दशहरे पर पूजनीय-शमी : विजय, परंपरा और पर्यावरण का अमर प्रतीक

डॉ. ओ.पी.जोशी

दशहरे पर शमी पूजन की परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है बल्कि इतिहास, लोकजीवन और पर्यावरणीय महत्व को भी दर्शाती है। राजस्थान में खेजड़ी कहलाने वाला यह वृक्ष रेगिस्तान का राजा माना जाता है, जिसकी छाया, फलियां और पत्तियां जीवनदायी हैं। किंतु अंधाधुंध कटाई और संक्रमण के कारण इनकी संख्या लगातार घट रही है, जिससे संरक्षण की गंभीर चुनौती सामने है।

हमारे देश में दशहरे पर शमी के पेड़ को पूजने की परंपरा काफी पुरानी है एवं कुछ मान्यताओं से जुड़ी प्रतीत होती है। भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाने से पूर्व शमी पेड़ के समक्ष शीश नवाकर अपनी विजय हेतु प्रार्थना की थी। पांडवों ने भी अपने अज्ञातवास के समय  शामी की खोखल में हथियार छुपाएं एवं अज्ञातवास की समाप्ति पर शमी की पूजन कर हथियार पुन: प्राप्त किये थे। सम्भवत: इन्हीं मान्यताओं के आधार पर शमी का पेड़ विजय का प्रतीक माना जाने लगा एवं पूजन प्रारंभ हुआ होगा।

शमी के पेड़ को राजस्थान में खेजडी, पंजाब में झुंड तथा गुजराती में सुमेरी कहते हैं। वनस्पति शास्त्र में इसे प्रोसोपिस-सिनेरेरिया कहा गया है एवं यह बबुल के कुल मायमोसायडी में शामिल है। शमी के पेड़ औसतन 25-30 फीट ऊंचे, कंटीले छायादार तथा सुखे को सहन करने वाले होते हैं। जड़ें जमीन में 30-40 मीटर तक पहुंच जाती है। तना मोटा, शाखाएं पतली, लटकती हुई तथा छतनार (केनोपी) गोलाकार होती है। छाल खुरदरी, मोटी घूसर रंग (स्लेटी) की तथा लम्बी दरारों युक्त होती है तथा पतियां कुछ इमली के समान।

क्‍या विशेषता है शमी के पेड़ की

शीतकाल में सफेद-पीले फूल (मीजर) गुच्छे में लगते हैं एवं गर्मी में फलियां (सेंगरी) पकती है। फलियां 8-10 इंच लम्बी चपटी, गूदेदार तथा 8-10 भूरे अंडाकार बीजों से भरी रहती है। गूदा कुछ  मीठा होता है एवं इसमें 11 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। नक्षत्रों के संदर्भ में शमी को उत्तर फाल्गुनी एवं घनिष्टा से जोड़ा गया है एवं राशि अनुसार कुंभ से। प्रसिद्ध खगोलविद् वराहमिहिर ने भूजल की पहचान हेतु पेड़ों के जो जोड़े बताये गये थे उनमें भी शमी-पलाश का जोड़ा शामिल है।

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शमी की अधिकांश प्रजातियां प्रमुखता से अरब देशों, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा भारत के शुष्क एवं अर्धशुष्का इलाकों में पायी जाती है। इसे पश्चिमी राजस्थान का देशज पेड़ बताया गया है परंतु पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र व कर्नाटक में भी पाया जाता है।

राजस्थान में खेजडी के नाम से प्रसिद्ध यह पेड़ वहां अपना विशेष महत्व रखता है  एवं इसे रेगिस्तान की शान या रेगिस्तान का राजा कहा जाता है। पेड़ के सभी भाग उपयोगी होने से इसे राजस्थान का कल्प-वृक्ष भी माना गया है। लकड़ी का उपयोग झोपड़ी नाव व खेती के औजार बनाने के साथ वाद्य यंत्र बनाने में भी किया जाता है। जैसलमैर व जोधपुर के रेगिस्तानी इलाका का एक वाद्ययंत्र कमायचा का उपरी भाग खेजडी तथा निचला भाग आम की लकडी से बनाया जाता है। सूखी लकड़ी जलाने के काम आती है तथा इससे चारकोल भी बनाया जाता है। हरी पतियों चारे के रूप में तथा खाद बनाने में भी उपयोग की जाती है। फलियों से सब्जी बनायी जाती है, जिसके उपयोग से कॉलेस्टॉल घटने की संभावना भी बताया गयी है (जोधपुर के जे.एम. व्यास वि.वि. का अध्ययन ) छाल से प्राप्त गोंद गठिया रोग उपचार में लाभकारी बताया गया है। 1899 ईस्वी में जब भीषण अकाल पड़ा था तब कई लोग एवं पुश छाल खाकर जिंदा बचे थे।

पर्यावरण के संदर्भ में देखा जाए तो ये पेड़ तेज आंधी तूफान में भी धराशायी नहीं होते है एवं उसकी तीव्रता भी कम कर देते हैं। गहरी जड़ें मिट्टी का कटाव रोकती है तथा उन पर पायी जाने वाली छोटी-छोटी गठानों में उपस्थित जीवाणु वातावरण की नाइटोजन से मिट्टी का उपजाऊपन बढ़ाते है। इस पेड़ की महत्ता को जानकर सितंबर 2023 में जी-20 देशों के प्रतिनिधियों ने राजघाट पर जो पौधे रोपे थे, उनमें शमी भी शामिल था।

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सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट, जोधपुर के अध्ययन अनुसार एक समय राजस्थान का दो- तिहाई भाग पर फैले खेजड़ी पेड़ों की संख्या घटती जा रही है। साठ के दशक में प्रति हेक्टर 90 पेड़ थे, जो 2005 तक घट 35  रह गये। किसी फफूंद के संक्रमण तथा कुछ कीटों के आक्रमण से पेड़ खोखले हो समाप्त हो जाते हैं।

पिछले 15-16 वर्षों में जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर व जैसलमेर क्षेत्र में कई निजी कंपनियों द्वारा सोलर संयंत्र लगाने हेतु लगभग 25 लाख पेड़ काट दिए गए। इस कारण संयंत्रों के आसपास 3 से 4 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ गया। किसानों एवं कुछ संगठनों के विरोध तथा न्यायालय में प्रकरण दाखिल करने पर इन कार्यों पर कुछ विराम लगा। खेजड़ी संरक्षण के यदि उचित प्रयास नहीं किए गए तो यह संकटापन्न की श्रेणी में चला जाएगा।

यहां यह जानना भी प्रासंगिक होगा कि 1730 ईस्वी में जोधपुर के इलाके में बिश्नोई समाज की श्रीअमृता देवी, उनकी तीन पुत्रियां, पति तथा 84 गांवों के 363 लोगों ने खेजड़ी पेड़ों को बचाने हेतु बलिदान दिया था। (सप्रेस)

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