छतरपुर का टीबी अस्पताल : रोगियों को इलाज और आहार दोनों चाहिए

शिवाषीश तिवारी

छतरपुर का जिला टीबी अस्पताल नौगांव में स्थित है। यह अस्पताल आजादी के समय बनाया गया था। यह अस्पताल 6 दशक से चल रहा है। इस अस्पताल की ख्याति कभी पूरे देश में हुआ करती थी। मध्य प्रदेश के आधे से ज्यादा मरीज इस अस्पताल में इलाज के लिए आया करते थे। यहां पर टीबी रोग के मरीजों को समय पर भोजन नहीं मिलता है।

नौगांव, छतरपुर CHHATARPUR जिले की एक तहसील है। इस शहर की स्थापना 1842 में अंग्रेजों द्वारा की गई थी। इसे देश की पहली स्मार्ट सिटी भी कहा जाता है। आजादी के पहले यहां पर पोलिटिकल एजेंट रहते थे, जो स्थानीय रियासतों में संतुलन बनाने और अंग्रेजी योजनाओं को लागू करवाने का कार्य करते थे। आजादी के बाद विंध्य प्रदेश का गठन हुआ, जिसकी शुरुआती दिनों में राजधानी बना नौगांव शहर, जिसे आधुनिक चंडीगढ़ की संज्ञा भी दी जाती है। यहां पर अंग्रेजों के जमाने की कई इमारतें हैं। इनमें सर्जन ऑफिस की बिल्डिंग एक है। इस भवन में छतरपुर जिले का टीबी अस्पताल है। यह अस्पताल 6 दशक से चल रहा है। इस अस्पताल की ख्याति कभी पूरे देश में हुआ करती थी। मध्य प्रदेश के आधे से ज्यादा मरीज इस अस्पताल में इलाज के लिए आया करते थे। एक दौर ऐसा भी था जब किसी भी व्यक्ति का नौगांव में यदि इलाज चल रहा होता था, तो मान लिया जाता था कि वह टीबी रोग का मरीज है।

यहां इतने मरीज आते हैं कि कई बार WHO में इसकी चर्चा हो चुकी है। लेकिन अब अस्पताल की हालत बेहद खराब है। अस्पताल में सफाई न के बराबर है। भवन का आधा हिस्सा टूटा हुआ पड़ा है। मरीज के लिए बनाए गए शौचालय टूटे और गंदे पड़े हैं। मरीजों को वैसी सुविधा नहीं मिल रहीं, जैसी कागजों पर बताई जा रही हैं।

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अस्पताल के डॉ. जेके अग्रवाल से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि नौगांव में स्थानीय मरीज नहीं आते हैं। दूसरे जिलों से ज्यादा मरीज यहां इलाज के लिए आते हैं। यहां पर छतरपुर से लगे हुए यूपी के जिलों के लोग ज्यादा आते हैं। डॉ. अग्रवाल आगे कहते हैं कि छतरपुर में टीबी प्रोग्राम बहुत ही अच्छे से लागू किया जा रहा है। सभी की नजरें यहां पर होती हैं क्योंकि यहां पर प्रदेश स्तर पर सबसे ज्यादा मरीज आते हैं।

सरकारी दावों के उलट यहां मरीजों को भरपेट भोजन नहीं मिल रहा है। इस कारण मरीजों को भारी समस्या हो रही है। बांदा जिला की मुन्नीबाई 15 दिन से नौगांव टीबी अस्पताल में भर्ती हैं। इनका कहना है कि खाने में कीड़े निकलते हैं। इस तरह का खाना देखते हैं, तो खाने की इच्छा नहीं होती है। खाने में केवल चार रोटी मिलती हैं, जिससे पेट नहीं भरता है। मुन्नी बाई के साथ उनका एक बच्चा भी है, जिसकी उम्र 1 साल से भी कम है।

कुसमा के रहने वाले मथुरा 2 माह से अस्पताल में भर्ती हैं। इनका कहना है कि भरपेट भोजन नहीं मिलता है। इसलिए परिचितों से खाना मंगवाते हैं। जब कोई खाना नहीं देकर जाता तो बाहर से खरीद कर खाना खाते हैं। ढबरई की रम्मोबाई पिछले 5 महीने से भर्ती हैं। इनका कहना है कि मरीजों को उचित मात्रा में भोजन नहीं मिलता है। दोबारा भोजन मांगते हैं तो नहीं दिया जाता है। छतरपुर जिले के रामदास भी नौगांव टीबी अस्पताल में 6 महीने भर्ती हैं। इनका कहना है कि खाने में चार पतली-पतली रोटी मिलती हैं, जिनसे पेट नहीं भरता है। अस्पताल प्रशासन से जब इसकी शिकायत की जाती है तो वह अस्पताल से भगने की धमकी देते हैं। इसलिए हम लोग बाहर से आटा-दाल लेकर आते हैं और अस्पताल परिसर में ही खाना बनाते हैं। नौगांव टीबी अस्पताल के गेट के पास बने बरामदे में मरीज खाने पकाते हुए हमेशा दिखाई देते हैं। यह मरीज अस्पताल परिसर में लगे पेड़-पौधों की झाड़ियां को जलाकर चूल्हे से खाना बनाते हैं।

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जब हमने इस बारे में छतरपुर सीएमएचओ लखन तिवारी से बात की तो उन्होंने कहा कि हम इसकी जांच कराएंगे। छतरपुर के जिला टीबी अधिकारी डॉक्टर शरद चौरसिया का कहना है कि टीबी अस्पताल की सारी जिम्मेदारी अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर राकेश चतुर्वेदी की है। इसलिए उनसे बात करिए।

डॉ राकेश चतुर्वेदी से जब अस्पताल की दुर्दशा के संबंध में पूछताछ की तो उनका कहना था कि 50-60 साल पहले डॉक्टर और समाज टीबी रोग को छुआछूत की बीमारी मानते थे। रोगियों के संपर्क में आने से लोग बचते थे। इसलिए आजादी के समय टीबी अस्पताल बनाए गए। शुरुआत में इंदौर, छिंदवाड़ा और नौगांव में अस्पताल बने थे। चूंकि बुंदेलखंड और बघेलखंड का इकलौता केंद्र नौगांव में था इसलिए यहां ज्यादा लोग आते हैं। यहां मरीजों को अच्छा खाना दिया जाता है। मेन्यू के हिसाब से हमेशा खाना तैयार होता है, फिर भी कोई कमी है तो हम उसे दूर करेंगे।

यह लेख पत्रकार शिवाषीश तिवारी ने तैयार किया है, जिनका चयन रीच इंडिया फेलोशिप में हुआ है।

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