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राजेंद्र माथुर की गांधी-दृष्टि आज की पत्रकारिता और लोकतंत्र के लिए जरूरी : प्रकाश हिंदुस्तानी

हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा राजेंद्र माथुर की जयंती पर भोपाल में हुआ ‘माथुर के महात्मा’  विषयक व्याख्यान

भोपाल, 9 अगस्त। ‘राजेंद्र माथुर के लिए समाचार-पत्र केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद का सशक्त हथियार था। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों को लोकतांत्रिक रूप से सशक्त किया। आज गांधी की अहिंसा और राजेन्द्र माथुर के मूल्य हमारी सबसे बड़ी और अनिवार्य जरूरत बन गए हैं। इनकी प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, और हमें अपने दैनिक जीवन में इन्हें उतारने की सख्त आवश्यकता है।‘

उक्‍त बातें मुख्य वक्ता एवं वरिष्ठ संपादक श्री प्रकाश हिंदुस्तानी ने कहीं। वे गांधी भवन न्यास द्वारा हिंदी पत्रकारिता के प्रख्यात संपादक एवं चिंतक राजेंद्र माथुर की 91वीं जयंती के अवसर पर ‘माथुर के महात्मा’ विषय पर व्याख्यान में बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने की। इस मौके पर दैनिक भास्कर, नागपुर के संपादक श्री प्रकाश दुबे, श्री ओमप्रकाश मेहता, श्री चंद्रकांत नायडू, श्री उमेश त्रिवेदी आदि मंच पर उपस्थित थे।

मुख्य वक्ता प्रकाश हिंदुस्तानी ने कहा कि आज जब हम देश और समाज की दिशा पर विचार करते हैं, तो हमारे सामने माथुर साहब की निगाह से गांधी को समझने का एक और बहुत महत्वपूर्ण रास्ता आता है. और वह है उनसे असहमत होने का अधिकार.

उन्‍होंने कहा कि गांधी और माथुर दोनों हमें यह सिखाते हैं कि लोकतंत्र केवल कुछ सालों बाद होने वाले चुनाव का नाम नहीं है, और न ही यह सिर्फ बहुमत के शासन का दूसरा नाम है। असली लोकतंत्र का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। लोकतंत्र का अर्थ है—असहमति को धैर्य और सम्मान के साथ सुनना। अपने विरोधी को भी पूरी बात कहने का अवसर देना। और यह नम्रतापूर्वक स्वीकार करना कि सत्य का पूरा एकाधिकार किसी एक व्यक्ति, दल या संस्था के पास नहीं हो सकता।

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उन्‍होंने यह भी कहा कि इसके साथ ही एक और भ्रम है जिसे दूर करना जरूरी है। अक्सर गांधी की अहिंसा को गलत तरीके से ‘कमजोरी’ या बुजदली समझ लिया जाता है। लेकिन जब हम राजेन्द्र माथुर की गांधी-दृष्टि को गहराई से समझते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि गांधी की अहिंसा कोई निष्क्रियता या खामोशी नहीं थी। अहिंसा का अर्थ कभी भी अन्याय के सामने चुपचाप झुक जाना या अत्याचार को सह लेना नहीं था। गांधीजी अन्याय के सामने हमेशा चट्टान की तरह डटकर खड़े होते थे लेकिन उन्होंने कभी भी हिंसा या बदले का रास्ता नहीं अपनाया। और यही तो सत्याग्रह था!

मुख्य अतिथि दैनिक भास्कर, नागपुर के संपादक श्री प्रकाश दुबे ने कहा कि राजेंद्र माथुर पत्रकारिता का सबसे बड़ा धर्म सत्य को निर्भीकता और निर्ममता से उजागर करना मानते थे। उनके भीतर सहजता और वैचारिक दृढ़ता का अद्भुत समन्वय था, जिसकी प्रेरणा उन्हें महात्मा गांधी से मिली थी। उन्होंने राजेंद्र माथुर और गांधीजी से जुड़े अनेक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की पत्रकारिता को माथुर जी के मूल्यों से सीख लेने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि राजेंद्र माथुर एक आदर्श संपादक थे, लेकिन उनके अनेक महत्वपूर्ण स्वप्न आज भी अधूरे हैं। वे हिंदी में एक सशक्त पाठक समाज का निर्माण करना चाहते थे। साथ ही पत्रकारिता के विकेंद्रीकरण, भारतीय भाषाओं में मजबूत समाचार-पत्रों के विकास तथा एक सर्वांगीण अखबार की परिकल्पना को साकार करना चाहते थे। इन अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाना आज की पीढ़ी का दायित्व है।

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स्वागत उद्बोधन देते हुए गांधी भवन न्यास के वरिष्ठ न्यासी श्री महेश सक्सेना ने कहा कि आज गांधी भवन के मंच पर पत्रकारिता जगत की एक पूरी आकाशगंगा उपस्थित है। इन वरिष्ठ पत्रकारों के माध्यम से गांधीजी और राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता के अनुभवों को सुनना हम सबके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा, “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे पत्रकार।”

वरिष्ठ पत्रकार श्री ओमप्रकाश मेहता ने कहा कि वे आज जो कुछ भी हैं, उसमें राजेंद्र माथुर का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने अपने जीवन में सदैव माथुर जी के सिद्धांतों पर चलने का प्रयास किया है।

वरिष्ठ पत्रकार श्री चंद्रकांत नायडू ने कहा कि समय के साथ पत्रकारिता अक्सर अपनी मुख्यधारा और मूल सरोकारों से भटक जाती है, लेकिन राजेंद्र माथुर में घटनाओं और समाज को गहरी वैचारिक दृष्टि से देखने की अद्भुत क्षमता थी। इसी दृष्टि के बल पर उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में नई ऊर्जा, गति और वैचारिक गंभीरता का समावेश किया। उनका पत्रकारिता कर्म आज भी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

वरिष्ठ पत्रकार श्री सुधीर सक्सेना ने कहा कि राजेंद्र माथुर केवल अपने समय के महान संपादक ही नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के महानायक थे। महात्मा गांधी के बाद पत्रकारिता में सत्य की प्रतिष्ठा के लिए राजेंद्र माथुर को सदैव स्मरण किया जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश त्रिवेदी ने कहा कि राजेंद्र माथुर, राजेंद्र माथुर इसलिए बन सके क्योंकि उन्होंने आपातकाल का दौर स्वयं जिया और भुगता था। यदि हमें उनके व्यक्तित्व और पत्रकारिता को समझना है तो उनके निर्माण की पूरी प्रक्रिया को समझना होगा।

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कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् एवं नागरिक उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से जगदीश कौशल, प्रताप भानु शर्मा, अजय बोकिल, मंगला अनुजा, मोहन दीक्षित, भगवती कड़वे, पराग माण्डले, रामायण पटेल, सुभाष गीद, राजेश सिरोठिया, अभिलाष खांडेकर, संजीव श्रीवास्तव, संदीप पौराणिक, राकेश दीक्षित, अमिताभ शुक्ला, राजकुमार द्विवेदी, देवेंद्र सिंह पटेल, रज्जू राय, ममता यादव सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

कार्यक्रम का शुभारंभ राजेंद्र माथुर के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर आधारित एक दुर्लभ साक्षात्कार के प्रदर्शन से हुआ। इस प्रस्तुति के माध्यम से उपस्थित जनों ने उनके वैचारिक दृष्टिकोण, पत्रकारिता की समझ और सामाजिक सरोकारों को गहराई से जाना। इस मौके पर महात्मा गांधी एवं राजेंद्र माथुर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इसके उपरांत सभी अतिथियों का खादी वस्त्र एवं सदी के संपादक राजेंद्र माथुर लेखक राजेश बादल की पुस्तक भेंट कर आत्मीय स्वागत एवं सम्मान किया गया।

कार्यक्रम का संचालन गांधी भवन न्यास के कोषाध्यक्ष, लेखक एवं पत्रकार श्री राजेश बादल ने किया। गांधी भवन न्यास के सचिव अंकित कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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