Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

क्‍या हम बचा पाएंगे अपने जंगल ?

कुमार सिद्धार्थ

वनों के महत्व को समझने-समझाने में हम लगातार चूक कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हम लगातार वनों को खोते जा रहे हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण चाहे कितना भी दावा कर लें, पर वनों का प्रतिशत संतोषजनक नहीं माना जा सकता। हरे आवरण के इस तरह नष्ट हो जाने से भू-संरक्षण, बाढ़ और आपदाओं की घटनायें बढ़ने लगी हैं। वर्तमान में प्राणवायु (आक्सीजन) प्रदान करने वाले जंगल खुद अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

वन के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके बावजूद अपने देश में वनों के हालात बदतर होते जा रहे हैं। विकास के नाम पर देश-दुनिया में जंगल निरंतर काटे जा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार बीते ढाई दशकों में दुनिया ने हर घंटे एक हजार फुटबॉल मैदान के बराबर वन क्षेत्र को खोया है। साल 2014 से 2017 के बीच हमारे देश में हर दिन 63 फुटबॉल मैदान के बराबर जंगली इलाके को खेत, खनन, शहर, सड़क और उद्योग के लिए उजाड़ा गया। दर असल देश में जिस रफ्तार से विकास कार्यों के लिए वनों का पतन हो रहा है, उसके सापेक्ष भरपाई नहीं हो पा रही है।

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय व्‍दारा द्विवार्षिक स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021 जारी की है। इस रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि देश में जंगलों का विस्‍तार हो रहा है। अभी देश में जंगलों का इलाका बढ़ कर 7,13,789 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जो कि भौगोलिक इलाके का 21.71 प्रतिशत है। लेकिन इसे  2019 की रिपोर्ट (21.67 प्रतिशत) से तुलना करें तो बस थोड़ी-सी वृद्धि ही पाएंगे। यह तथ्‍य भी गौर करने लायक है कि  पिछले दो वर्षों में देश में 1,643 वर्ग किलोमीटर घना जंगल ‘विकास’ के नाम पर भेंट चढ़ गया।

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वन सर्वेक्षण रिपेार्ट बताती है कि देश के बड़े राज्यों में शुमार मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में जंगलों की स्थिति फिसड्डी साबित हुई है। मध्य प्रदेश में बड़े हरियाली महोत्‍सव, महापौधारोपण अभियानों जैसी कवायद के बावजूद मात्र 11 वर्ग किलोमीटर जंगल में इजाफा हो पाया। वहीं उत्तर प्रदेश में 12, गुजरात में 69, महाराष्ट्र में 20  वर्ग किलोमीटर जंगल में ही बढ़ोतरी दर्ज हुई है। वन क्षेत्र में सबसे अधिक बढ़ोतरी आंध्र प्रदेश (647 वर्ग किमी), तेलंगाना (632 वर्ग किमी), ओडिशा (537 वर्ग किमी), कर्नाटक (155 वर्ग किमी) और झारखंड (110 वर्ग किमी) में दर्ज की गई। लेकिन 11 राज्यों में जंगलों का इलाका कम हुआ है। उनमें अरुणाचल प्रदेश में सबसे अधिक 257 वर्ग किलोमीटर जंगल में कमी आई है। उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर में 249 वर्ग किलोमीटर, मिजोरम में 186, नागालैंड में 235, असम में 15 और पश्चिम बंगाल में 70 वर्ग किलोमीटर वनों का आवरण कम हुआ है।

लेकिन ताजा वन सर्वेक्षण रिपेार्ट में इस बार वनाग्नि के बारे में खुलासा किया है। आंकड़ों को जानकर आश्‍चर्य हुआ कि देशभर में जलवायु परिवर्तन और अन्य मानव जनित कारणों से वनों में आग लगने की घटनाओं में 350 से 500 गुना वृद्धि हुई है। देश में सन् 2020-2021 में जंगलों में आग की लगभग चार लाख से अधिक घटनाओं की सूचनाएं मिली है, जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने से अधिक है।

एक आकलन के मुताबिक देश का 11,094 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र आग में स्‍वाह हो गया, जो देश के कुल वन क्षेत्र का 1.56 प्रतिशत है। रिपोर्ट में  इस बात का भी  विश्लेषण किया गया है कि भारत में करीब 10 प्रतिशत वन क्षेत्र ऐसा है जो आग से बार-बार प्रभावित होता है। वन विभाग के पास पर्याप्त स्टाफ और संसाधनों की भी कमी है।

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पिछले कुछ सालों से वनों में आग की संख्या और उनका विकराल आकार चिन्ता का विषय है। आंकडे बताते है कि पिछले कुछ सालों में भारत में जंगलों में आग लगने की घटनाओं में अधिक बढ़ोतरी हुई है। वैश्विक स्तर पर वनों की निगरानी रखने वाली संस्था ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, असम और बिहार जंगली आग से प्रभावित राज्‍यों में मुख्‍य है।

केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश के 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दावानल की घटनाओं में इजाफा हुआ है। नवंबर 2020 से जून 2021 के बीच आग लगने की सबसे अधिक 51,968 घटनाएं ओडिशा में दर्ज की गईं। जहां एक वर्ष में आग लगने की घटनाएं करीब 500 प्रतिशत बढ़ गईं। वहीं दावानल की सबसे अधिक घटनाएं मध्य प्रदेश में हुईं। यहां भी ऐसी कुल 47,795 घटनाएं हुईं, जो नंवबर 2019 से जून 2020 के बीच की 9,537 घटनाओं से करीब 500 प्रतिशत अधिक हैं। वहीं छत्तीसगढ़ के जंगलों में भी आग की  38,106 घटनाएं दर्ज की गई।  

अनुमान है कि दुनिया के लगभग एक तिहाई हिस्से यानी धरती के लगभग 406 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल हैं। लेकिन इनकी संख्या लगातार कम हो रही हैं। हर पांच साल में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स असेसमेंट (एफआरए) 2020 रिपोर्ट बताती है कि 1990 से लेकर 2020 तक लगभग 42 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में लगे जंगलों को काट दिया गया।

विडंबना है कि हरियाली के नाम की जा रही कवायदों के बावजूद भी वनों के क्षेत्रफल में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही हैं, जबकि जंगलों में साल दर साल हर मौसम में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि होती जा रही है। जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं से कीट-पतंगों, पक्षियों और जानवरों की हजारों प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि वनों के विनाश से वातारण जहरीला होता जा रहा है। प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है जिससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। एक अन्य आंकड़ें के मुताबिक अब तक वायुमण्डल में 36 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और वायुमण्डल से 24 लाख टन ऑक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण माना जा रहा है।

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वनों के महत्व को समझने-समझाने में हम लगातार चूक कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हम लगातार वनों को खोते जा रहे हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण चाहे कितना भी दावा कर लें, पर वनों का प्रतिशत संतोषजनक नहीं माना जा सकता। हरे आवरण के इस तरह नष्ट हो जाने से भू-संरक्षण, बाढ़ और आपदाओं की घटनायें बढ़ने लगी हैं। वर्तमान में प्राणवायु (आक्सीजन) प्रदान करने वाले जंगल खुद अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमें पूरी सजगता से वन क्षेत्रों के संरक्षण को प्राथमिकता देकर विकास, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की संतुलित नीति और कार्य-योजना बनाकर कदम आगे बढ़ाने होंगे। यदि धरती के साथ हमने अपना निष्ठुर व्यवहार नहीं बदला तो आने वाले वर्षों में धरती से मानव सभ्‍यता का अस्तित्व मिटना तय है।

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