क्यों है, बोधगया के महाबोधि मंदिर पर विवाद?

राम पुनियानी

फरवरी से बौद्ध समाज भगवान बुद्ध के निर्वाण-स्थल बोधगया के महाबोधि मंदिर के सामने धरने पर बैठे हैं। वजह है – प्रबंधन में ब्राम्हणवादी तौर-तरीकों का बढ़ता दबाव। इतिहास बताता है कि अपने समय में साक्षात गौतम बुद्ध और बाद में बौद्ध धर्मानुयायियों की ब्राम्हणों से रत्तीभर भी नहीं पटी, लेकिन अब सत्ता प्रतिष्ठान की शह पर इस तीर्थ को ब्राम्हणवादी विचारों के लिहाज से चलाने की कोशिशें हो रही हैं। क्या हैं, इसके निहितार्थ?

पटना के निकट बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर, बौद्ध धर्म के अनुयायियों का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान है क्योंकि भगवान गौतम बुद्ध को यहीं निर्वाण प्राप्त हुआ था। इस मंदिर का संचालन ‘बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949’ के प्रावधानों के अनुसार होता है और ‘बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति’ (बीटीएमसी) इसका प्रबंधन करती है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, मंदिर के नियंत्रण मंडल में हिंदू और बौद्ध समान संख्या में होते हैं। इस साल फरवरी से कई बौद्ध भिक्षु इन प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। उनकी मांग है कि मंदिर के क्रियाकलापों का संचालन करने वाले इस मंडल के सभी सदस्य बौद्ध हों।

इस विरोध का कारण नियंत्रण मंडल की मिश्रित प्रकृति के चलते धीरे-धीरे मंदिर का ब्राम्हणीकरण होता जाना है। धरने पर बैठे आकाश लामा ने उनके विरोध को समझाते हुए कहा, “यह मात्र एक मंदिर का सवाल नहीं है। यह हमारी पहचान और गौरव का सवाल है। हम अपनी मांगें शांतिपूर्ण ढंग से सामने रख रहे हैं। जब तक हमें सरकार से लिखित आश्वासन नहीं मिलेगा, तब तक, अनिश्चित काल तक, हमारा विरोध जारी रहेगा।”  धरने पर बैठे भिक्षुओं का कहना है कि “महाबोधि महाविहार का ब्राम्हणीकरण किया जा रहा है। प्रबंधन और समारोहों में ब्राम्हणवादी अनुष्ठान बढ़ते जा रहे हैं, जिससे बौद्ध समुदाय की आस्था और विरासत को गहरी चोट पहुंच रही है।”

See also  मुद्दा : जाति-जनगणना की जरूरत

भारत में बौद्ध धर्म और ब्राम्हणवाद के टकराव का लंबा इतिहास रहा है। जहां बौद्ध धर्म समानता का संदेश देता है वहीं ब्राम्हणवाद जाति एवं लिंग की जन्म से निर्धारित होने वाली ऊंच-नीच पर आधारित है। बुद्ध का सबसे प्रमुख संदेश उस काल में प्रचलित जाति एवं लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ था। सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार किए जाने के बाद यह धर्म भारत में और दूसरे देशों में, खासकर दक्षिण पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर फैला। अशोक ने भगवान बुद्ध का संदेश पहुंचाने के लिए प्रचारकों को दुनिया के कई देशों में भेजा।

बुद्ध ने अपने दौर में पशुबलि, विशेषकर गायों की बलि देने की गैर-जरूरी प्रथा को भी समाप्त करने का आव्हान किया था। इस सबसे ब्राम्हणों के सामाजिक एवं आर्थिक हितों पर विपरीत प्रभाव हो रहा था और वे बौद्ध धर्म के विस्तार से बेचैनी महसूस कर रहे थे। उन्हें तब बहुत राहत मिली जब अशोक के पौत्र बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने बृहद्रथ की हत्या कर सिंहासन पर कब्जा कर लिया और शुंग वंश की स्थापना की। इसके साथ ही ब्राम्हणवाद का बोलबाला बढ़ने लगा और बौद्ध धर्म का अस्त होना शुरू हो गया। पुष्यमित्र ने बौद्धों का जबरदस्त उत्पीड़न किया। कहा जाता है कि उसने बौद्ध मठों को जलवाया, स्तूपों को नष्ट किया और यहां तक कि बौद्ध भिक्षुओं का सिर काटकर लाने वालों को पुरस्कृत करने की घोषणा की। इसके चलते बौद्ध धर्म का पतन होने लगा और ब्राम्हणवाद कायम होता गया।  

बाद में अत्यंत प्रभावशाली दार्शनिक, कलाडी (एर्नाकुलम, केरल) के शंकराचार्य ने ब्राम्हणवाद के पक्ष में तर्क दिए। वे किस काल में हुए इसे लेकर विवाद है। जहां परंपरागत रूप से माना जाता है कि उनका जीवनकाल 788 से 820 ईस्वी का था, वहीं कुछ अध्येताओं का कहना है कि वे इससे बहुत पहले हुए थे और उनका जन्म 507 से लेकर 475 ईसा पूर्व के बीच हुआ था। जो भी हो, यह तो निश्चित है कि वे उत्तर पश्चिम से हुए मुस्लिम राजाओं के ‘आक्रमणों‘ के पहले हुए थे।

See also  विकास की विचारधारा : ‘संघ परिवार’ का संकट

[recent_post_carousel design=”design-3″]

शंकराचार्य का लक्ष्य ब्राम्हणवाद को अनावश्यक कर्मकांडों से मुक्त कराना था। उनका दर्शन, बौद्ध दर्शन से ठीक उलट था। भारतीय इतिहास और राजनीति के विद्वान और ‘द आइडिया ऑफ इंडिया’ के लेखक सुनील खिलनानी लिखते हैं, “उन्होंने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में उन बौद्ध दार्शनिकों पर तीखे शाब्दिक हमले किए जो बुद्ध की तरह यह शिक्षा देते थे कि दुनिया में सब कुछ अस्थायी है और ईश्वर के अस्तित्व से भी इनकार करते थे। (“इन्कारनेशन्स : इंडिया इन 50 लाईव्स”, 2016)। शंकराचार्य यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में थे और  ‘दुनिया को माया’ मानते थे। बुद्ध दुनिया को वास्तविकता मानते थे जिसमें दुःख व्यापक रूप से मौजूद थे। इसका आशय यह था कि दुखों की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए, उन्हें दूर करने के उपाय किए जाने चाहिए।  

कुल मिलाकर इन आक्रमणों के चलते बौद्ध धर्म भारत से लुप्तप्राय हो गया और तब तक हाशिए पर बना रहा जब तक बाबासाहेब अम्बेडकर ने बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण नहीं किया। इसके पहले भक्तिकाल के संतों ने भी जातिप्रथा के विरोध जैसे बौद्ध धर्म के कुछ मूल्यों की बात की थी। इनमें से कई संतों को उस समय के ब्राम्हणवादियों ने प्रताड़ित भी किया था।

दलितों की समानता के पक्ष में बड़ा बदलाव आज़ादी के आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ। जोतिबा और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा और समाजसुधार के क्षेत्रों में जबरदस्त काम किया। इन प्रयासों के जोर पकड़ने के साथ ही ब्राम्हणवाद के समक्ष चुनौती खड़ी हो गई। ब्राम्हणवादियों ने इस उभरती हुई चुनौती का जवाब राजनैतिक कदम उठाते हुए पहले ‘हिन्दू महासभा’ और बाद में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (आरएसएस) का गठन करके दिया। ये संगठन यथास्थिति और ब्राम्हणवादी मूल्यों को कायम रखने के इरादे को अभिव्यक्त करते हैं और ‘मनुस्मृति’ उनके लक्ष्यों का प्रतीक है।

See also  डॉ. आंबेडकर का धम्मचक्र प्रवर्तन — समानता और न्याय का नया अध्याय

हम एक अटपटे दौर में जी रहे हैं जहां खुलेआम धर्म का इस्तेमाल राजनैतिक एजेन्डे को आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। बौद्ध मंदिर का संचालन ब्राम्हणवादी तौर-तरीकों से हो रहा है, और सूफी दरगाहों का ब्राम्हणीकरण किया जा रहा है। बौद्ध भिक्षु अपने पवित्र स्थान का संचालन उनकी अपनी आस्थाओं और मानकों के अनुसार करना चाहते हैं और उसके ब्राम्हणीकरण का विरोध कर रहे हैं। उनका आन्दोलन भगवान गौतम बुद्ध की समानता और अहिंसा के विपरीत मूल्यों को लादने के विरोध में है। (सप्रेस) (अंग्रेजी से रूपांतरण – अमरीश हरदेनिया।

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »