सीताराम येचुरी जैसे नेताओं के बाद मजदूर हितों का प्रतिनिधित्व नगण्य रह गया है, परिणामस्वरूप श्रम सुरक्षा के मुद्दे हाशिए पर हैं और संसद का रुझान कॉरपोरेट पक्ष में झुक गया है।नतीजे में पेंशन योजना की स्थिति बेहद दयनीय है। दशकों तक अंशदान के बाद भी कर्मचारी को मात्र ₹1,000 (अब न्यायालय आदेश से ₹7,500) पेंशन मिलती है, जबकि सांसद-विधायक मात्र एक कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन पाते हैं। जनता के धन से मिलने वाली यह ‘बहुस्तरीय पेंशन’ सामाजिक न्याय का उपहास है, जहाँ श्रमिकों के हिस्से में सिर्फ शर्तें आती हैं।

‘ईपीएफओ’ की 238वीं ‘केंद्रीय न्यासी बोर्ड’ की बैठक में आंशिक निकासी के नियमों को सरल और उदार बनाया गया है। अब 13 के स्थान पर केवल तीन श्रेणियाँ होंगी — आवश्यक जरूरतें (बीमारी, शिक्षा, विवाह),  आवास और विशेष परिस्थितियों में बिना कारण बताए धन-निकासी। शिक्षा के लिए दस बार और विवाह के लिए पाँच बार तक धन-निकासी की अनुमति मिलेगी, जो पहले कुल तीन बार तक सीमित थी। साथ ही, न्यूनतम सेवा अवधि घटाकर सभी श्रेणियों के लिए 12 माह कर दी गई है, जो पहले गृह निर्माण के लिए 5 और विवाह व शिक्षा के लिए 7 वर्ष थी।

ईपीएफओ’ ने डिजिटल रूपांतरण की घोषणा की है — जिसमें ‘क्लाउड’ आधारित प्रणाली, बहुभाषी ‘स्व-सेवा पोर्टल’ और स्वचालित दावे-निपटान जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। यह पहल निश्चित रूप से आधुनिकता की दिशा में कदम है, पर तकनीकी नवाचार प्रशासनिक संवेदनशीलता का विकल्प नहीं हो सकता। जब तक ‘शिकायत निवारण तंत्र’ पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनेगा, तब तक यह डिजिटल बदलाव कर्मचारियों के लिए राहत नहीं, केवल ‘क्लिक भर का सुधार’ सिद्ध होगा।

निस्संदेह, निकासी संबंधी नियमों का सरलीकरण और दस्तावेज़ों की बाध्यता समाप्त करना स्वागतयोग्य सकारात्मक कदम है, पर साथ लगाए गए प्रतिबंध इन सुधारों की भावना पर प्रश्न उठाते हैं। सरकार इन्हें ‘कर्मचारी हितैषी’ बताती है, जबकि व्यवहार में ये प्रावधान कर्मचारियों की बचत पर सरकार के नियंत्रण बढ़ाकर उनकी आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित करते दिखाई देते हैं।

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धन-निकासी की एक शर्त कि खाते में 25% राशि अनिवार्य रूप से रखी जाए, ताकि रिटायरमेंट में पर्याप्त फंड रहें, लेकिन महँगाई, बेरोज़गारी और आकस्मिक खर्चों के बीच यह कर्मचारी की अपनी ही बचत तक सीमित पहुँच बनाता है।

ब्याज दर (8.25%) आकर्षक लगती है, पर मुद्रास्फीति 6-7% और शेयर मार्केट में औसत आमदनी 15% तक होने पर यह लगभग नगण्य है। केवल एक वर्ष की सेवा के बाद गृह निर्माण हेतु धन-निकासी की अनुमति अव्यावहारिक व दिखावा लगती। छोटे कर्मचारियों के खाते में इतने समय में मुश्किल से कुछ हज़ार रुपये ही जमा हो पाते हैं, जो बढ़ती महँगाई में घर खरीदने हेतु अंशदान लायक भी नहीं रहते।

विवाह के लिए धन-निकासी अब भी केवल स्वयं, पुत्र या पुत्री तक सीमित है, जबकि अधिकांश परिवारों में भाई पर बहनों के विवाह की जिम्मेदारी होती है। यह नीति भारतीय परिवार संरचना को नज़रअंदाज़ करती है। सरकार कहती है कि अब शिक्षा और विवाह के लिए दस बार तक  धन-निकासी की अनुमति मिलेगी, लेकिन यदि कम वेतन, ठेके की नौकरी, रुक-रुक कर योगदान के कारण खाते में जमा ही नहीं बढ़ रही तो धन-निकासी की संख्या का कोई अर्थ नहीं रहता।

डिजिटलीकरण और ‘ऑटो सेटलमेंट’ हेतु ‘ईपीएफओ’ 3.0 सुनने में भले आधुनिक लगे, पर यह व्यवस्था ज़मीनी हकीकत से कटी हुई है। अधिकांश श्रमिकों के पास न पर्याप्त कंप्यूटर ज्ञान है, न पहचान के उपयुक्त दस्तावेज़। ऐसे में तकनीकी त्रुटियाँ ही उनके अधिकारों की सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगी और सुविधा के नाम पर एक नई डिजिटल दीवार खड़ी हो जाएगी।

‘ईपीएफओ’ में मुकदमों का प्रमुख कारण देरी पर भारी दंड था ; मई 2025 तक बकाया ₹2,406 करोड़ रुपए और लगभग 6,000 मामले लंबित हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ‘विश्वास योजना’ लेकर आई है, जो कर्मचारियों की बजाए मुख्यतः नियोक्ताओं के लिए राहत है। देर से अंशदान पर दंड सिर्फ 1% कर देना नियोक्ताओं को खुली छूट देता है और श्रमिक हितों की तुलना में उन्हें मजबूत करता है। ‘ईपीएफओ’ नियमों का स्वरूप कर्मचारियों की सुविधा से अधिक, सरकारी नियंत्रण और पूंजी स्थायित्व पर केंद्रित प्रतीत होता है। प्रतीकात्मक रियायतें हैं, लेकिन व्यावहारिक लाभ सीमित हैं। कुल मिलाकर यह ढाँचा सुधार की दिशा का संकेत देता है, लेकिन श्रमिक दृष्टिकोण से कम और प्रशासनिक सुविधा के लिए अधिक बनाया गया है। वास्तविक सुधार तभी संभव है जब लचीलापन, ब्याज और निवेश की पारदर्शिता, पेंशन सुधार, नौकरशाही और नियोक्ता की जवाबदेही तथा असंगठित श्रमिकों का समावेश सुनिश्चित किया जाए। ‘ईपीएफओ’ में व्यापक सुधार न हुए तो मुद्रास्फीति के मुकाबले ब्याज लाभ नगण्य रहेगा, ठेका और असंगठित श्रमिकों का शोषण बंद नहीं होगा, कर्मचारी बचत और सामाजिक सुरक्षा तंत्र कमजोर बना रहेगा और  ‘ईपीएफओ’ करोड़ों कर्मचारियों के लिए एक ऐसा खाता बना रह जाएगा, जहाँ जमा तो बहुत है, लेकिन भरोसा बहुत कम।(सप्रेस)

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