जिद्दू कृष्णमूर्ति Jiddu Krishnamurthy : देखने और सुनने की कला बने शिक्षा का हिस्सा

12 मई : जन्‍म दिवस प्रसंग

चैतन्य नागर

कृष्णमूर्ति Jiddu Krishnamurthy ने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्कूल में शिक्षक और छात्र दोनों ही जीवन के बुनियादी सवालों की पड़ताल करें बगैर किसी दबाव के। यह पड़ताल बाहरी दुनिया से शुरू हो, और समझ के साथ-साथ वह अन्तरतम में प्रवेश करे। बाहरी और भीतरी दुनिया के बीच इन्द्रिय-बोध एक सेतु का काम करता है और इसलिए देखना और सुनना दोनों ही अत्यन्त आवश्यक है।

“शिक्षक को शिक्षित होने की ज़रूरत है। केवल बच्चों को ही नहीं, अभिभावकों को भी शिक्षा की ज़रूरत है। और यदि अभिभावकों को अपने बच्चों से प्यार है —प्यार, न कि खिलौने की तरह उनके साथ खेलना, आपको तो पता ही वह सब—अगर सच में उन्हें प्यार है तो क्या वे अपने बच्चों को मरने या मारने देंगे? शायद पूरे यूरोप में सरकार की यह अपेक्षा होती है कि आप दो साल के लिए फौज में जाएं ताकि आप दूसरे मनुष्य को कैसे मारा जाए, यह सब सीख सकें। माताएं इसे स्वीकार कर लेती हैं, पिता इसे स्वीकार कर लेते हैं, यह कहकर कि ‘‘हम कुछ नहीं कर सकते हैं, सरकार की यह मांग है”।  

शिक्षा का अर्थ है जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण का होना, मस्तिष्क को तकनीकी तौर पर विकसित करना और साथ ही मस्तिष्क को अपने ही क्षुद्र स्व से स्वतंत्र करना। जब तक बच्चे दो या पांच साल के होते हैं वे उनको खूब लाड़-दुलार करते हैं, अपनी गोद में बैठाते हैं, पुचकारते हैं और फिर उनको किस्मत के हवाले छोड़ देते हैं। और इसे शिक्षा कहा जाता है। जब आपका मस्तिष्क को संस्कारबद्ध किया जा रहा है तो फिर प्रज्ञा कैसे आ सकती है? एक तरफ जानकारी के द्वारा संस्कारबद्ध करना और दूसरी तरफ आपके अपने डरों, चिंताओं, अकेलेपन, निराशा और मनुष्य की बाकी कुरूपताओं के द्वारा। और इस सबके ऊपर मंदिर, चर्च और मस्जिदें हैं…समझ रहे हैं आप? जबकि शिक्षा का मतलब है जहां पर आदर हो, प्रेम हो, स्नेह हो। — जे0 कृष्णमूर्ति, ज़ानेन, स्विट्ज़रलैंड, दूसरी सार्वजनिक प्रश्नोत्तर सभा, 24 जुलाई 1984

कृष्णमूर्ति ने शिक्षा के क्षेत्र मे जो अंतर्दृष्टियां साझा की वे बहुत ही गहरे अर्थ में क्रान्तिकारी रही है। आज की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है किसी व्यक्ति को नौकरी पेशे के लिए तैयार करना, सफल होने में उसकी मदद करना, और लगातार कामयाबी की सीढि़यों पर चढ़ने के लिए उसे प्रोत्साहित करना। लेकिन क्या शिक्षा का यह भी उद्देश्य नही कि वह स्वस्थ, प्रज्ञावान और सुखी मनुष्य को भी जन्म दे ? इस संबंध में कृष्णमूर्ति का सुझाव है कि हम अपनी अन्दरूनी प्रकृति के बारे में सीखें, अपने विचारों, भावनाओं, अनुभूतियों का अवलोकन करें और साथ ही बाह्य स्थितियों को भी समझें, जिससे समूचे विश्व में मानवीय दशा में परिवर्तन लाया जा सके । इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रारम्भिक स्तर पर ही शिक्षक उन बाधाओं पर ग़ौर करे और समझे जो उसे मौलिक होने और किसी भी वस्तु को उसकी समग्रता मे समझने से रोकती है ।

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जब हम अपने चारों ओर नजर डालते हैं तो यह तुरंत ही समझ में आता है व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर हम एक गंभीर व्याधि का शिकार होते जा रहे हैं। हर दिन आपके सुबह उठने और रात में सोने के बीच धरती से पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं की 250 प्रजातियां विलुप्त हो जाती है। कोई समझ नहीं पाता कि विज्ञान और तकनीकी प्रगति के शिखर पर बैठा 21वीं सदी का मानव इस तरह की हरकतें कैसे कर जाता है। हमारी बाहरी दुनिया चमक-दमक से भरी जा रही है और एक अजीब तरह का अंधेरा, सूनापन हमारे दिलों, हमारे आपसी संबंधों में प्रवेश करता जा रहा है ।

भारत में और बाहर के देशों में भी अक्सर लोग जानना चाहते हैं कि जिद्दू कृष्णमूर्ति का शिक्षा दर्शन क्या है। कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इंडिया भारत में ऐसे स्कूल चलाता है जिन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ स्कूलों में गिना जाता है । क्या है इन स्कूलों में कि इन्हें इतनी गंभीरता से लिया जाता है एवं इतने सम्मान से देखा जाता है ? कृष्णमूर्ति स्कूल वास्तव मे है क्या ? मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ये स्कूल सही जीवन जीने की दिशा में एक प्रयास है । लेकिन यह एक अनूठा प्रयोग इस अर्थ में है क्योंकि इस प्रयोग में कोई किसी को यह नहीं समझा रहा होता कि सही ढंग से जीना क्या है, और इस बारे में किसी तरह के फॉर्मूले तय नहीं किये गये हैं । न कोई नुस्खा है, और न कोई सत्ता है जो आपकेा यह बताती है कि इस तरह का जीवन क्या है । जब तक हम स्वयं यह नहीं जानते कि सही ढंग से जीना क्या है, हम अपने बच्चों को भी नहीं बता सकते कि यह क्या है। तो सबसे पहले यह जिम्मेदारी माता-पिता और शिक्षक की है कि वे पता लगायें कि सही जीवन आखिर है क्या।  

हमारी जिंदगी के चार मुख्य पहलू है—भौतिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक। सही तरीके से जीने का अर्थ है कि इन सभी पहलुओं में एक तरह की उत्कष्टता हो । इन सभी पहलुओं का एक स्वस्थ, सर्वांगीण विकास हो। इसलिए यह आवश्यक है कि कृष्णमूर्ति स्कूल में इन सभी पहलुओं पर समान रूप से ध्‍यान दिया जाये, न कि किसी एक हिस्से पर । शिक्षा सिर्फ बौद्धिक विकास के लिए नहीं हो सकती-इसलिए कृष्णमूर्ति ने आवासीय स्कूलों की स्थापना की जहाँ  शिक्षक, छात्र-छात्रायें और विद्यालय के अन्य लोग एक-दूसरे के साथ शिक्षा और जीवन के प्रश्नों पर संवाद कर सकें।

स्कूल के ध्येय को कृष्णमूर्ति इस तरह स्पष्ट करते हैं-‘‘स्कूल एक ऐसा स्थान है जहाँ हम समग्रता के संबंध में सीखते है, जीवन की सम्पूर्णता के बारे में सीखते हैं । यह एक ऐसी जगह है जहां छात्र और शिक्षक दोनों ही जांच-पड़ताल करते है, न सिर्फ बाहरी दुनिया की, ज्ञान के क्षेत्र की, बल्कि अपने स्वयं के विचारों की भी, अपने स्वयं के व्यवहार की भी। यहां उन्‍हें पता चलता है कि वे कितने बंधे हुए है अपने संस्कारों के साथ और यह कि संस्कारबद्धता किस तरह उनकी सोच को विकृत कर दे रही हैं।’’

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उन्‍होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि वे ‘सजगता के वैज्ञानिक’बनें । वे बच्चों में संवेदनशीलता और प्रज्ञा को जन्म दें । कृष्णमूर्ति का शिक्षा दर्शन सीखने और जीने के मनोविज्ञान पर ही मुख्य रूप से केन्द्रित था । “ यह (स्कूल) एक ऐसी जगह है जहां से हम दुनिया को देखना सीखते हैं-किसी विचारधारा या के द्वारा नहीं, हम सीखते हैं समूची मानवता के संघर्ष के बारे में, सौन्दर्य की उसकी तलाश, सत्य की खोज और एक ऐसे जीवन की खोज के बारे में जिसमें कोई भी क्लेश न हो। “ कृष्णमूर्ति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्कूल में शिक्षक और छात्र दोनों ही जीवन के बुनियादी सवालों की पड़ताल करें बगैर किसी दबाव के। यह पड़ताल बाहरी दुनिया से शुरू हो, और समझ के साथ-साथ वह अन्तरतम में प्रवेश करे। बाहरी और भीतरी दुनिया के बीच इन्द्रिय-बोध एक सेतु का काम करता है और इसलिए देखना और सुनना दोनों ही अत्यन्त आवश्यक है। एक ऐसा माहौल बने जहां लोग सुनने और देखने की कला से परिचित हो सकें। जहां प्रज्ञा जाग सके, अच्छाई खिल सके। कृष्णमूर्ति ने प्रज्ञा (इंटेलिजेंस)और अच्छाई (गुडनेस) दोनों पर समान रूप से जोर दिया ।

सुनने की कला:
ऐन्द्रिक क्षमता स्कूल मे पढ़ाया जाने वाला विषय नहीं है। शायद इसे सिखाया भी नहीं जा सकता। इसकी आवश्यकता है कि सुनने की कला पर ध्यान दिया जाये। बच्‍चों के लिए और वयस्कों के लिए भी। ध्वनियों के संसार को सुनना, कहे गये शब्द और उसके अर्थ को सुनना, न सुन पाने के मनोवैज्ञानिक निहितार्थों  को सुनना, गलतफहमियों और सुनने के रास्ते में खड़ी बाधाओं को सुनना—यह सब कुछ हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए।

कृष्णमूर्ति का मानना है कि सुनना जीवन की महानतम्, सर्वोच्च कलाओं में से एक है। उनका कहना है, ‘‘सुनना एक कला है जो आसानी से नहीं आती। इसमें सौन्दर्य और गहरी समझ है। हम अपने अस्तित्व की विभिन्न गहराइयों से सुनते है, लेकिन यह सुनना हमेशा एक पूर्वनिर्मित धारणा या किसी खास विचारधारा के जरिये होता है। हम सिर्फ सुनते नहीं सहज रूप से, हमेशा  विचारों, और  पूर्वाग्रहों का एक परदा होता है, हस्तक्षेप करता हुआ। सुनने के लिए जरूरी है कि आप भीतर से खामोश हों, कुछ हासिल करने के दबाव से मुक्त रहें, एक तनावरहित अवधान में हों। यह सजग लेकिन निष्क्रिय अवस्था उसे सुन पाती है जो शाब्दिक निष्कर्षों से परे होता है। शब्द तो उलझाते हैं, वे बाहरी माध्यम भर हैं बातचीत का, लेकिन शब्दों के शोर से दूर हटकर संवाद स्थापित करना हो तो जरूरी है कि श्रवण हो, एक सजग निष्क्रियता हो। “ सही सुनना प्रज्ञा का ही हिस्सा है। कृष्णमूर्ति इसे इस तरह समझाते है: ‘‘मुझे नहीं मालूम कि आपने कभी किसी पक्षी को सुना है या नहीं। किसी को सुनने के लिए आपका मन शांत होना चाहिए-कोई रहस्यवादी शांति नहीं, सिर्फ खामोशी। मैं आपसे कुछ कह रहा हॅूं, और मुझे सुनने के लिए यह जरूरी है कि आप खामोश हों, न कि आपके मन में तमाम तरह के विचार भनभनाते रहें। इसीलिए मैं कहता हॅूं कि सुनना सबसे कठिन चीजों में से एक है-किसी कम्युनिस्ट को सुनना, किसी समाजवादी या लोकतंत्रवादी या पूंजीवादी को सुनना, किसी को भी सुनना-अपनी पत्नी, बच्चों, अपने पड़ोसी, बस कंडक्टर को या किसी पक्षी को सिर्फ तभी आप सीधे संपर्क में रहते हैं और जब आप सीधे संपर्क में होते हैं, तब आप समझ पाते है कि जो कहा जा रहा है सत्य है या मिथ्या। आपको किसी विचार-विमर्श की जरूरत नहीं पड़ती।’’

देखने की कला:
ऑल्डस हक्सले अक्सर कृष्णमूर्ति के साथ सैर पर निकलते थे । ऐसे ही एक अवसर पर कृष्णमूर्ति ने उनसे कहा, ‘‘क्या वनस्पति शास्त्र की जानकारियों से हटकर तुम किसी फूल को देख सकते हो ? इस पर हक्स्ले ने कहा ‘आप जो देख रहे हैं, वैसा देखने के लिए मैं अपना सबकुछ दे सकता हॅूं, पर मेरी जानकारी, मेरा ज्ञान मेरे लिए दीवार की तरह बाधा बनकर खड़ा है।’

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कृष्णमूर्ति सुझाव देते हैं: ‘‘यदि आप किसी पत्ती के बारे सीखना चाहते हैं वसंत ऋतु या फिर गर्मी के महीनों की किसी पत्ती के बारे में-तो आपको इसे देखना होगा, इसकी समरूपता को, इसके ओज को, इस जीवंत पत्ती की किस्म को । एक पत्ती का अपना सौन्दर्य है, अपनी जीवंतता है, अपना बल है । किसी भी पत्ती, फूल, बादल, सूर्यास्त या किसी इन्सान को समझने के लिए आपको पूरी तीव्रता के साथ उसे देखना होगा ।’’ यह तीव्रता कहां से आती है ? क्या यह अवधान, संवेदनशीलता और स्नेह से जन्म लेती है ? क्या एक अति-उत्साही, आवश्यकता से अधिक सक्रिय मन के स्थगन से यह तीव्रता आती है, चाहे यह स्थगन कितना ही अस्थायी क्यों न हो ?

किसी भी शिक्षण संस्थान को, यदि वह एक नैतिक अस्तित्व की नींव रखना चाहता है, सही अर्थ में समाज में बुनियादी परिवर्तन चाहता है, उसे अन्दरूनी मानवीय प्रकृति पर ध्यान देना ही होगा । यही प्रकृति हमारे वाह्य क्रियाकलापों और गतिविधियों का नियंत्रण करती है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसकी आवश्यकता अचानक आज ही महसूस नहीं की जा रही है, बल्कि इतिहास की शुरूआत से ही इसकी जरूरत रही है। हो सकता है कि अपने आप में यही काफी न हो, लेकिन एक जिम्मेदार और सही अर्थ में नैतिक शिक्षा के लिए इसकी शुरूआत अत्यावश्यक है।

(लेखक कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इंडिया की पत्रिका “परिसंवाद” के संपादककृष्णमूर्ति स्टडी सेंटर के प्रमुख और जे कृष्णमूर्ति प्रज्ञा परिषद के सदस्य रहे हैं।)

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