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सिनेमा की सार्थकता : जावेद अनीस की जरूरी किताब

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करीब डेढ साल पहले हम सबसे अचानक सदा के लिए विदा लेने वाले जावेद अनीस ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर अपनी कलम चलाई थी। फिल्में भी उनकी नजर और नजरिए से बची नहीं थीं। हाल में फिल्मों पर लिखे उनके लेखों का एक संकलन ‘हमारे दौर में सिनेमा’ प्रकाशित हुआ है।


‘हमारे दौर में सिनेमा’ की समीक्षाओं से गुजरते हुए साफ़ हो जाता है कि जावेद के पास नजर भी है, नजरिया भी। दृष्टि अमूमन सभी के पास होती है, मगर दृष्टिकोण परवरिश और मेहनत माँगता है। ‘हमारे दौर के सिनेमा’ में जावेद सिर्फ फिल्म की बात नहीं करते, उसके क्राफ्ट के साथ उसके असर की बात करते हैं और उसी के साथ-साथ समाज के यथार्थ से उसके जुड़ाव की बात करते हैं। 

फ़िल्में मनोरंजन का साधन मानी जाती हैं, हैं भी। मगर यथार्थ और मनोरंजन के बीच पारस्परिक पूरकता है। फिल्में अपने समय के सामाजिक यथार्थ से अलग नहीं होती। वे दर्शकों के सोच, संस्कार और अभिरुचि का ध्यान रखती हैं, वहीँ उन्हें दोनों तरह से प्रभावित करती हैं : संस्कारित और कुसंस्कारित भी कर सकती हैं। फ़िल्में एक बेहतरीन सम्मिश्रण होती हैं। वे एक साथ सुख-दुःख, आनन्द-पीड़ा, सामंजस्य और संघर्ष के समावेश का ध्यान रखती हैं। 

इस तरह फिल्मों की एक द्वंद्वात्मक – डायलेक्टिकल – भूमिका होती है। अपने कालखंड के परिवेश से वे प्रभावित भी हो रही होती हैं और इसी के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक ढांचे को प्रभावित भी कर रही होती हैं। ‘हमारे दौर में सिनेमा’ में कुल जमा 28 फिल्मों और एक शख्सियत दिलीप कुमार पर केन्द्रित व्यक्ति चित्र यानि 29 लेख हैं।

समीक्षा का जावेद का तरीका अलग है, वे फिल्मों की डी-कोडिंग करते हैं। यहाँ सिर्फ दो फिल्मों का जिक्र करते हैं। रजनीकांत और नाना पाटेकर, हुमा कुरैशी और अंजलि पाटिल की फिल्म ‘काला’ और शाहरुख खान, माहिरा खान, नवाज़ुद्दीन और जीशान की ‘रईस।’ दोनों में जावेद ठीक वही बात पकड़ते हैं जो पकड़ी जानी चाहिए। दिखने में दोनों पापुलर फिल्में हैं, लेकिन दोनों ही राजनीतिक फिल्में हैं।

‘काला’ तीन बड़े सवाल उठाती है – विस्थापन और ध्वंस, जिसके निशाने पर जाहिर है वंचित समुदाय प्रमुख है। फिल्म इसे वर्गीय नजरिये से उठाती है। यह वह नजरिया है जिसे इन दिनों फिल्मों में बहुत कम कर दिया गया है। दूसरा, सामाजिक भेदभाव और उसके प्रतिकार में जरूरी एकता का ‘छाता’ देती है। तीसरे, फिल्म लाल और नीले के मेल के साथ पूरी होती है, जो आज का सबसे सटीक ‘राजनीतिक वक्तव्य,’ ‘पोलिटिकल स्टेटमेंट’ है। 

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फ़िल्म जहां इंडिया और भारत – अमीरी और गरीबी के बीच के संघर्ष को मुखरता से उठाती है, धन-पशुओं के नखशिख साफ़-साफ़ दिखाती है, वहीँ इसकी एक सहधारा भी है जो फ़िल्म में शुरू से अन्त तक दिखती भी है और बोलती भी। जाति श्रेष्ठता के दम्भ का प्रतिकार करती, पूरी ठसक के साथ उसके श्रेणीक्रम का धिक्कार करती। फ़िल्म ने साहस के साथ इस जन्मना श्रेष्ठता के धर्म को मय मन्त्रों और पुरोहिताई के ठगतंत्रों के साथ प्रस्तुत किया है – जाति के रूप में भी धर्म के नाम पर भी।

इन दोनों धाराओं के साथ एक तीसरी धारा भी चलती है। स्त्री मुक्ति और समानता की धारा। धरा के नीचे बहने वाली नदियों की तरह भूजल का स्तर ऊंचा रखती, ऊपर चलती बयार को शीतल और सुगन्धित रखती। बॉक्स-ऑफिस, सुपर स्टार और पॉपुलर सिनेमा आदि के लिहाज से यह जोखिम का काम है। इसी के साथ फिल्म प्रेम को भी बहुत सकारात्मक तरीके से रखती है : पत्नी और पूर्व प्रेमिका के द्वैत को अद्वैत में देखती है।

इसी तरह से ‘रईस’ है – जिसमें एक ‘बूटलेगर’ यानि शराब के तस्कर को उसके खलनायकत्व के रूप में नहीं, उसके पूरे विकास में – एक बेरोजगार युवा से शराब तस्कर बन जाने के रूप में रखा जाता है। जावेद ठीक दर्ज करते हैं कि इसमें रईस – जो एक वास्तविक व्यक्ति से उठाया गया चरित्र है, सिर्फ मुसलमान नहीं है – इस फिल्म में हिन्दू-मुसलमान उतना ही है जितना इन दिनों बनाने की कोशिश की जाती है। राजनीतिक इस्तेमाल के लिए गढ़ा गया मुसलमान, नागरिक समाज का मुसलमान नहीं।

‘रईस’ पर लिखते हुए जावेद ने शाहरुख़ खान की एक ख़ास बात याद दिलाई है कि वे ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने आज के दौर में मुस्लिम चरित्र के नायकों वाली फिल्में बनाई हैं। धड़ल्ले से बनाई हैं : बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने वाली बनाई हैं। शाहरुख को अभिनय की बजाय ग्लैमर के लिए जाना जाता है, मगर ‘माय नेम इज खान’ जैसी अनेक फिल्मों में उन्होंने अपनी क्षमता दिखाई है। जो बात शाहरुख को बाकी अनेक अभिनेताओं से अलग करती है वह उनकी कथनी-करनी दोनों के एक जैसा होने के प्रति सजग होना है। उन्होंने धीमी तीव्रता के साम्प्रदायिक जहर वाली फिल्मों में न काम किया न बनाया। सिर्फ पैसे के लिए ‘सरफ़रोश’ या ‘वेडनेसडे’ जैसे प्रयोग उन्होंने नहीं किये। 

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जावेद फिल्मों की स्कैनिंग भी करते हैं, ऑटोप्सी भी। वे भारतीय, विशेषकर बॉलीवुड की फिल्मों में दक्षिणपंथ की घुसपैठ का अध्ययन करते हैं, सिनेमा की वर्तनी और भाषा शैली में आये बदलाव को देखते हैं। ‘तनु वेड्स मनु’ की उनकी समीक्षा में कंगना रानौत सराहना ठीक ही पाती हैं। एक्ट्रेस कंगना ने एक-दो और फिल्मों में उत्कृष्ट अभिनय किया है। विचारधारा आपके सृजन, यहाँ तक कि शक्ल में भी कैसा बदलाव ला देती है इसका उदाहरण आज भले कंगना बन गयी हों – मगर जब वे आई थीं तब उन्होंने कुछ अच्छी अदाकारी वाली फिल्में भी दी थीं।  

फिल्मों को लोकप्रिय और गंभीर श्रेणी में बांटने का काम किये जाने का प्रचलन है, मगर इसे थोड़ी सजगता के साथ किये जाने की आवश्यकता है। जावेद भी यही मानते हैं। बात यह है कि  लोकप्रियता सापेक्ष होती है – सिर्फ क्राफ्ट या कलात्मकता की श्रेष्ठता के आधार पर लोकप्रिय फिल्मों का तिरस्कार गलत बात है। यह बात सही है कि भारत का लोकप्रिय सिनेमा कभी रेडिकल नहीं रहा – मगर यह कभी रिएक्शनरी भी नहीं रहा।

भारत का सिनेमा लिबरल और काफी हद तक प्रगतिशील मूल्यों का वाहक रहा है। इस देश में सेकुलरिज्म को जनमानस की चेतना में बिठाने का काम जितना फिल्मों और साहित्य ने किया है उतना ही राजनीतिक संस्थान भी करते तो आज भेड़ियों के गाँव में घुसने की जो स्थिति आ गयी है वह नहीं आती। लोकप्रिय सिनेमा ने सामाजिक, राजनीतिक सवालों को हमेशा उठाया है, छुआ तो है ही। आज से नहीं शुरुआत से। जैसे मूक फिल्मों के दौर में बाबूराव पेंटर की ‘सावकारी पाश’ – साहूकारी फंदा – जैसी फिल्में आयीं। ये भारतीय फिल्में ही थीं जिन्होंने भारत के शासकों, बाद्शाहों को आक्रान्ता बनाकर नहीं दिखाया, प्रेम और ईर्ष्या करने वाले हाड-मांस के इंसानों के रूप में प्रस्तुत किया।

बम्बईया कही जाने वाली फिल्मों ने ‘पारसी थिएटर’ के जमाने से ही देश के बड़े हिस्से को नयी बोली –  हिन्दुस्तानी – दी। इस तरह लोकप्रिय सिनेमा सिर्फ सतही नहीं होता – वह क्युरेटिव यानी निरोग करने वाला भी है, थिरेपेटिक यानी रोग न होने देने की ताकत देने वाला भी होता है। यह पोषण भी देता है और वैक्सीन भी लगाता है। 

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जावेद ‘पठान’ फ़िल्म की समीक्षा में इसे दर्ज करते हैं। ‘पठान’ और ‘जवान’ दोनों ही अपने सारे चटक-मटक फ़ॉर्मूलों के बावजूद प्रतिकार और प्रतिरोध की फिल्में हैं। जैसा जावेद लिखते हैं : ‘पठान’ में नायक, खलनायक दोनों भारतीय हैं। खलनायक हिन्दू है और नायक हिन्दू नहीं है – वह क्या है यह खुद उसको नहीं पता, मगर उसकी स्वघोषित आइडेंटिटी पठान है। पठान का बच्चा नहीं, पठान। यह एक बड़ा सन्देश है खासकर तब जब फिल्मों में तुरुक दाढ़ी और परिधान हथियार की तरह इस्तेमाल किये जा रहे हैं। इसी तरह ‘जवान’ फिल्म जो मुद्दे उठाती है वे प्रतिरोध के मुद्दे हैं। किसानों की कर्ज माफ़ी, स्वास्थ्य सेवा का बंटाढार आदि। इस सबके साथ ‘जवान’ पूरी तरह एकल प्रतिरोध नहीं है। इसमें सामूहिकता है, ऐसी सामूहिकता जिसमें स्त्री मोर्चे पर है। 

जावेद फिल्मों के खिलाफ सुनियोजित हमले को भी लेते हैं और उनकी केमिस्ट्री और जियोग्राफी दोनों आंकते हैं। वे दर्ज करते हैं कि ‘पठान’ के खिलाफ जितना तीव्र हमला बायकाट गैंग का था उसका उतना ही तीखा जवाब जनता ने उन्हें कामयाब बनाकर दिया। इस कदर दिया कि स्वयं उसके सरगना को अपने गिरोह के उन्माद की भर्त्सना करने के लिए मजबूर कर दिया। यही बात ‘जवान’ के मामले में भी देखी गयी।

जनता में ही नहीं भारतीय सिनेमा में भी प्रतिरोध जीवित है ; सार्थक और अच्छी फिल्मों का अकाल नहीं है – उनके नाम गिनाये जा सकते हैं। अनेक नाम जावेद ने लिखे हैं – उनके बाद भी कई फिल्में आई हैं। इसी के साथ यूट्यूब पर पॉकेट फिल्म्स, शार्ट फिल्म्स हैं जो कमाल कर रही हैं। इन्हें समान्तर फिल्म कहना ठीक नहीं। ये महाबजट की प्रोपेगंडा फिल्मों के मुकाबले देखन में छोटी लगें, पर घाव करें गंभीर हैं।  जावेद द्वारा की गयी फिल्म समीक्षाओं की किताब फिल्मों की गहराई से पड़ताल की कोशिश है जिसको रेखांकित किया जाना इसलिए जरूरी है कि यह समय जिस सर्वग्रासी संकट का समय है उसमे अँधेरे सिनेमा के परदे यानी सिल्वर स्क्रीन पर भी उमड़-घुमड़ कर आ रहे हैं। जैसा कि कहते हैं : मोर्चे चुने नहीं जाते, मोर्चे मिलते हैं। उन पर जूझा जाता है। जावेद की यह किताब हमें इसका शऊर और सलीका सिखाती है। दृष्टि और दृष्टिकोण दोनों देती है। (सप्रेस)

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