भूख की भयावहता

ईशान अग्रवाल

दुनिया की अमीरी उजागर करने के लिए जिस तरह ‘फोर्ब्‍स’ पत्रिका समेत अन्‍य भांति-भांति की रिपोर्टं प्रकाशित की जाती हैं, ठीक उसी तरह दुनियाभर की भुखमरी उजागर करने की खातिर ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट’ का सालाना प्रकाशन होता है। इस बार की रिपोर्ट में भुखमरी से जूझने वाले देशों की दिशा-दशा को लेकर कुछ महत्‍वपूर्ण बातें शामिल की गई हैं।

पिछले साल हम 102 वें नंबर पर थे, नाइजर और सिएरा-लीओन देशों के बीच। इस साल हम 94 पर हैं, अंगोला और सूडान देशों के बीच। पिछली रेटिंग 117 देशों के बीच में थी। इस बार 107  देशों के बीच है। पिछले साल हमारी ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स वैल्यू’ 30.3 थी और इस बार हमारी वैल्यू 27. 2 है। पिछले साल भी हम ‘सीरियस केटेगरी’ में थे और इस साल भी। इस साल की ‘ग्लोबल  हंगर इंडेक्स रिपोर्ट’ में विश्लेषित आंकड़े ताजा, सन् 2020 के नहीं हैं।  हम यह मान सकते हैं कि कोविड-19 के दुष्प्रभावों का असर इस रिपोर्ट में नहीं दिख रहा है, जो कि शायद हमारी ‘रैंक’ को और गिरा सकता है  या कम-से-कम हमारी ‘वैल्यू’ को बेहद बढ़ा सकता है जो कि कोई अच्छी बात नहीं है।

गौरतलब है कि ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट’ जर्मनी की जानी-मानी ‘गैर-सरकारी संस्था’ (एनजीओ) “वेल्तुंगेरहिल्फे” (weltuhungerhilfe) और “कंसर्न वर्ल्डवाइड” के सम्मिलित प्रयासों से जारी की जाती है। यह रिपोर्ट सन् 2000 से भूख और पोषण पर ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यूएनओ) और उससे जुडी कई अंतराष्ट्रीय एजेंसियों के द्वारा हर वर्ष इकट्ठे किये जाने वाले आंकड़ों के आधार पर बनायी जाती है। ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ एक ऐसा सूचकांक है जो खाद्य और पोषण सुरक्षा के तात्कालिक मानकों और दूरगामी मानकों, दोनों पर एक तस्वीर सामने लाता है।   

हालाँकि यह रिपोर्ट हमें बताती है कि हर बार चालू साल की रिपोर्ट की, पिछले साल की रिपोर्ट से तुलना नहीं की जा सकती, पर फिर भी कुछ तो फ़र्क़ हम देख ही सकते हैं। मसलन अंगोला सन् 2000 से 2020 तक अपनी ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स वैल्यू’ को लगभग 64.9 से 26.8 पर ले आया और हम इतने ही वक़्त में 38.9 से 27.2 पर पहुंचे हैं। मैंने भारत के सूची में स्थान को इस तरह से समझने की कोशिश की है जिससे पता लग पाए कि हमारे देश के भूख और कुपोषण हटाने के प्रयासों में कोई सच्चाई है भी कि नहीं।

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रिपोर्ट के 17 वें पेज पर छपे एक ग्राफ़िक से पता चलता है कि भारत  उन देशों के साथ खड़ा है जिन्होंने 20 साल से अपने भुखमरी के रिकॉर्ड को ठीक करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। ये देश हैं चाड, मेडागास्कर, हैती, लेसोथो, कॉंगो, उत्तर-कोरिया, नाइजीरिया आदि। ये सारे देश वे हैं जिनकी ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स वैल्यू’ में 20 साल में मात्र 5 से 10 अंकों की गिरावट आयी है और यह सभी ‘सीरियस’ और ‘अलार्मिंग’ श्रेणी में आते हैं। इससे अधिक रोचक और दुखदायक बात यह है कि इस ग्राफ़िक में जो देश हमारे सबसे करीब है, वह उत्तर-कोरिया है। हमारे पडौसी पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, सब हमसे भुखमरी और कुपोषण हटाने के मामले में बेहतर करते दिखाई देते हैं।

रिपोर्ट यह बात भी साफ़ करती है कि भारत के अंदर एक और भारत है जो रवांडा, चाड जैसे देशों के जैसा या उनसे भी बदतर है। भारत के कुछ हिस्से ‘ स्टंटिंग’ (ऊंचाई और उम्र का अनुपात) के मामले में राष्ट्रीय औसत से कोसों दूर हैं। इसके अलावा हमारा राष्ट्रीय औसत का आंकडा, ‘स्टंटिंग’ के बहुत बेहतर हिस्‍सों के बहुत करीब है। 

‘ग्लोबल  हंगर इंडेक्स रिपोर्ट’ इस बार भोजन की व्यवस्था को लेकर काफी सवाल खड़े कर रही है। रिपोर्ट साफ़-साफ़  कहती है कि स्वास्थ्य, पोषण, भोजन की समेकित योजना आवश्यक हैं। ‘रिपोर्ट’ पर्यावरण, बाजार, सामाजिक सुरक्षा, सामुदायिक भागीदारी आदि सबको भोजन व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण अंग मानती है। प्राकृतिक संसाधनों के सत्यानाश, प्रदूषण, बाजारू शक्तियों का बढ़ता लालच, ये सब हमारे भोजन की व्यवस्था  सुचारु रूप से चलाने की राह में एक बड़ा रोड़ा हैं। 

पिछले साल जब मैंने ‘ग्लोबल  हंगर इंडेक्स रिपोर्ट’ पर लिखा था, तब भी इस बात पर ध्यान दिलाने की कोशिश की थी कि किस तरह बदलता भू-परिदृश्य बढ़ती भुखमरी का कारण बनता जा रहा है। रिपोर्ट  इस बार बदलते भू-परिदृश्य, जमीन, पानी पर हक़, पर्यावरण और लोगों के बीच गैर-बराबरी के मुद्दों पर बहुत मुखर है। इस रिपोर्ट के द्वारा किये गए देशों के विश्लेषणों में भी यह स्‍पष्‍ट झलकता है। मसलन, कांगो देश में जहाँ अधिकतर जनता खेती पर निर्भर है, वहां ‘सकल घरेलू उत्‍पाद’ (जीडीपी) खनन उद्योग से आता है। नतीजे में सरकार का ध्यान खनन पर ज्यादा है, भोजन पर कम। जहाँ खनन है, वहां उससे जुड़े हुए लालच भी हैं, जिनके चलते  पर्यावरण, स्वास्थ्य जैसे तमाम सरोकारों की आहुति दे दी जाती है। अंदरूनी कलह, अनिश्चितता आदि लालच का ही परिणाम हैं।

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इसके विपरीत नेपाल, जहाँ अपेक्षाकृत सुधार हुआ है,  वहां हम जानते हैं कि कृषि और वन, दोनों ही क्षेत्र काफी बड़े हैं। पर्यटन उद्योग को छोड दें तो खनन और आधुनिक उद्योगों की भूमिका तुलनात्‍मक रूप से कम है। प्रदूषण और पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य में पर्यटन बहुत संवेदनशील उद्योग है।  

वापस उन सात-आठ देशों की तरफ जाएँ, जहाँ सन् 2000 से लेकर अब तक भुखमरी में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया है, तो पता चलता है कि उन सभी देशों में खनन उद्योग को अर्थव्यवस्था का रामबाण माना जाता है। कृषि और वानिकी में प्लांटेशन और नगदी फसलों का चलन बढ़ रहा है। तो जब भोजन उगाएंगे ही नहीं, तो वह आएगा कहाँ से। ऊपर से हमारे देश में तो सबको शाकाहारी बना देने की अजीब सी मुहीम चल पड़ी है। हमें यह क्यों याद नहीं रहता कि अति हर चीज़ की बुरी होती है। देश के 138 करोड़ लोग यदि गेहूं और चावल ही खाएंगे, तो इन फसलों के साथ होने वाले चारे का क्या होगा। उसकी पराली जलेगी। जो अनाज हमारे पेट की आग को शांत करता है, उसका भूसा, हमारे फेफड़ों को जला डालेगा। (सप्रेस)  

 

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