सच्चिदाजी : सत्तावन का जज्बा और लीची की मिठास

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सच्चिदानंद सिन्हा के निधन के साथ भारतीय समाजवादी चिंतन की एक ऐसी ज्योति बुझ गई है, जिसकी रोशनी पीढ़ियों को दिशा देती रही। मनिका के इस तपस्वी बुद्धिजीवी ने ज्ञान को साधना, गरीबी को संकल्प और लेखन को संघर्ष बनाया। जिन्हें उन्हें देखने का सौभाग्य मिला, वे जानते हैं—ऐसे बौद्धिक समय की धूल में बार-बार नहीं मिलते।


किसी भी पढ़ने लिखने वाले और समाजवादी विचारों और मूल्यों में विश्वास करने वाले के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है कि उसने सच्चिदानंद सिन्हा को देखा था। मैं मुजफ्फरपुर के मनिका वाले सच्चिदानंद सिन्हा की बात कर रहा हूं जिनका 19 नवंबर 2025 को 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया। निश्चित तौर पर मैंने ऐसा बौद्धिक अपने जीवन में कभी देखा नहीं था और न ही आने वाले लंबे समय में ऐसे लोगों के होने की संभावना है। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ मध्य वर्ग की निर्मम आलोचना करते हुए जब अपने समय के बिके हुए बौद्धिकों का वर्णन करती है तो कहती है

उदरंभरि अनात्म से बन गए

भूतों की शादी में कनात से तन गए

किसी व्याभिचारी के बन गए बिस्तर

लिया बहुत ज्यादा दिया बहुत कम।

सच्चिदा बाबू का जीवन इसके ठीक विपरीत था। अगर उनके बारे में कहा जाए कि दिया बहुत ज्यादा लिया बहुत कम तो यह प्रत्यय अधिक अनुरूप होगा। तमाम लोग आजकल अपने को सार्वजनिक बुद्धिजीवी कहलवाते रहते हैं लेकिन वे समाज से यश और सरकार से धन और सत्ता पाने के लिए हर तरह की कलाबाजी करते रहते हैं। बिहार के धन और सत्ता संपन्न परिवार में जन्मे सच्चिदाजी ने ज्ञान की साधना की पवित्रता को कायम रखने के लिए जानबूझ कर गरीबी अपनाई थी। ज्ञान के लिए वे दिल्ली के  तीन मूर्ति और सप्रू हाउस जैसे पुस्तकालयों में बैठे और शोध किया लेकिन आखिर में उन्होंने अपने गांव मनिका को ही अपनी तपस्थली बनाया।

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दिल्ली में समाजवादी मित्रों किशन जी, राजकिशोर जी, डॉ प्रेम सिंह, अरविंद मोहन, हरिमोहन, अतुल कुमार  रामेश्वर दुबे और योगेंद्र यादव से उनके बारे में सुनता रहता था। लेकिन पहली मुलाकात तब हुई जब गाजियाबाद में नई नई आबाद हुई पत्रकारों की बस्ती जनसत्ता परिसर में एक शिविर का आयोजन हुआ। उस शिविर में सच्चिदा बाबू आए और किशन पटनायक भी आए। यह बात संभवतः 2002-2003 की है। वहां उनकी सादगी देखी और साथ में यह भी देखा कि किस तरह शिविर की भावना का पालन किया जाता है। सच्चिदाजी इस बात से नाराज थे कि शिविर में लोग रात में एक साथ रुक नहीं रहे हैं।

उनसे दूसरी बार तब मुलाकात हुई जब 2007 में मुजफ्फरपुर गया 1857 की क्रांति पर व्याख्यान देने। मेरे लिए यह गर्व की बात है कि सच्चिदाजी वह व्याख्यान सुनने आए। व्याख्यान भाई प्रोफेसर प्रमोद कुमार सिंह ने आयोजित किया था और कार्यक्रम का स्थल था लंगट सिंह कॉलेज का सीनेट हॉल। शहर के तमाम प्रतिष्ठित लोग आए थे। कार्यक्रम के बाद सच्चिदाजी गद्गद थे। मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले तुम बहुत अच्छा बोले और अच्छा इसलिए क्योंकि प्रतिबद्धता के साथ बोलते हो। वे मेरे लिए अपने  बागान से दो बड़े बड़े डिब्बे लीची लाए थे और उन्होंने अपने प्रेम के साथ मुझे वह भेंट किया।

तीसरी भेंट तब हुई जब डॉ प्रेम सिंह के कहने पर मुजफ्फरपुर गया। वहां सच्चिदाजी के 85 साल होने पर एक कार्यक्रम का आयोजन था। उस कार्यक्रम के सूत्रधार थे संत किस्म के समाजवादी अशोक सेक्सरिया। यह संभवतः 2012-13 की बात है। तब किशन पटनायक का निधन हो चुका था। वहां सच्चिदाजी के साहित्य पर अरविंद मोहन ने बहुत सारी सैद्धांतिक बातें रखीं और राजकिशोर जी भी बहुत अच्छा बोले। एक वक्ता मैं भी था। लेकिन अशोक सेक्सरिया जी कुछ नहीं बोले। वहीं प्रभाकर सिन्हा जी से भेंट हुई और भेंट हुई सच्चिदाजी की बहन जी से। पूरा परिवार उच्च स्तरीय बौद्धिक क्षमता से संपन्न और मानवीय मूल्यों के लिए बेहद समर्पित ,बेहद विनम्र और मेहमाननवाजी से भरपूर। सच्चिदाजी से एक बार और दिल्ली में भेंट हुई थी जब वे उदारीकरण और गरीबी पर बोलने गांधी शांति प्रतिष्ठान में आए थे। उनका इंटरव्यू करना चाहता था पर वह रह ही गया।

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सोशलिज्म एंड पॉवर, केयास एंड क्रिएशन, अनआर्मड प्रोफेट, इंटरनल  कॉलोनी,कोएलिशन इन पालिटिक्स, बिटर हार्वेस्ट, कास्ट मिथ रियलिटी एंड चैलेंज, समाजवाद के बढ़ते चरण, जिंदगी सभ्यता के हाशिए पर, मानव सभ्यता और राष्ट्र राज्य, पूंजीवाद का पतझड़,  नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट, सुकरात का मुकदमा(अनुवाद) जैसी दर्जनों अंग्रेजी और हिंदी में श्रेष्ठ किताबों की रचना करने वाले सच्चिदानंद सिन्हा ने कभी कोई सरकारी सम्मान नहीं लिया। यह सब ऐसी श्रेष्ठ कृतियां हैं जिन्हें रचने के लिए पत्रकार कोई न कोई फेलोशिप लेते हैं और प्रोफेसर मोटी मोटी तनख्वाहें लेते हैं। इन्हें सच्चिदाजी ने अपने गांव में लालटेन की रोशनी में रेडियो सुनते हुए खिचड़ी खाकर रच डाला। कभी विदेश नहीं गए और शायद ही कभी हवाई यात्रा की हो।कुछ वर्ष पहले जब साथी अरविंद मोहन ने आठ खंडों में उनकी रचनावली संपादित की तो पता चला कि वे बहुत प्रसन्न थे। लेकिन इस बात के लिए तैयार नहीं हुए कि कोई राजनेता उसका लोकार्पण करे। इस खींचतान में उनकी महान रचनाओं के उस खजाने का विमोचन टल ही गया।

जीवन में समाजवाद के चार विलक्षण बौद्धिकों और योद्धाओं को देखने का सौभाग्य मिला। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक, अशोक सेक्सरिया और सुनील। मैंने कई बार सोचा और कई लोगों को कहते हुए सुना भी कि इनके जैसा बनना है लेकिन कोई दूसरा सुनील, कोई दूसरा अशोक जी और कोई दूसरा सच्चिदाबाबू बनते नहीं देखा। इसीलिए कह सकता हूं कि आने वाली नस्लें तुम पर फक्र करेंगी हम आसरो, जब उन्हें मालूम होगा कि तुमने सच्चिदा जी को देखा था।

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