वैश्विक पर्यावरण : पर्यावरण संकट की चुनौती

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एक जमाने में दूर की कौड़ी लगने वाला पर्यावरण प्रदूषण आज एन हमारी देहरी पर आन खड़ा हुआ है। यह इतनी तेजी और प्रभाव के साथ हुआ है कि अब समूची मानव जाति का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। यह क्यों हुआ और इससे किस तरह निपटा जाए?


पिछली डेढ़ शताब्दी से, जब से औद्योगिक क्रांति ने विकास की गति तेज की और प्रकृति को जीतने की होड़ मच गई, मशीनों ने बंधक – निर्माण – शक्ति मानव के हाथ में दे दी, तब से विकास की परिभाषा भी धीरे-धीरे बदल गई। गुणात्मक जीवन के बजाय बाहुल्य को विकास माना जाने लगा। प्रकृति के साथ दुर्व्यवहार का एक अंतहीन सिलसिला आरंभ हो गया। प्रकृति के दोहन से ही बाहुल्य के लिए सामान बनाए जा सकते थे, इसलिए प्राकृतिक संसाधनों के असीमित दोहन की शुरुआत हो गई। उपनिवेशवाद के दौर में कम मशीनी शक्ति वाले देशों पर तथाकथित विकसित देशों द्वारा कब्जे किये गए और उनके संसाधनों को बेदर्दी से नष्ट किया गया।

सभ्य कहलाने वाले देशों द्वारा कमजोर देशों के मूल निवासियों को किस तरह प्रताड़ित किया, उनकी सभ्यताओं को असभ्य घोषित करके नष्ट करने का कार्य किया, वह अपने आप में घिनौना इतिहास है। इसके अवशेष अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों में देखे जा सकते हैं, किन्तु यह आधुनिक सभ्यता अब अपने ही भार से भस्मासुर की तरह नष्ट होने की दिशा में बढती प्रतीत हो रही है। इस सभ्यता ने अपने ही मूल पर आघात करना शुरू कर दिया है। हालांकि वैज्ञानिक समझ के विकास के चलते सब गलत दिशा को समझ भी रहे हैं, किन्तु विज्ञान का दुरूपयोग प्रकृति विनाशक शक्ति के रूप में किया जा रहा है।

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दुनिया के सबसे विद्वान् वैज्ञानिकों को युद्ध-विज्ञान के विकास में संलग्न कर दिया गया है। निर्णय लेने वाले लोग तो आदिम क्रूर मानसिकता के ही वाहक बने हुए हैं जिनके हाथ में मशीन और विज्ञान, प्रकृति एवं प्राणी समाज के साथ मनमानी करने का हथियार बन गया है। ज्ञान, सुख और शांति का वाहक बनने के बजाय युद्ध और क्रूरता का वाहक बन गया है। इस स्थिति में ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ के सातवें अधिवेशन में नैरोबी में प्रस्तुत की गई ‘ग्लोबल आउटलुक 2025’ रिपोर्ट पर्यावरण के साथ किये जा रहे दुर्व्यवहार को उजागर करती है और अपने तौर-तरीकों पर मानव समाज को पुनर्विचार करके संशोधित करने की दिशा दिखलाती है।

जलवायु परिवर्तन प्रकृति के साथ किये जा रहे दुर्व्यवहार की प्रतिक्रिया के रूप में एक बड़े खतरे की चुनौती पेश कर रहा है। मशीनीकरण को चलाए रखने के लिए जिस उर्जा की बड़े पैमाने पर जरूरत है वह जीवाश्म इंधन से पैदा की जा रही है। इस उत्पादन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धुआं और जहरीली गैसें उत्सर्जित होती हैं जो ‘हरित प्रभाव’ पैदा करके वायुमंडल के तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि कर रही हैं। तापमान वृद्धि से पूरे जलवायु का संतुलन हिल गया है। कहीं अतिवृष्टि हो रही है तो कहीं अनावृष्टि हो रही है। ग्लेशियर पिघल कर समाप्त होने की ओर अग्रसर हैं जो आसन्न जल-संकट का कारण बनेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार ‘हरित प्रभाव गैसों’ के उत्सर्जन से 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक का तापमान 2024 में बढकर 1.55 डिग्री सेंटीग्रेड हो गया है। इस गति से वृद्धि होने पर जलवायु पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है जो आगे बढ़ता ही जाएगा। यदि तापमान वृद्धि को रोका नहीं गया तो इसके कारण जैव-विविधता पर भी बुरा असर पड़ने वाला है, जिससे 10 लाख प्रजातियों के लुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। 20 से 40% प्रतिशत भूभाग वैश्विक स्तर पर अनुपजाऊ होने के कगार पर है जिससे 300 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। जलवायु से जुडी भीषण घटनाओं के कारण जन-धन की भारी हानि हो रही है।

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आर्थिक रूप में वार्षिक 14,300 करोड़ डॉलर की हानि पिछले दो दशकों से हो रही है। वायु प्रदूषण के कारण 2019 में स्वास्थ्य संबंधी आर्थिक नुकसान 8.1 ट्रिलियन डॉलर आंका गया था, जो वैश्विक अर्थ-व्यवस्था का 6.1 प्रतिशत है। 90 लाख मौतें प्रदूषण संबंधी कारणों से हुईं। 80 हजार लाख टन प्लास्टिक कचरा फैला हुआ है, जिससे गंभीर रासायनिक तत्वों से संपर्क हो रहा है और इससे 1.5 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक हानि प्रति-वर्ष हो रही है। ‘नैनो प्लास्टिक’ तत्व मनुष्य शरीर तक पंहुच कर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर रहे हैं।

अनुमान है कि यदि सन् 2040 तक तापमान वृद्धि 2 डिग्री सेंटीग्रेड तक पंहुच गई तो जलवायु परिवर्तन के कारण पारिस्थितिक-व्यवस्था का अपूरणीय विनाश हो सकता है। इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा। अर्थव्यवस्थाएँ चौपट हो सकती हैं और बेरोजगारी, गरीबी, और अस्थिरता बढ़ेगी। उपजाऊ जमीनों के नष्ट होने से भूख, विविधता-विनाश, पौष्टिक आहार की कमी, अकाल और सामाजिक असंतोष के हालात बनेंगे।

इस स्थिति से निपटने के लिए तत्काल गंभीर प्रयास करने की जरूरत है, किन्तु जलवायु नियंत्रण समझौतों के विषय में बहुत से देश विमुखता दिखा रहे हैं। जो मान भी रहे हैं, वे भी ‘हरित प्रभाव गैसों’ के उत्सर्जन में कटौती के लिए स्व-घोषित लक्ष्य ही मानने तक सीमित रहना चाहते हैं। इस स्थिति से बाहर निकल कर कुछ आवश्यक कदम उठाने होंगे, ख़ासकर ‘हरित प्रभाव गैसों’ के उत्सर्जन में भारी कटौती करनी होगी। इसके लिए कार्बन-मुक्त उर्जा विकल्पों की ओर मुड़ना होगा। सौर-उर्जा, पवन-उर्जा, हाइड्रो-काईनैटीक उर्जा आदि विकल्प विकसित करने होंगे। पेट्रोल, डीज़ल पर दी जा रही सब्सिडी को हरित उर्जा की ओर मोड़ना पड़ेगा। अत्यधिक संसाधन दोहन और दुरूपयोग को नियंत्रित करने के लिए ‘यूज़ एंड थ्रो’ उत्पाद पद्धति को बदलकर टिकाऊ और मरम्मत किये जाने योग्य उत्पाद बनाने होंगे। बेकार पदार्थों और कचरे के पुन: चक्रीकरण की व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करना संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

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वायु-प्रदूषण को रोकना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाना और पुनर्जीवित करने पर जोर देना पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के लिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने के साथ-साथ जलवायु अनुकूलन की विधियाँ तलाशनी होंगी। परिवहन के कारण होने वाले भारी प्रदूषण से निपटने के लिए टिकाऊ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को आरामदायक बनाते हुए विकसित करना पड़ेगा। समस्याएँ तो आती ही रहेंगी, किन्तु समाधान के लिए प्रकृति आधारित हल प्राथमिकता से ढूंढे जाएं, तो हालत सुधरने में मदद जरूर मिलेगी। (सप्रेस)

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