स्थापना के दौर जैसी परिस्थितियों के बीच हो रहा है सेवाग्राम में सर्वोदय समाज सम्मेलन (Sarvodaya Samaj Sammelan)

देशभर से गांधीवादी होंगे शामिल, सर्वोदय समाज सम्मेलन का आयोजन 14 से 16 मार्च तक

Sarvodaya Samaj Sammelan सर्वोदय समाज का 48 वां अधिवेशन अपनी स्थापना के 75 साल उसी सेवाग्राम में होने जा रहा है, जहां इसकी स्थापना हुई थी। और वर्तमान समय में वैसी ही चुनौतियां देश के सामने खड़ी हैं।

सर्वोदय समाज की स्थापना के साथ सबसे मार्मिक प्रसंग यह है कि इस सर्वोदय समाज  की पूरी परिकल्पना गांधीजी ने की थी। लेकिन सर्वोदय समाज की स्थापना के समय गांधीजी इस दुनिया में नहीं रहे थे।

गांधी जी ने देशभर के रचनात्मक कर्मियों का सम्मेलन/बैठक सेवाग्राम में रखने का मन बनाया था जिसमें इस अनौपचारिक संगठन की रूपरेखा तैयार होती। ऐसा माना जाता है कि गांधीजी इस बैठक के लिए 2 फरवरी को दिल्ली से चलने वाले थे। लेकिन एक आतंकवादी ने 30 जनवरी को ही गांधी जी को शहीद कर दिया था।

बापू की शहादत से उनके अनुयाई एकबार तो सन्न यह गए थे, लेकिन बाद में आपसी विचार विमर्श करके यह महसूस किया गया कि ऐसी परिस्थिति में गांधीवादी विचारधारा को जन जन तक पहुंचाने के लिए गांधी जी द्वारा प्रस्तावित बैठक/सम्मेलन अवश्य आयोजित की जानी चाहिए।

ऐसी स्थिति में गांधी जी सबसे बड़े अनुयाई और मानसपुत्र संत विनोबा की तरफ सबकी नज़रें थी। संत विनोबा भावे ने इस काम को पूरा भी किया।

सर्वोदय समाज का यह सम्मेलन 13 से 15 मार्च 1948 को सेवाग्राम में आयोजित हुआ था। इसके सभापति राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बने, सम्मेलन में संत विनोबा के अलावा जो शीर्ष नेता मौजूद रहे उनमें पं जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण,और शंकरराव देव आदि जैसे बड़े नेता थे।

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गांधी जी की शहादत के सिर्फ डेढ़ महीने के अन्तराल में होने वाले सम्मेलन में व्यापक विचार विमर्श करके संत विनोबा जी पर इस अनौपचारिक संगठन का खाका बनाने की जिम्मेदारी आई, यह माना गया कि ऐसी कठिन परिस्थितियों में संत विनोबा ही मार्गदर्शन करके रास्ता निकाल सकते हैं। इस जिम्मेदारी को निभाते हुए संत विनोबा ने सर्वोदय समाज के गठन का प्रस्ताव किया।

सर्वोदय समाज में के गठन के समय गांधीजी की शहादत के पूरे घटनाक्रम और गांधी को शहीद करने वाली वैचारिकी पर भी विचार विमर्श किया गया। इसी लिए संत विनोबा ने एकदम स्पष्ट कर दिया था कि गांधी जी की हत्या जिस वैचारिकी ने की है उसके प्रणेता

आर एस एस की प्रकृति फासिस्ट तरीके की है। झूठ और उसका झूठा प्रचार ही उसकी तकनीकी और फिलासफी है। आर एस एस जमात सिर्फ दंगाइयों की जमात ही नहीं है, फासिस्टों की जमात है।

विनोबा ने गांधी के पहले मंत्र के बाद दूसरे मंत्र सर्वोदय पर काम करने पर ज़ोर दिया जिसका आधार अहिंसा,सत्य और साधन शुद्धि था। और इसी आधार पर सर्वोदय समाज की अनौपचारिक स्थापना हुई।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सर्वोदय समाज की समाज की आवश्यकता को बताते कहा था कि आजाद देश को बाहर से ज्यादा अंदर से धोखे का ख़तरा है। विनोबा जी की बातों से सहमति जताते हुए नेहरू जी ने साध्य के लिए साधनों की शुचिता पर ज़ोर दिया था।

सर्वोदय समाज की स्थापना के समय में ही विनोबा का यह विचार सर्व स्वीकार रहा कि सर्वोदय समाज औपचारिक संगठन नहीं होगा। यह अहिंसक समाज की रचना के लिए प्रेरक की तरह काम करेगा। सर्वोदय समाज को संगठन के औपचारिक ढांचे से मुक्त रखा गया जिसमें किसी तरह का सत्ता, नियोजन, नियंत्रण न हो।

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राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी का भी मानना था कि सर्वोदय समाज संगठन के रूप में काम नहीं करेगा,ना उसको कोई निश्चित कार्यक्रम रहेगा इस को माननेवाले अपने स्तर से स्वतंत्र होकर रचनात्मक कार्य करते रहेंगे। लेकिन कोई भी कार्यकर्ता सर्वोदय समाज के तरफ से या सर्वोदय समाज के नाम से कार्य नहीं करेगा।

यह बड़े आश्चर्य की बात यह है कि सर्वोदय समाज के 75 साल पूरे होने पर वैसी ही चुनौतियां सामने खड़ी हैं जो इसके स्थापना के समय थीं, अगर देखा जाए तो यह चुनौतियां उस समय से भी ज़्यादा गम्भीर और ख़तरनाक हैं।

देश अनेक प्रकार की मुसीबतों में फंसता जा रहा है। दुर्भाग्यवश गांधी के विचारों और देश की संकल्पना पर सत्ता प्रतिष्ठान और उसके सहयोगी संगठनों द्वारा हमला किया जा रहा है, गांधी के हत्यारों की पूजा की जा रही है। संवैधानिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न किया जा रहा है। इससे देश की एकता, लोकतंत्र, आजादी, अर्थव्यवस्था, बहुसंस्कृति और पर्यावरण पर गंभीर संकट पैदा हो गया है।

देश की आजादी के समय जो सांप्रदायिक स्थिति थी वह सत्ता की शह पर और भी भयानक हो गई है। उस विद्वेषपूर्ण स्थिति में साम्प्रदायिक शक्तियों के द्वारा गांधी की हत्या करने का जघन्य अपराध किया था।

सत्ता में मौजूद तत्वों की वैचारिकी के कारण देश में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं पर अत्याचार पर बढ रहे हैं। इस सबसे आज देश की मूल प्रकृति की हत्या की जा रही है।

वर्ल्ड बैंक जैसी पूंजीवादी वैश्विक संस्थाओं के इशारे सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन किया जा रहा है। मुठ्ठी भर पूंजीपतियों का देश की सत्ता पर नियंत्रण होता जा रह है। किसानों, पशुपालकों, मछुआरों, कुटीर उद्योगों, परम्परागत हस्तशिल्पों, छोटे व्यापारियों आदि को बलि पर चढाकर देशी विदेशी उद्योगपतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। खादी का दिखावा बहुत किया जा रहा है लेकिन सरकारी नीतियों से खादी और ग्रामोद्योगों का विनाश हो रहा है। एक ओर अमीरों पर टैक्स घटाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर गरीब से गरीब व्यक्ति से टैक्सों का बोझ डाला जा रहा है। जीएसटी कलैक्शन में पूंजीपतियों के योगदान के सापेक्ष आम आदमी की भागीदारी कहीं अधिक है। पूंजीपतियों को प्रश्रय देने के कारण देश में बेरोजगारी, मंहगाई और गरीबी तेजी से बढ़ती जा रही है। कुल मिलाकर देश की अधिकांश संपत्ति मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सिमटती जा रही है।

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अखबारों और टीवी चैनलों पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का कब्जा हो गया है । यह समाज सेवा का नहीं कमाई का माध्यम बन गया है। इन पर देश के बड़े उद्योगपतियों का कब्जा हो गया है।

देश के विकास सूचकांक से लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के सारे सूचकांक गिरते ही जा रहे हैं। इससे देश की अन्तर्राष्ट्रीय छवि लगातार गिर रही है।

इन सब को देखते हुए सर्वोदय समाज को गांधी और विनोबा की लाइन पर फिर से परिभाषित करके चलना होगा। विनोबा जी ने गांधी शहादत के बाद संघ की कार्यप्रणाली और मानसिकता को जिसतरह फासिस्ट घोषित करके गांधीवादियों से उसका सत्य अहिंसा और सत्याग्रह के आधार पर प्रतिकार करने का आवाहन किया वो देश में संवैधानिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने के लिए एक प्रेरक का कार्य कर सकता है।

सर्वोदय समाज के इस सम्मेलन में गांधी और विनोबा के अनुयायियों को इस पर व्यापक विचार विमर्श करना होगा।

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