सौ साल का ‘आरएसएस’

अरुण कुमार डनायक

ठीक एक शताब्दी पहले, 1925 के दशहरे के इन्हीं दिनों में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना हुई थी। उसके कर्ता-धर्ताओं की नजर में गैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन माना जाने वाला यह अ-पंजीकृत जमावडा अपने जन्म से ही विवादास्पद रहा है। क्या हैं, ‘आरएसएस’ की खासियतें?

डाक्टर केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा 1925 में स्थापित ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (आरएसएस) आज भारत की सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं में से एक है। इसकी विचारधारा का केंद्र बिंदु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, जो भारत की राष्ट्रीय पहचान को हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ता है। हालांकि समावेशिता, विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में यह दृष्टिकोण प्रारम्भ से ही आलोचना का विषय बना हुआ है।

‘RSS’ के अनुसार भारत की सांस्कृतिक आत्मा हिंदू धर्म और उससे जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों में निहित है। उनका मानना है कि भारत एक “हिंदू राष्ट्र” है और यहां की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व से परिभाषित होती है। हिन्दू धर्म है अथवा विचार या जीवन-पद्धति – इसे लेकर ‘आरएसएस’ अस्पष्ट है। ‘आरएसएस’ के मतानुसार हिंदुत्व का अर्थ ‘हिन्दुइज्म’ करने से हिंदुत्व की प्रतिष्ठा तथा व्यापकता घट जाती है और वह धर्म (रिलिजन) के स्तर पर आ जाता है।  

‘आरएसएस’ अपनी विचारधारा को प्रस्तुत करने संस्कृतनिष्ठ विवादास्पद शब्दों का चयन कर लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करता है। शब्दों के मायाजाल से लोगों को भ्रमित कर अपनी  विचारधारा को सकारात्मक रूप में दर्शाना उसकी रणनीति रही है। ‘आरएसएस’ हिंदुत्व का भाषांतर ‘हिन्दुनेस’ में कर एक नई भ्रान्ति को जन्म देना चाहता है। मुस्लिम, ईसाई, पारसी आदि गैर-वैदिक/ ‘अब्राहमिक’ धर्मावलम्बी सदियों से इस भौगोलिक क्षेत्र में जन्मे हैं और हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन आदि धर्मों में आस्था रखने वालों के साथ प्रेमपूर्वक सह-अस्तित्व से रहते आये हैं। देश की सांस्कृतिक विरासत में इस विविधता का महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन ‘आरएसएस’ का दृष्टिकोण भारत की बहुलतावादी और बहुधार्मिक वास्तविकता को नजरअंदाज करता है। उसे ‘अनेकता में एकता, हिन्द की विशेषता’ जैसे प्रगतिशील नारे से भी परहेज है।

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‘आरएसएस’ की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा, हिन्दू धर्म की परंपरा को राष्ट्रीय पहचान का आधार, अन्य समुदायों को द्वितीय दर्जे का नागरिक मानना आदि विवादास्पद विषय रहे हैं। इन आलोचनाओं के उत्तर में ‘आरएसएस’ कहता है कि समूहगत अस्मिताओं के निर्माण में धर्म का महत्व एक सा नहीं रहता। ईसाई या मुस्लिम बहुल देशों के नागरिकों के एक सूत्र में बंध पाने की असफलता का उदाहरण देकर ‘आरएसएस’ अपने तर्क को पुष्ट करने का प्रयास करता है। वह इस्रायल के अस्तित्व में आने का मुख्य कारण यहूदियों की धर्मं के प्रति निष्ठा की अक्सर प्रशंसा करता है।  

‘आरएसएस’ अन्य धर्मावलम्बियों को एक ही मूलवंश ‘सनातनी हिन्दू’ मानने का दुराग्रह भी रखता है। वह सारे देश में संस्कृतनिष्ठ हिन्दी थोपे जाने की वकालत करता है और अल्पसंख्यकों की भाषा, खासकर उर्दू से उसकी घृणा जगजाहिर है। उसका यह अभिमत कि संस्कृति हमेशा एकसंघ ही रहती है, वह कभी मिली-जुली नहीं रह सकती, शुद्धता संस्कृति की प्रकृति है, संकरता उसकी प्रकृति से मेल नहीं खाती – आदि  अत्यंत घातक परिकल्पना है। इससे सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक विभाजन और अधिक गहरा हो सकता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।    

‘आरएसएस’ इतिहास को अक्सर एकपक्षीय रूप से प्रस्तुत करता है। उसकी मान्यता है कि पिछले तेरह सौ वर्षों से विदेशी, विशेषकर मुस्लिम आक्रान्ताओं ने इस देश पर अनेक बार आक्रमण किये और हमारी सम्पूर्ण राजसत्ता के स्वामी बन गए। मुस्लिम शासकों को आक्रांता के रूप में चित्रित करना और हिंदू गौरव की बात करना उसके विभाजनकारी दृष्टिकोण को दर्शाता है। अपनी इस विचारधारा को अमली जामा पहनाने  ‘आरएसएस’ ने प्रगतिशील इतिहासकारों के कड़े प्रतिरोध के बावजूद केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर शैक्षणिक पाठ्यक्रम में बदलाव करवाए हैं, ताकि मुस्लिम शासकों को हिन्दू विरोधी चित्रित किया जा सके और हिन्दू गौरव को प्रमुखता दी जा सके।  

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‘RSS’ के कहने पर भाजपा शासित सरकारों ने मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित ऐतिहासिक स्थलों अथवा बसाए गए नगरों के नाम बदलने का अभियान चलाया है, ताकि वे हिन्दू सांस्कृतिक प्रतीकों के अनुरूप हों। इसका उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक पहचान को हिन्दू धर्म से जोड़ना है। यह आश्चर्यजनक है कि ‘आरएसएस’ ने न तो अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया और न ही उनके द्वारा स्थापित स्थलों के नाम बदलने का अभियान चलाया। ‘आरएसएस’ ने सूचना क्रान्ति के फलस्वरूप उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अल्पसंख्यकों व अपने विरोधियों के खिलाफ सघन दुष्प्रचार करने में बखूबी किया है। उसके सहयोगी संगठनों ने अनेक मस्जिदों, दरगाहों  पर हिन्दू दावे प्रस्तुत किये हैं। स्थानीय अदालतों ने ‘आराधना स्थल अधिनियम, 1991’ की अनदेखी कर काशी, मथुरा, संभल व अजमेर के मुस्लिम धार्मिक स्थलों को विवादित घोषित करने हेतु हिंदू संगठनों के आवेदनों को स्वीकृत किया और सर्वेक्षण का आदेश देकर धार्मिक उन्माद को बढ़ावा दिया है।

इतिहास एक जटिल परिघटना है, जिसमें आक्रमण, लूटपाट, कला एवं संस्कृति के आदान-प्रदान, व्यापार और परस्पर मेल-जोल के अनेक आयाम होते हैं, लेकिन ‘आरएसएस’ का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ इन जटिलताओं को नजरअंदाज करता है। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता, समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित है, लेकिन जब ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचारधारा राजनीतिक रूप लेती है, तो यह संविधान का उल्लंघन करते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। धार्मिक बहुमतवाद की भावना, राज्य के निर्णयों में घुसपैठ कर सकती है, जिससे नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

सांप्रदायिक तनाव के समय, प्रशासनिक तंत्र पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। उत्तरप्रदेश सरकार का अल्पसंख्यकों के मकानों पर बुलडोज़र चलाना, फर्जी मुठभेड़ आदि नई न्यायिक व्यवस्था और राज्य की हिंसा का परिचायक बन गये हैं। धार्मिक आयोजनों में सरकारी सहभागिता, धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग व शीर्ष नेताओं का धर्म-गुरुओं के संग मंच साझा करना, हिंदू वोट बैंक को साधने के नए माध्यम बने हैं।

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‘आरएसएस’ के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ ने भारतीय समाज में एक नई तरह की ध्रुवीकृत राजनीति को जन्म दिया है। धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान के मुद्दों को चुनावी राजनीति में हथियार बनाया जा रहा है। इससे समाज में विभाजन की रेखाएं गहरी होती हैं, भाईचारा तथा एकता की भावना कमजोर पड़ती है। ‘आरएसएस’  का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता, देश की अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करता है। यह विचारधारा, अगर असीमित रूप से प्रभावी होती है, तो देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकती है। एक जागरूक और संवेदनशील समाज के रूप में हमें ऐसे राष्ट्रवाद की ओर बढ़ना होगा, जो विविधता को गले लगाए और हर भारतीय की समान नागरिकता और गरिमा को सुनिश्चित करे।

भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश में, एक समावेशी राष्ट्रवाद की आवश्यकता है, जो विविधताओं को शक्ति के रूप में देखे। एक ऐसा राष्ट्रवाद, जो सभी धर्मों, भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को समान आदर और महत्व दे। महात्मा गांधी के विचारों में ऐसा राष्ट्रवाद दिखता है, जहां प्रेम, अहिंसा और सत्य के आदर्शों के माध्यम से एकता और ‘सर्वधर्म समभाव’ की बात की जाती है। (सप्रेस)

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