लोकतंत्र

स्‍वतंत्रता दिवस : लोकतंत्र का मौजूदा सच !

स्‍वतंत्रता दिवस : लोकतंत्र का मौजूदा सच !

अपने-अपने देश-काल के बरक्स हम अपने-अपने लोकतंत्र को चुनते, समझते और वापरते हैं, लेकिन क्या यह वही सर्व-जन-हिताय लोकतंत्र होता है जिसके भरोसे दुनिया के हम अधिकांश निवासी अपनी-अपनी वैतरणी पार करने के मंसूबे बांधते हैं? एक-दूसरे को नेस्तनाबूद करने...

अरुण कुमार त्रिपाठी

अपने-अपने देश-काल के बरक्स हम अपने-अपने लोकतंत्र को चुनते, समझते और वापरते हैं, लेकिन क्या यह वही सर्व-जन-हिताय लोकतंत्र होता है जिसके भरोसे दुनिया के हम अधिकांश निवासी अपनी-अपनी वैतरणी पार करने के मंसूबे बांधते हैं? एक-दूसरे को नेस्तनाबूद करने की मौजूदा हुलस और उसके प्रति बेशर्म एकजुटता को देखकर तो ऐसा नहीं लगता।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को सलाह दी थी कि वे जर्मन फौजों के सामने हथियार उठाने की बजाय सत्याग्रही के तौर पर प्रस्तुत हो जाएं। उस वक्त गांधी का सम्मान करने वाले कई ब्रिटिश बौद्धिकों ने कहा था कि गांधी की सलाह अहिंसा के लिहाज से उचित और भविष्य के लिए सही हो सकती है, लेकिन इस समय उस पर अमल करना संभव और व्यावहारिक नहीं है। गांधी का कहना था कि मेरी सलाह भविष्य के लिए नहीं होती, वह तत्काल अमल के लिए होती है। जाहिर है, गांधी का यह भी कहना था कि जो समाज अपने वर्तमान में नैतिक आचरण के लिए प्रतिबद्ध है वह भविष्य को भी एक साफ दृष्टि से देख सकता है और एक नैतिक भविष्य का निर्माण भी कर सकता है।

इस मामले में हमारा मौजूदा दौर एक दोगले और पाखंडपूर्ण समय में उलझ गया है। वह ऐसी नैतिक शून्यता की ओर बढ़ रहा है जो उसके राजनीतिक नेतृत्व में है, उसकी नौकरशाही में है और उसके संचार-माध्यमों सहित जनता के व्यापक हिस्से में व्याप्त हो चुकी है। जिस नौकरशाही को कभी मैक्स बेबर एक ‘प्रोफेशनल संगठन’ मानते थे, वह निरी रीढ़-हीन साबित हो रही है। नौकरशाही के बारे में बेबर के बजाय लेनिन की बात ज्यादा सही हो रही है कि ‘वह सत्तारूढ़ वर्ग की ताबेदारी ही करती है।’  

आजकल 1975 से 77 के दौर के ‘आपातकाल’ पर ढेरों गोष्ठियां हो रही हैं और पुस्तकों, लेखों, रपटों, फिल्मों के माध्यम से तानाशाही और लोकतंत्र को परिभाषित किया जा रहा है। नायक और खलनायक चिह्नित किए जा रहे हैं। ऐसा करने वालों में कई ऐसे लोग भी हैं जिनका नाता वामपंथ, समाजवाद, सर्वोदय और स्वतंत्र सोच से है, लेकिन ज्यादा संख्या उन लोगों की है जो दक्षिणपंथी हिंदुत्व के विचार से गहरा संबंध रखते हैं। एक रोचक तथ्य यह भी है कि हिंदुत्ववादियों की ओर से होने वाली ‘आपातकाल’ की भर्त्सना के प्रतिकार में वामपंथियों और धर्मनिरपेक्ष तबके का एक हिस्सा ‘इमरजेंसी’ को अपरिहार्य बताते हुए उस मुद्दे पर इंदिरा गांधी के गुणगान भी करने लगा है। हालांकि वह तबका आज अधिनायकवाद से लड़ रहा है।

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दिल्ली से लंदन, पेरिस से वाशिंगटन और पेइचिंग से दुबई तक हमारे समाज की विडंबना यह है कि वह नैतिक बल के बजाय पशुबल का कायल होता जा रहा है। कम-से-कम विगत एक दशक में हमने ऐसे विश्व और राष्ट्र का निर्माण कर दिया है जहां पर न सिर्फ अन्याय बढ़ते जा रहे हैं, बल्कि अन्याय का विरोध करने का लोकवृत्त यानी ‘पब्लिक स्फेयर’ भी समाप्त हो चला है। ऐसे लोकवृत्त लोकतांत्रिक समाजों में अधिक होते थे, लेकिन अब लोकतांत्रिक समाजों के स्वर ‘सन्नाटे की कुंडली’ (स्पाइरल आफ साइलेंस) में कैद हो गए हैं। वहां अन्याय के विरुद्ध आवाजें उठती जरूर हैं, लेकिन या तो दबा दी जाती हैं या उनका दायरा सीमित कर दिया जाता है। दूसरी ओर, अतीत के अन्याय के गौरवगान से समाज को मदमस्त कर दिया जाता है।

यही वह प्रवृत्ति है जो यहूदियों के नाज़ी नरसंहार यानी ‘होलोकास्ट’ का बार-बार स्मरण करते हुए गाज़ा में इजराइल की ओर से हो रहे नरसंहार पर महामौन धारण कर लेती है। यह एक भयभीत और नैतिक रूप से कायर समाज का लक्षण है। भारत ने इस कायरता से निकलने का जो मार्ग अपने 90 वर्षों के स्वतंत्रता संग्राम के जरिए हासिल किया था, वह आज खो गया है। गांधी ने उस दौरान उपज रहे हिंसक साहस को अहिंसक नैतिक साहस में परिवर्तित कर दिया था। इसीलिए वे न तो अपने किसी आंदोलन की गोपनीय तैयारी करते थे और न ही अपने प्रतिद्वंद्वी, जिसे दूसरे लोग दुश्मन कहते थे, के साथ उठने-बैठने में परहेज करते थे। इसी नैतिक साहस के नाते गांधी ब्रिटिश सम्राट से मिलने के बाद मुसोलिनी से भी मिलने का साहस रखते थे और हिटलर को सुधरने की सलाह देते हुए पत्र भी लिख सकते थे।

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यूरोप ने यह राजनीतिक नैतिकता द्वितीय विश्वयुद्ध में लाखों लोगों को मारकर हासिल की थी। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों ने यूरोप को बहुत कुछ सिखाया था। इन संघर्षों से कुछ संस्थाएं भी निकली थीं जिनसे लोकतंत्र और उसके नैतिक मूल्यों के संरक्षण की गारंटी दी जाती थी, पर आज वे संस्थाएं निस्तेज या पक्षपाती हो गई हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया ने तय किया था कि अब विश्व ‘जियो और जीने दो’ के विचार पर चलेगा और राष्ट्रों की संप्रभुता के साथ नागरिकों के मानवाधिकारों की हिफाजत की जाएगी। यहां तक कि उस दौर में शरणार्थियों की भी चिंता की गई थी।

उन दिनों तय किया गया था कि युद्ध के अलावा समुद्र में आने-जाने तक के नियम होंगे, लेकिन आज संपत्ति और सत्ता की चकाचौंध में फंसा समाज जीवन के महत्व और मानव अस्तित्व की अनिश्चितता को ही भूल गया है। जर्मनी के ‘यातना शिविर’ से बचकर निकले इतालवी केमिस्ट और लेखक प्रिमो लेवि का कथन है, ‘सत्ता और धन की प्रभुता से हम इतने चौंधिया गए हैं कि अपने अस्तित्व की क्षणभंगुरता तक को भूल बैठे हैं। हम भूल गए हैं कि हम सभी एक किस्म की यहूदी बस्ती में कैद हैं और उस बस्ती के चारों ओर लगे कंटीले तारों के बाहर यमराज हमारा इंतजार कर रहे हैं।’  

प्रिमो लेवि की इसी बात को आज के संदर्भ में उलटकर कहा जा सकता है कि जो लोग आज गाज़ा पर बर्बर हमले कर बेगुनाह औरतों और बच्चों का नरसंहार कर रहे हैं वे यह भूल रहे हैं कि लाशों और मलबे के वे ढेर कब बारूद बनकर किसको तबाह कर दें, कहा नहीं जा सकता। इसी तरह जो लोग पचास साल पहले लगे ‘आपातकाल’ की आलोचना करके अपने लोकतांत्रिक दायित्वों की इतिश्री मान रहे हैं और आज के दमन पर खामोश हैं, आने वाला इतिहास उन्हें भी खलनायक बनाने में शायद ही कोई मुरव्वत करे।

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इन स्थितियों के लिए चंद समूहों की हिंसा और दमनकारी नीतियां ही दोषी नहीं हैं। गांधी ने चेतावनी दी थी कि उन्हें असली चिंता मानव सभ्यता के बर्बरीकरण की है। वह बर्बरीकरण हम गाज़ा पर अत्याचार कर रहे इजराइल और उसके साथ खड़े अमेरिका, यूरोप और एक हद तक भारत जैसे देश के व्यवहार में देख सकते हैं। यह वही कायर नैतिकता है जो इतिहास में पांच सौ साल पहले हुए नरसंहार पर तो आसमान सिर पर उठा लेती है, लेकिन वर्तमान नरसंहार पर खामोश रहती है। यह वही दोगलापन है जो पचास साल पुराने अधिनायकवाद की भर्त्सना के लिए तो गला फाड़ रहा होता है, लेकिन अपने समय के अघोषित आपातकाल पर प्रदीर्घ मौन धारण कर लेता है।

पंकज मिश्र अपनी ताजा पुस्तक ‘द वर्ल्ड आफ्टर गाज़ा’ में लिखते हैं, ‘युद्ध अंततः अतीत का हिस्सा बन जाएगा और समय दहशत की उन मीनारों को समतल कर देगा, लेकिन गाज़ा में तबाही के निशान दशकों तक रहेंगे। वे निशान घायल मानव देह के रूप में होंगे, अनाथ बच्चों के रूप में होंगे, नगर के मलबे और बेघर लोगों के रूप में होंगे और होंगे हमारी चेतना में व्यापक रूप से फैले हुए सामूहिक मृत्युशोक के रूप में। जिन लोगों ने धरती की एक पतली सी पट्टी पर हजारों लोगों का वध होते हुए और उस पर शक्तिशाली लोगों की खुशी या उनकी उदासीनता देखी होगी, वे वर्षों तक आंतरिक जख्म और सदमे से उबर नहीं पाएंगे।’ (सप्रेस)

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