तीर्थाटन और पर्यटन

अनुपम मिश्र

आजकल देश की अर्थव्यवस्था में उद्योग कहा जाने वाला पर्यटन खासी अहमियत रखता है, लेकिन क्या बरसों से हो रहे तीर्थाटन और देशाटन का आनंद इस पर्यटन से मिल पा रहा है? क्या अपने समाज और रास्ते में मिलने वाली विविध संस्कृतियों को जानने-समझने की उत्सुकता भागा-भागी के इस पर्यटन में बची है?

अनुपम मिश्र

बोरिया-बिस्तर बांधना एक पुराना मुहावरा है, लेकिन इसका अर्थ हमेशा एक-सा नहीं रहा। एक जगह से ऊब गए तो बोरिया-बिस्तर बांध चल पड़े देशाटन को। जी हां, तब पर्यटन शब्द चलन में नहीं था, पर देशाटन के लिए निकलने वालों की कोई कमी नहीं थी। अपने आसपास या दूर को जानना-पहचाना, लंबे निकल जाना और लौटकर बिना बुद्धू बने घर वापस आना खूब चलता था। इस देशाटन में दिशाएं, पड़ाव या मंजिल, कुछ भी तय नहीं रहता था।

तीर्थाटन इससे बिल्कुल अलग था। दिशा, जगह, पड़ाव, मंजिल, मौसम सब कुछ तय रहता था। तीर्थ सब दिशाओं में थे। सचमुच उत्तर, दक्खिन, पूरब और पश्चिम। तीर्थ भी सब धर्मों के – केवल हिंदुओं के नहीं,  जिनमें अन्य धर्मों के लोग भी आते-जाते थे। हर पीढ़ी की ऐसी इच्छा होती कि अपनी अगली पीढ़ी के हाथों घर-गिरस्ती सौंपने से पहले एक बार इनमें से कुछ तीर्थों के दर्शन कर ही लें। शरीर में सामर्थ्य हो तो अपने दम पर, नहीं तो श्रवणकुमारों की भी कोई कमी नहीं थी जो अपने बूढ़े माता-पिता को ‘बहंगी’ में उठाकर सब दिखा-घुमा लाते थे।

ये तीर्थ भी दो तरह के माने गए थे। एक ‘स्थावर’ यानी किसी विशेष स्थान पर बने, जहां लोगों को पुण्य कमाने खुद ही जाना पड़ता था। लेकिन कुछ ऐसे भी तीर्थ थे, जिन तक जाना नहीं पड़ता था – वे आपके घर-दरवाजे स्वयं आकर दस्तक देते थे। ऐसे तीर्थ ‘जंगम-तीर्थ’ कहलाते थे – यानी चलते-फिरते तीर्थ। समाज में बिना स्वार्थ साधे सबके लिए कुछ-न-कुछ अच्छा करते-करते कुछ विशेष लोग संत, विभूति ‘जंगम-तीर्थ’ बन जाते थे। उनका घर आ जाना तीर्थ जैसा पुण्य दे जाता था।

समय के साथ बहुत-सी चीजें, व्यवस्थाएं बदलती हैं। सब कुछ रोका नहीं जा सकता, लेकिन हमें पता तो रहे कि हमारे आसपास धीरे-धीरे या खूब तेजी से क्या-कुछ बदलता जा रहा है। आज के पर्यटन से पहले देशाटन और तीर्थाटन था और सब जगह इसके साथ एक पूरी अर्थ-व्यवस्था थी। उससे तीर्थों के आसपास के अनगिनत गांव, शहर भी जुड़े रहते थे। वह आज के पर्यटन उद्योग की तरह नहीं था। एक तरह का ग्रामोद्योग या कुटीर उद्योग था।

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उदाहरण के लिए बदरीनाथ या हिमालय की ‘चार धाम यात्रा’ को ही लें। यह तीर्थ यात्रा साल में कोई छह महीने चलती थी। पूरे देश से लोग यहां आते थे। हिमालय में तब सड़कें नहीं थीं। मैदान में बसे हरिद्वार या ऋषिकेश से शुरु होकर सारी यात्रा पैदल ही पूरी की जाती थी। प्रारंभिक पड़ाव में धर्मशालाएं थीं। उसके बाद ठहरने, रुकने, खाने-पीने का इंतजाम रास्ते के दोनों तरफ पड़ने वाले छोटे-बड़े गांवों के हाथों में ही रहता था।

पूरा देश स्वर्ग जाने वाली इन छोटी-छोटी पगडंडियों से पैदल ही चढ़ता-उतरता था। हां, कुछ लोग तब भी सामर्थ्य, मजबूरी आदि के कारण पालकी, डोली या खच्चर का प्रयोग कर लेते थे। इंदौर रियासत की अहिल्याबाई पालकी से ही बदरीनाथ गई थीं और आज के चमोली जिले के पास गोचर नामक एक छोटे-से कस्बे में अपनी उदारता, जीवदया और किसानों की जमीन के अधिग्रहण के कुछ सुंदर नमूने आज के नए राजा-रानियों के लिए भी छोड़ गई थीं।

यह सारा रास्ता मील में नहीं बांटा गया था। कहां पगडंडी सीधी चढ़ाई चढ़ती है, कहां थोड़ी समतल भूमि है, कितनी थकान किस हिस्से में आएगी, उस हिसाब से इसके पड़ाव बांटे गए थे। इतनी चढ़ाई चढ़ गए, थक गए तो सामने दिखती थीं सुंदर चट्टियां। चट्टी यानी मिट्टी-गोबर से लिपी-पुती सुंदर बड़ी-बड़ी, लंबी-चौड़ी सीढ़ियां। रेल के पहले दर्जे की शायिकाओं जैसी अनगिनत सीढ़ियां। इन पर प्रायः साफ-सुथरे बोरे स्वागत में बिछे रहते थे।

लोग अपने साथ कुछ हल्का-फुल्का बिछौना लाए हैं तो उसे इन चट्टियों पर बोरे के ऊपर बिछाकर आराम करेंगे। नहीं तो गांव के कई घरों से गद्दे-तकिए, रजाई, कंबल, मोटी ऊन की बनी दरियां नाममात्र की राशि पर प्रेम से उपलब्ध हो जाती थीं। इन दरियों को ‘दन’ कहा जाता था। गलीचे, कालीननुमा ये ‘दन’ इतने आकर्षक होते थे कि यात्रा से लौटते समय इनमें से कुछ के सौदे भी हो जाते थे। हाथ के काम का उचित दाम बुनकर को मिल जाता था। इन सेवाओं का शुल्क भी बाद में ही आया। शुरू में तो एक-सी सुविधा का दाम अलग-अलग लोग अपनी हैसियत और इच्छा, श्रद्धा से चुकाते थे।

इन्हीं चट्टियों के किनारे के गांव अपने-अपने घरों से फल, सब्जी, दूध-घी, आटा, दाल, चावल, गरम पानी आदि का इंतजाम किया करते थे। पूरे देश के कोने-कोने से आए तीर्थयात्रियों की छह महीने की यह मौसमी अर्थव्यवस्था पहाड़ों की सर्दी को थोड़ा गरम बनाए रखती थी। आजादी के बाद इन पैदल रास्तों के किनारे धीरे-धीरे मोटरगाड़ी जाने लायक सड़कें बनने लगीं, पर अचानक 1962 में चीन की सीमा पर हुई हलचल ने इस काम में तेजी ला दी। धड़ाधड़ सड़कें बनती गईं, पगडंडिया उजड़ती गईं। इस शानदार व्यवस्था की कुछ स्मृति बदरीनाथ मंदिर से थोड़ा नीचे बनी हनुमान चट्टी पर अभी भी छिपी है। इन चटिटयों की विदाई से तीर्थ क्षेत्र के पैदल रास्ते के दोनों ओर बसे गांवों में कैसी उदासी छायी होगी – इस पर उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं ने शायद ही कभी ध्यान दिया हो।

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आज तीर्थाटन पर्यटन में बदल गया है। सैर-सपाटे पर जाने का, या कहें विज्ञापन छापकर जबरन सैर करवाने का पूरा एक नया उद्योग खड़ा हो चुका है। तीर्थयात्राएं अभी भी हो रही हैं, पर वे भी इसी पर्यटन का हिस्सा बन गई हैं। उन्हें बाजार की पैसा कमाने वाली व्यवस्था ने निगल लिया है। उत्तर से दक्षिण तक के बड़े-बड़े मंदिर, तीर्थ-स्थान अब कंप्यूटर से जुड़ गए हैं। ई-आरती, ई-बुकिंग, ई-दर्शन, ई-यात्रा – भगवान का सब कुछ बाजार ने अपनी लालची तिजोरी में डाल लिया है। शायद भगवान भी आने वाले दिनों में ई-कृपा बांटने लगें।

ऐसा नहीं है कि सड़कें आनंद के स्वर्ग तक नहीं ले जातीं, लेकिन पर्यटन और तीर्थ के स्थानों तक आनन-फानन पहुंचाने की यह व्यवस्था अपने साथ एक विचित्र भीड़भाड़, भागमभाग, कुछ कम या ज्यादा गंदगी, थोड़ी-बहुत छीना-झपटी, चोरी-चपाटी, सब कुछ लाती हैं। चट्टी वाले दौर में देश के लोगों को हिमालय का अद्भुत सौंदर्य देखने को मिलता था। सड़क आने से यह दर्शन और भी सुलभ होना चाहिए था, पर सड़क से सिर्फ तीर्थयात्री ही नहीं आते, पूरा व्यापार आता है। उस व्यापार ने यहां के जंगलों का सौदा भी बड़ी फुर्ती से कर दिया है। अब हरिद्वार से बस में बैठा पर्यटक पूरा हिमालय पार कर ले – उसे कहने लायक सुंदर दृश्य, सुंदर जंगल कम ही दिखेंगे।

तुरत-फुरत पैसा कमाने की होड़ ने कई रास्ते बदल दिए हैं। पहले की यात्रा में तुंगनाथ और रुद्रनाथ शामिल थे। इनमें तुंगनाथ तो पूरे ‘चार धाम’ के अनुभव में विशेष स्थान रखता था। उसके रास्ते में चोबता नाम की एक जगह के पास बनी चटि्टयों में सचमुच ‘अनुपम सौंदर्य आपकी प्रतीक्षा में खड़ा मिलता था।’ इस पैदल सड़क को बनाने वाले पीडब्लूडी विभाग ने एक बोर्ड यहां ऐसा ही टांग दिया था।

बताया जाता है कि सन् 1975 में आपातकाल लगाने, दिन-रात राजनीतिक उठापटक से बिलकुल थक गईं श्रीमती इंदिरा गांधी ने आराम करने के लिए चोबता को ही चुना था। आपातकाल का सन्नाटा, डर और खुफिया विभाग की सफलता कुछ ऐसी रही होगी कि घने जंगलों से ढकी इस अद्भुत देवभूमि में बने एक छोटे-से डाक बंगले में श्रीमती गांधी के इस पर्यटन की भनक शायद देवताओं के अलावा किसी को भी नहीं लग पाई थी।

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ऐसे अनुभवों से बिलकुल अलग थीं, राजस्थान की भर्तृहरि और चाकसू तीर्थ क्षेत्रों की व्यवस्थाएं। अलवर और जयपुर जिलों में बने इन स्थानों की पूरी बसाहट कुछ अलग ढंग की है। यहां प्रवेश करते ही अनेक धर्मशालाएं दिखने लगेंगी जिनमें न दरवाजे हैं, न खिड़कियां। भवन छोटा हो या बड़ा, प्रवेशद्वार तक नहीं मिलेगा। यहां किसी भी धर्मशाला में बोर्ड नहीं, बनाने वाले का नाम नहीं, चौकीदार नहीं, दफ्तर या प्रबंधक नहीं। जहां मन करे, जगह मिल जाए, उसी कमरे में रुक जाएं। ऐसी व्यवस्था बहुत सोच-समझकर बनाई गई थी। तीर्थक्षेत्र में अपना नाम, अपना महत्व, अपना पैसा, अपना खानदान, स्वामित्व की भावना सब कुछ भुला दो। तीर्थयात्री के रहने का प्रबंध करो और श्रेय प्रभु अर्पण कर दो।

एक पुराना किस्सा बताता है कि यहां किसी सेठ ने तीन मंजिल की एक सुंदर धर्मशाला बनाई थी। उनके मुंशी की गलती से उस नवनिर्मित भवन में, पहले ही दिन कुछ क्षणों के लिए ‘यह मेरा है’ की गंध आई थी। तीर्थक्षेत्र में यह दुर्गंध तेजी से फैली और उसने तुंरत सेठ को आदेश दिया कि यह पूरी धर्मशाला, तीन मंजिला भवन तुम अपने हाथ से हथौड़ा मार-मारकर गिरा दो। सेठ ने खूब समझाया कि मिल्कियत का निशान तो अब मिटा दिया है, इतनी सुंदर इमारत भला क्यों तुड़वा रहे हो। न जाने कितने सालों तक कितने ही तीर्थयात्रियों के काम आएगी, पर निर्णय हो चुका था। पूरी धर्मशाला तोड़ दी गई। यह किस्सा शायद 500 बरस से यहां आने वाले हर तीर्थयात्री को याद है – एक आदर्श की तरह। ऐसी सख्ती तब नहीं दिखाई गई होती तो वह धर्मशाला यहां आने वालों को कानून तोड़ने का सरल रास्ता और तर्क सुझाती रहती। चाकसू की धर्मशाला अपने को मिटाकर एक आदर्श की तरह उपस्थित है, समाज के मन में। जीवन को भी एक यात्रा ही कहा गया है जो साफ-सुथरी, लिपी-पुती चट्टियों पर बीतेगी या नकली चमक-धमक वाले होटलों जैसे घरों में – इसे बहुत हद तक हम खुद तय कर सकते हैं। (सप्रेस)

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