नेहरू के नेतृत्व की अहमियत

अरुण कुमार डनायक

साढे सात दशक पहले बरसों की गुलामी से आजाद हुए भारत को क्या पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसा प्रधानमंत्री ही चहिए था? उनके करीब 17 साल के कामकाज को देखें तो यह सचाई खुलकर उजागर हो जाती है कि आधुनिक भारत को बनाने, संवारने में पंडित नेहरू और उनके संगी-साथियों ने बेहद अहम भूमिका निभाई थी। बच्चों के प्रति उनके गहरे प्रेम के अलावा उनकी इस भूमिका को याद करते रहना इसलिए भी जरूरी है ताकि हम अपनी विरासत को बनाए रख सकें।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 133 वें जन्मदिन पर भारत उन्हें स्मरण कर रहा है। उनके व्यक्तित्व, खासकर निजी जीवन को लेकर बहुत से दोषारोपण किए जाते हैं और कतिपय नीतियों को लेकर सारा दोष उनके मत्थे मढ़ देने का फैशन सा चल निकला है। इन सबके बावजूद स्वतंत्र भारत में नेहरू-युग की अनदेखी कर पाना नामुमकिन है।  

नेहरू जी के पिता, मोतीलाल नेहरू अपनी वकालत, महंगी फीस, राजा-महाराजाओं व अंग्रेजों से दोस्ती और अमीरी के किस्सों के लिए सारे भारत में विख्यात थे। महात्मा गांधी के आह्वान पर शुरू हुए ‘असहयोग आंदोलन’ ने पूरे परिवार की जीवन-शैली बदल डाली। पिता-पुत्र की जोड़ी ने अदालत जाना बंद कर दिया, घर से अनेक नौकरों की विदाई हो गई, बाग-बागीचे का रखरखाव खत्म हो गया, कीमती सामान फर्नीचर आदि आए दिन जप्त होने लगे। विलायत के महीन कपड़ों की जगह मोटे खद्दर ने ले ली।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ग्यारह वर्ष उन्होंने ब्रिटिश सरकार की जेलों में बिताए। अक्सर जब परिवार को उनकी आवश्यकता होती तो वे जेल में होते। उनके पिता मसूरी से इलाज कराकर इलाहाबाद वापस आए और उसी दिन, 18 अक्टूबर 1930 को एक जनसभा को संबोधित करते हुए जवाहरलाल  गिरफ्तार कर लिया गए, वे अपने बीमार पिता से मिल भी नहीं सके। पत्नी जब भुवाली सेनीटोरियम में इलाज करवा रही थी तब वे अल्मोड़ा की जेल में बंद थे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय तो परिवार के सभी वयस्क सदस्य जेल में थे।      

‘आजाद हिन्द फौज’ के सेनानियों को बड़े गुपचुप तरीके से भारत लाया गया था। ब्रिटिश सरकार तो उन सभी को मौत के घाट उतारना चाहती थी। गांधीजी के निर्देश पर कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित किया, उसे इन शब्दों में नेहरू जी ने ही तैयार किया था ‘यह सही भी और उचित भी है कि कांग्रेस ‘आजाद हिन्द फौज’ के सदस्यों का मुकदमे में बचाव करे………….इस समर्थन का यह अर्थ नहीं है कि कांग्रेस शांतिपूर्ण और उचित उपायों से स्वराज प्राप्त करने की अपनी नीति से किसी तरह विचलित हो गई है।’

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‘आजाद हिन्द फौज’ के उदाहरण से नेहरू जी की यह सोच और पुख्ता हुई थी कि स्वतंत्रता संग्राम में गांधी मार्ग ही उचित है, सशस्त्र युद्ध अथवा विदेशी मदद से भारत को स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। उन्होंने जापान से सैन्य मदद लेकर भारत को स्वतंत्र कराने के किसी भी उद्देश्य का समर्थन नहीं किया, लेकिन अपने पुराने मित्र सुभाषचंद्र बोस और उनके साथियों का कोर्ट मार्शल के दौरान भूलाभाई देसाई के सहायक बनकर बचाव किया। भगत सिंह ने जब जेल में भूख हड़ताल की तो वे उनसे मिलने जेल गए और कहते हैं कि चंद्रशेखर आजाद भी उनसे मिलने एक बार ‘आनंद भवन’ गए थे। 

आजाद भारत का नेतृत्व किसे दिया जाए, यह महत्वपूर्ण प्रश्न महात्मा गांधी के सामने था। जवाहरलाल नेहरू  और गांधीजी के बीच मतभेद थे। गांधी के विकास का रास्ता देहात से शुरू होता था, लेकिन नेहरू शहरीकरण के हिमायती थे। गांधीजी के लिए मजदूर, किसान, कामगारों का उत्थान सर्वोपरि तो था, पर वे पूँजीपतियों के भी खिलाफ नहीं थे। नेहरूजी पूंजीवादियों से पर्याप्त दूरी के पक्षधर थे और भारत को यूरोपीय देशों की तर्ज पर समाजवादी लोकतान्त्रिक देश बनाना चाहते थे। ऐसा नहीं है कि औद्योगीकरण, जिसके गांधीजी भी पूरी तरह से विरोधी नहीं थे, को प्राथमिकता देने के चक्कर में नेहरूजी ने ग्रामीण विकास के मूल स्तम्भ कृषि व कुटीर उद्योग को पूर्णत: भुला दिया था।

पहली पंचवर्षीय योजना में ही कृषि क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर सिंचाई हेतु ‘भाखरा-नंगल’ जैसी बड़ी सिंचाई परियोजनाएं शुरू की गईं। ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ के अंतर्गत निजी क्षेत्र के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्रों में बड़े उद्योग जरूर लगाए गए पर लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए 1955 में ‘राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम’ की स्थापना की गई। नेहरूजी का सोचना था कि भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या, गरीबी और बेरोजगारी दूर करने तथा लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए व्यापक शहरीकरण और औद्योगीकरण ही बेहतर उपाय है।

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कश्मीर आज भी एक नासूर है और इसके लिए नेहरू को दोषी ठहराये जाते वक्त विरोधी कश्मीर की जटिल और उलझी हुई परिस्थितियों को भूल जाते हैं। कश्मीर मुस्लिम बहुल आबादी वाली ऐसी रियासत थी जिसके शासक हिन्दू महाराजा थे। जूनागढ़ जैसी रियासतों के भारत विलय के जो मापदंड थे उस लिहाज से कश्मीर का भारत में विलय संभव नहीं था। नेहरू जी ने कश्मीर के सामरिक महत्व को पहचाना, उचित समय की प्रतीक्षा की और जब महाराजा ने ‘विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर कर दिए तो नेहरूजी ने तत्काल सर्वश्रेष्ठ कदम उठाए। शेख अब्दुला से उनकी  मित्रता रंग लाई, जनमत को  भारत विलय के पक्ष में तैयार किया गया।

कबाइलियों के आक्रमण से निपटने के लिए नेहरूजी ने कश्मीर में सेना भेजने से भी परहेज नहीं किया और फौज को बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के अपना कार्य अठारह माह तक निष्पादित करने दिया। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ में तो भारत इस मामले को लार्ड माउण्टबेटन के कहने पर ले गया और जब उसके प्रस्ताव भारत के पक्ष में नहीं दिखे तो नेहरूजी ने उन्हें लागू करने से इंकार करने का साहस दिखाया। धारा 370 विलय की बुनियाद को पुख्ता करने उस वक्त आवश्यक थी। इसके बहुत से प्रावधान तो नेहरूजी व इंदिरा गांधी के समय में ही कमजोर बना दिए गए थे।  यद्यपि शेख अब्दुला से पंडित नेहरू की घनिष्ठ मित्रता थी, पर उनकी भारत विरोधी गतिविधियों को देखते हुए उन्हें गिरफ्तार करने से भी वे पीछे नहीं हटे।

नेहरूजी का अप्रतिम योगदान भारत की विदेश नीति बनाने व विश्वशान्ति के लिए है। जब विश्व शीतयुद्ध के दौर में रूस और अमेरिका के बीच बंटा हुआ था तब उन्होंने ‘गुट निरपेक्ष आंदोलन’ की नींव रखी और साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त हुए नव-स्वतंत्र देशों का नेतृत्व करने का भारत को सुनहरा अवसर प्रदान कराया। अपने कूटनीतिक कौशल से उन्होंने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का नेतृत्व करने के साथ-साथ अमेरिका और सोवियत रूस से भारत के मधुर संबंध बनाए रखने में सफलता हासिल की। इन संबंधों का लाभ देश को आर्थिक विकास हेतु वित्तीय सहायता व तकनीकी कौशल हासिल करने में मिला।  

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चीन के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को सम्मान देने के लिए ‘पंचशील समझौता’ नेहरू जी की दूरदृष्टि का परिचायक है। चीन से उनकी यह नीति नव-स्वतंत्र भारत के लिए जरूरी भी थी। हमारे सीमित संसाधनों को यदि फौजी साज-सामान खरीदने में व्यय कर दिया जाता तो देश का आर्थिक विकास बाधित हो जाता। नेहरू जी के नेतृत्व में दिल्ली में आयोजित ‘एशियाई कांफ्रेस’ ने विश्व-शांति की दिशा में विशिष्ट भूमिका निभाई।  सोवियत रूस, चीन, जापान समेत एशिया के सभी प्रमुख देशों ने नेहरू जी की इस पहल का दिल से स्वागत किया। इंडोनेशिया के वाडुंग में आयोजित सम्मेलन ने तो अफ्रीकी और एशियाई देशों को एक-दूसरे के करीब लाने और आपसी सहयोग व भाईचारा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।   

नेहरूजी के इन तमाम योगदानों का आकलन समग्र रूप से करने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है कि नेहरू जी से चूक नहीं हुई, लेकिन गरीब, पिछड़े और सांप-सपेरों की छवि वाले भारत को विकासशील देश बनाने और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्षरत देशों को नेतृत्व प्रदान करने के लिए उनका स्मरण किया जाना जरूरी है। नेहरूजी को हमें इसलिए भी याद रखना चाहिए क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिकता की आग में जल रहे उपमहाद्वीप में हिन्दू-मुस्लिम एकता के संदेश को मजबूती प्रदान की।

जब दिल्ली दंगों से कराह रही थी, एक ओर शरणार्थियों के कैंप तो दूसरी तरफ पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों की भीड़ दिल्ली में अराजकता फैला रही थी, तब नेहरूजी ही ऐसे नेता थे जो अनियंत्रित भीड़ में घुसकर लोगों को फटकार लगा सकते थे। वे सभी पीड़ितों की बिना किसी धार्मिक भेदभाव के मदद करते थे। नेहरूजी को ‘हिन्दू कोड बिल’ जैसे सामाजिक सुधारों के लिए भी याद किया जाना चाहिए। अपने इन्हीं गुणों के चलते वे भारत की जनता के जवाहर बने रहेंगे। (सप्रेस)

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