महिलाओं के समाधान के लिए सृजनात्मक सोच की आवश्यकता है

सुभद्रा खापर्डे विश्व ग्रामीण जीवन में महिला सृजनात्मकता पुरस्कार से सम्‍मानित

15 अक्‍टूबर। वुमेन’स वर्ल्ड समिट फ़ाउंडेशन (wwsf) स्विट्ज़रलैंड, द्वारा वर्ष 2020 का “ग्रामीण जीवन में महिला सृजनात्मकता पुरस्कार” विश्व के 10 महिलाओं को दिया गया है जिनमें मध्‍यप्रदेश के इंदौर की अनुभवी जमीनी कार्यकर्ता सुभद्रा खापर्डे भी शामिल है। आज विश्व ग्रामीण महिला दिवस पर स्विट्जरलैंड में महिला विश्व शिखर सम्मेलन फाउंडेशन (https://www.woman.ch/) द्वारा उन्‍हें आन लाइन पुरस्‍कृत किया गया। उनके अलावा नौ अन्य महिलाओं को ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण में उनके काम के लिए दिया गया।

सुभद्रा खापर्डे पिछले तीन दशक से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के दलित एवं आदिवासी महिलाओं के साथ उनके अधिकार एवं विकास के लिए काम कर रही है। सुभद्रा के इन्‍हीं कार्यों के मददेनजर उन्‍हें इस वर्ष पुरस्कार दिया गया है।

उल्‍लेखनीय है कि  विश्व भर में सबसे पीड़ित समुदाय ग्रामीण महिलाओं का है, खासतौर पर वे महिलाएं, जो खेती-किसानी करती हैं, इनकी समस्याएँ बहुत जटिल है। ऐसी महिलाओं के समाधान के लिए सृजनात्मक सोच की आवश्यकता है, इसी दृष्टिकोण के मद्देनजर  वुमेन’स वर्ल्ड समिट फ़ाउंडेशन  व्‍दारा पिछले 27 वर्षों से यह पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है। इस पुरस्‍कार से अब तक 462 महिलाओं को सम्मानित हो चुकी है।

सुश्री सुभद्रा बताती है कि महिलाओं को होने वाली प्रजनन स्वास्थ्य की समस्याओं के इलाज के लिए उनके गाँव में स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया जाता है, जिसमें स्त्री रोग विशेषज्ञ, नर्स, लैब टेकनीशियन आदि ले जाकर जांच के बाद दवाई दी जाती है। इस कार्य में महिलाएं पूरी तरह से सहभागी रहती है एवं पुरुषों को भी इन समस्याओं के बारे में सचेत किया जाता है। 
इस काम को करने से मुझे समझ में आया कि बिना किसी इलाज के महिलाएं अधिकतर अपनी प्रजनन तंत्र की परेशानियों को सहन करती रहती है। गरीब महिलाएं चुपचाप तब तक काम करती रहती है जब तक कि वह बीमार नहीं पड़ जाती है। इस विकराल स्थिति को हम काफी हद तक सुधार पाये है। 

उन्‍होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि औरतों के सेहत का खराब होना उनके रोज़मर्रा के भोजन से भी जुड़ा हुआ है। मैं सोचने लगी कि उनके भोजन में क्या शामिल किया जाए ताकि उनका पोषण की स्थिति में सुधार हो। उन्हें मैं दवाई के साथ सब्जी और फल खाने की सलाह देती थी। फिर मैं देखी की यह फल और सब्जी एवं अन्य खाद्य पदार्थ, जो इनके खेतों में उपलब्ध है, सभी रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों से उत्पादित होकर सेहत के लिए हानिकारक है। इन खाद्यों से पोषण के साथ-साथ हमारे शरीर में जहर भी घुल रहा है। 
इन्‍हीं सब बातों को ध्‍यान में रखते मैंने भोजन में प्राकृतिक रूप से उत्पादित चीजों को शामिल किये जाने के बारे में सोचा। इतना ही नहीं इस बात की चेतना लाना भी बड़ी चीज़ होगी कि सिर्फ दवाई खाने से स्वास्थ्य नहीं सुधार सकता है बल्कि हमें हमारी खान पान को सही करना होगा। इसलिए मुझे प्राकृतिक कृषि खुद करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

मेरी किसानी का सफर my-journey-of-farmer

वे बताती है कि ग्राम पांडुतालाब जिला देवास में एक एकड़ ज़मीन खरीदी और उस पर देसी हिसाब से खेती करना प्रारम्भ किया। मैंने ठान लिया कि औरतों को प्राकृतिक खेती के गुणवत्ता पूर्ण उत्पादों की ओर ले जाऊँगी जिससे कि उनके सेहत में सुधार लाने में काफी मदद मिलेगी। हमने न केवल प्राकृतिक खेती शुरू की बल्कि इस में काम के लिए औरतों को ही अधिकतर बुलाती हूं ताकि वे अपनी पारंपरिक देसी खेती को वापस अपना सकें और खुद की खेती में प्रयोग कर सके। पिछले तीन साल से यही देसी तरीका अपनाया जा रहा है।

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