ऑनलाइन शिक्षा निष्प्रभावी एवं स्कूलों को खोलने के लिए अभिभावकों का ज़बरदस्त समर्थन

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के शोध अध्‍ययन ‘ऑनलाइन शिक्षा के भ्रम’  से उभरे निष्‍कर्ष

बेंगलूरु, 17 नवम्बर 2020 । ऑनलाइन शिक्षा के भ्रम  पर किये गए शोध अध्‍ययन में पाया गया है कि  ऑनलाइन शिक्षा निष्प्रभावी है । शिक्षकों ने ऑनलाइन कक्षाओं को लेकर अपनी प्रोफेशनल निराशा ज़ाहिर की। 80 फ़ीसदी से भी ज़्यादा शिक्षकों ने बताया कि ऐसी कक्षाओं में बच्चों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाए रख पाना असम्भव होता है जिससे शिक्षा की बुनियाद ही टूट जाती है। 90 फ़ीसदी से भी ज़्यादा शिक्षकों का मानना था कि ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान बच्चे क्या सीख रहे हैं इसका कोई सार्थक मूल्यांकन सम्भव नहीं है। 70 फ़ीसदी से भी ज़्यादा अभिभावक भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं कि ऑनलाइन कक्षाएँ बच्चों के सीखने के लिहाज़ से प्रभावशाली नहीं हैं।

वहीं स्कूलों को खोलने के लिए अभिभावकों का ज़बरदस्त समर्थन  मिला है। अध्‍ययन बताता है कि लगभग 90 फ़ीसदी अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि स्कूल खुलने पर उनके बच्चों की सेहत का ध्यान रखा जाए। 

यह अध्ययन 5 राज्यों के 26 ज़िलों में किया गया और इसमें 1522 स्कूल शामिल थे। इन सरकारी स्कूलों में 80,000 से भी ज़्यादा विद्यार्थी पढ़ाई करते हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य ऑनलाइन शिक्षा के बारे में बच्चों व शिक्षकों के अनुभवों को समझना था।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बंगलूरू व्‍दारा ‘ऑनलाइन शिक्षा के भ्रम’  पर किए गए ज़मीनी अध्ययन  में ये बातें उभर कर आई है।  अध्‍ययन में यह  भी पाया गया है कि शिक्षकों व अभिभावकों के एक बड़े हिस्से के अनुसार ऑनलाइन माध्यम शिक्षा के लिए अपर्याप्त और अप्रभावी है। ज़्यादातर अभिभावक ज़रूरी सुरक्षा इन्तज़ामों के साथ अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हैं और उनको यह नहीं लगता कि ऐसा करने से उनके बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।  यह अध्ययन विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

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 इस शोध अध्‍ययन के संबंध में अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के कुलपति अनुराग बेहार का कहना है कि ‘ऑनलाइन शिक्षा केवल इसलिए अप्रभावी नहीं है कि स्कूली बच्चों की पहुंच नेट या ऑनलाइन संसाधनों तक नहीं है बल्कि शिक्षा की बुनियादी प्रकृति इसके ठीक विपरीत है। शिक्षा के लिए वास्तविक उपस्थिति, मनोयोग, विचार और भावनाओं की ज़रूरत होती है। इन सबको सीखने के लक्ष्यों की दिशा में क्रमबद्ध तरीक़े से और कई बार आगे-पीछे होते हुए हर बच्चे के लिए अलग-अलग ढंग से आपस में पिरोया जाता है। इसके लिए शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच गहन मौखिक व अमौखिक अन्तःक्रिया की ज़रूरत होती है जो वास्तविक कक्षा में ही सम्भव है,’

अध्ययन करने वाली शोध टीम के सदस्य राहुल मुखोपाध्याय और आँचल चोमल का कहना है कि “इस अध्ययन में सीखने के सार्थक मौक़े उपलब्ध कराने में ऑनलाइन शिक्षण की प्रभावहीनता, संसाधनों की कमी के कारण बहुसंख्यक बच्चों के वंचित रह जाने, और शिक्षकों की प्रोफेशनल निराशा का खुलासा हुआ।”

इस अध्ययन से सामने आए अन्‍य प्रमुख तथ्यों में 60 फ़ीसदी से भी ज़्यादा बच्चे ऑनलाइन शिक्षा के अवसरों तक नहीं पहुँच पाते हैं। इसकी वजहों में ख़ासतौर से पढ़ाई के लिए इस्तेमाल या साझा किए जा सकने वाले स्मार्टफ़ोनों का अनुपलब्ध होना या उनका पर्याप्त संख्या में न होना, और ऑनलाइन शिक्षा के लिए ज़रूरी ऐप्स के इस्तेमाल में आने वाली दिक़्क़तें हैं। ये समस्या अन्यथा-सक्षम बच्चों के लिए तो और भी गम्भीर है। ऐसे 90 फ़ीसदी शिक्षकों ने, जिनकी नियमित कक्षा में अन्यथा-सक्षम बच्चे शामिल रहे हैं, पाया कि ये बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं में भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं।  

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उल्‍लेखनीय है कि अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के तहत अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय निजी विश्वविद्यालय के रूप में कार्यरत है। विश्वविद्यालय एक न्यायपूर्ण, समतामूलक, मानवीय व टिकाऊ समाज की स्थापना के स्पष्ट सामाजिक उद्देश्य से संचालित है। शिक्षा व विकास के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं के विकास, वर्तमान में काम कर रहे लोगों के क्षमता संवर्धन और इन क्षेत्रों में ज्ञान निर्माण में अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ख़ास भूमिका है। यह विश्वविद्यालय शिक्षा व विकास के क्षेत्र में भारत के समक्ष मौजूद चुनौतियों के सन्दर्भ में फ़ाउण्डेशन की एक प्रमुख पहल है।

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