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सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

प्रकृति ही दुनिया का सबसे बड़ा धर्म, इसकी नाराजी का समाधान अगल-बगल नहीं अंदर झांककर खोजना होगा – पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी

संस्था सेवा सुरभि द्वारा आयोजित “क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से” विषय पर हुए व्‍याख्‍यान में शामिल हुए शहर के पर्यावरणविद और प्रबुद्धजन  

इंदौर, 7 अगस्त। मालवा में बारिश का बदलता मिजाज केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ हमारे बदले व्यवहार का परिणाम है। हमने जंगल, नदियां, मिट्टी और जलस्रोतों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देखा, जबकि प्रकृति में ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। आज जरूरत प्रकृति के विज्ञान को समझने और उसी के अनुरूप अपने विकास की दिशा तय करने की है। उन्होंने कहा कि दुनिया में सबसे बड़ा धर्म प्रकृति है। ऐसा कोई समाज और धर्म नहीं, जिसका प्रकृति से कोई वास्ता नहीं हो। प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह किसी भी धर्म और समाज का हो, हवा, पानी, मिटटी, जंगल और प्रकृति का साथ चाहिए। सबसे बड़ा धर्म प्रकृति ही होना चाहिए लेकिन दुनिया के अनेक देशों ने अपने-अपने ढंग से प्रकृति की परिभाषाएँ बना ली है।

ये बातें देश के प्रख्यात पर्यावरणविद्, हरित कार्यकर्ता एवं हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन (HESCO) के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने शुक्रवार को साउथ तुकोगंज स्थित होटल कलिंगा के सभागृह में संस्था सेवा सुरभि के तत्वावधान में आयोजित ‘क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से’ विषयक व्‍याख्‍यान में बोल रहे थे।

डॉ. जोशी ने कहा कि मानसून केवल बादलों के आने से नहीं बनता। समुद्र से होने वाला वाष्पीकरण, हवाओं का दबाव, पहाड़, जंगल, नदियां और जलग्रहण क्षेत्र मिलकर एक पूरी प्राकृतिक व्यवस्था बनाते हैं। जब इस व्यवस्था में जंगल कटते हैं, नदियां सूखती हैं और जलग्रहण क्षेत्र नष्ट होते हैं तो उसका असर भूजल पुनर्भरण तक पहुंचता है। बारिश होने के बावजूद यदि पानी जमीन में नहीं उतरेगा तो आने वाले समय में जल संकट और गहरा होगा।

उन्‍होंने कहा कि 70 हजार वर्ष का इतिहास देखें तो पता चलेगा कि हमने प्रकृति का एक तरह से अपने पेट और व्यवसाय के लिए इस कदर शोषण और दोहन किया है कि जंगल, जानवर और जीव तक को संख्या के मान से आधा कर दिया। हमने घरों में कुत्ते-बिल्ली पालना शुरू कर दिए। हमें आज भी पता नहीं है कि हम किस मौसम में जी रहे हैं। फरवरी गर्म हो गई है और हिमाचल प्रदेश में भी मई-जून में मौसम का मिजाज बदल गया है। इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। यदि प्रकृति की नाराजी का समाधान खोजना है तो अगल-बगल नहीं, अपने अंदर ही झांककर खोजना होगा। विकास और समृद्धि के नाम पर हमने हवा, मिटटी, जंगल, पानी के साथ खिलवाड़ कर प्रकृति को नाराज कर दिया है।

इंदौर की पर्यावरणीय मैपिंग की जरूरत

डॉ. जोशी ने इंदौर के संदर्भ में कहा कि शहर के विकास को समझने के लिए उसकी एक व्यापक पर्यावरणीय मैपिंग की जानी चाहिए। इसमें यह देखा जाए कि पिछले दशकों में शहर में पानी, जंगल, मिट्टी, नदियों और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों में क्या बदलाव आया है और इन बदलावों का शहरीकरण से क्या संबंध है। उन्होंने कहा कि इस तरह की मैपिंग में विज्ञान संस्थानों, समाज और सरकार की भूमिका स्पष्ट की जा सकती है।

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उन्होंने विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की दिशा पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आज आईआईटी जैसे संस्थानों में शोध और शिक्षा का बड़ा हिस्सा तकनीक और उद्योग की जरूरतों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। विज्ञान को यह भी सोचना होगा कि जल, जंगल, मिट्टी और हवा जैसी बुनियादी प्राकृतिक व्यवस्थाओं को बचाने में उसका क्या योगदान हो सकता है। क्योंकि जिस दिन जल, जंगल और मिट्टी हमारे हाथ से निकल गए, उस दिन केवल तकनीक और आर्थिक विकास हमारे जीवन को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे।

अपने उद्बोधन में डॉ. जोशी ने कहा कि व्यक्ति और गांव भले अलग-अलग हों, लेकिन प्रकृति सबके लिए एक ही है। दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे प्रकृति की जरूरत न हो। हर किसी को जल, वायु, जमीन और जंगल चाहिए। इसके बावजूद प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को हमने ठीक ढंग से नहीं निभाया। खेती-बाड़ी से शुरू हुई मानव की यात्रा अब जंगलों के दोहन और वन्यजीवों के विनाश तक पहुंच गई है।

उन्होंने कहा कि हमने जानवरों को भी नहीं बख्शा। घरों में पालतू कुत्तों की संख्या भले ही बढ़ गई हो, लेकिन अनेक दूसरे जीव लगातार कम होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि आज हमें ठीक-ठीक पता तक नहीं चलता कि हम किस मौसम में जी रहे हैं। मौसम के आने की जो स्वाभाविक पहचान कभी हुआ करती थी, वह अब दिखाई नहीं देती। हमने प्रकृति की पूरी व्यवस्था को बिखेर दिया है और इसके लिए किसी दूसरे को नहीं, बल्कि स्वयं को जिम्मेदार मानना होगा।

डॉ. जोशी ने कहा कि विकास और समृद्धि के नाम पर दुनिया जिस दौड़ में शामिल है, वह कई बार बिना सोचे-समझे आगे बढ़ने की दौड़ बन गई है। यह किसी एक सरकार या किसी एक देश की समस्या नहीं है। उद्योग और आर्थिक गतिविधियों के नाम पर हमने अनेक बार प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है। पानी की समस्या पैदा हुई तो बोतलबंद पानी का कारोबार बढ़ गया और हवा खराब हुई तो उसे साफ करने के लिए एयर प्यूरिफायर का बाजार खड़ा हो गया। सवाल यह है कि हम समस्या पैदा होने के बाद उसके बाजार आधारित समाधान खोज रहे हैं या समस्या के मूल कारण को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

हर व्यक्ति को अपना कार्बन फुटप्रिंट देखना होगा

पर्यावरण संकट को केवल सरकार या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी मानने से इनकार करते हुए उन्होंने कहा कि पारिस्थितिक संकट में हर व्यक्ति की भागीदारी है। उन्होंने लोगों से अपने कार्बन फुटप्रिंट पर विचार करने और अपनी जीवनशैली में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी तय करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि आज ‘सस्टेनेबिलिटी’ शब्द खूब इस्तेमाल होता है, लेकिन असली सवाल यह है कि हमारी मिट्टी, पानी, जंगल और खेती कितनी टिकाऊ रह गई है। आर्थिक संकट के समाधान में सरकार और उद्योग की भूमिका रही होगी, लेकिन पारिस्थितिक संकट का समाधान समाज की व्यापक भागीदारी के बिना संभव नहीं है।

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डॉ. जोशी ने कहा कि प्रकृति को अलग-अलग विभागों में बांटकर देखने की हमारी व्यवस्था ने समस्या को और जटिल किया है। जंगल का संबंध केवल वन विभाग से, पानी का संबंध केवल जल विभाग से और मिट्टी का संबंध केवल कृषि से नहीं है। ये सभी एक ही प्राकृतिक तंत्र के हिस्से हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए भी समग्र दृष्टि की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि नदियां मरती नहीं हैं, बल्कि कई बार हमसे रूठकर या जमीन के भीतर चली जाती हैं। उन्हें समझकर और उनके जलग्रहण क्षेत्रों को पुनर्जीवित कर वापस लाया जा सकता है। मालवा में भी बारिश और जलस्रोतों के संकट का समाधान स्थानीय प्रकृति और जलचक्र को समझकर तलाशना होगा।

डॉ. जोशी ने अंत में कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल मकान, सुविधाएं और संपत्ति छोड़ जाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें हवा, पानी, मिट्टी और जंगल भी चाहिए। प्रकृति से जितना उपभोग करें, उतना ही उसके लिए योगदान करना होगा। यही आने वाले समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

इंदौर से अपने पुराने संबंध का उल्लेख करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि जब उन्हें यहां आने का निमंत्रण मिला तो उन्होंने तय किया कि शहर के लोगों से सीधे संवाद किए बिना बात पूरी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि अब हमें यह समझने की जरूरत है कि हजारों-लाखों वर्षों में प्रकृति ने जो अपना एक संतुलित सिस्टम विकसित किया था, उसे फिर से पटरी पर कैसे लाया जाए। इसके लिए पहाड़ों और नदियों से लेकर जलग्रहण क्षेत्रों और भूमिगत जल तक पूरी प्राकृतिक व्यवस्था को एक साथ समझना होगा।

उन्होंने कहा कि हमने अभी तक प्रकृति की प्रवृत्ति और उसके विज्ञान को ठीक से समझा ही नहीं है। हमें यह भी विचार करना होगा कि पहले पानी आया या पेड़? केवल पेड़ लगाने की बात करने से प्रकृति को नहीं समझा जा सकता। यह देखना होगा कि किसी स्थान पर प्रकृति ने किस तरह की व्यवस्था बनाई है और उसे पुनर्जीवित करने के लिए किन मूल परिस्थितियों को वापस लाना जरूरी है।

डॉ. जोशी ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि भारत विश्व गुरु बनेगा या नहीं, लेकिन यदि हम प्रकृति के साथ काम करने की दिशा में आगे बढ़ें और हमारे प्रयोग सफल हों तो निश्चित रूप से हम प्रकृति को फिर से मनाने में सफल हो सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले प्रकृति के महत्व को समझना होगा। उन्होंने कहा कि केवल प्रार्थना करने से प्रकृति नहीं मानेगी।

प्रकृति को मौका दें, वह खुद अपना जंगल खड़ा कर लेती है

डॉ. जोशी ने अपने अनुभव का उदाहरण देते हुए बताया कि उत्तराखंड में एक नदी के सूख जाने के बाद उसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रकृति के विज्ञान को समझने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि पहले जिस क्षेत्र में बारिश का पानी गिरता था, वहां जंगल कट जाने के कारण पानी तेजी से बहकर निकल जाता था और नदी तक पहुंचने वाली जलधारा का क्रम टूट गया था। इसके समाधान के लिए किसी बड़े निर्माण या पाइपलाइन के बजाय पानी को उसी स्थान पर रोककर जमीन में उतारने का सरल तरीका अपनाया गया।

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उन्होंने बताया कि वर्ष 2008 में एक हेक्टेयर क्षेत्र में करीब 300 वॉटर होल बनाए गए। इन गड्ढों में बारिश का पानी रोकने और जमीन में उतारने की व्यवस्था की गई। इसका परिणाम दूसरे ही वर्ष दिखाई देने लगा और नदी में पानी का प्रवाह बढ़ गया। आज वही नदी फिर से बह रही है।

डॉ. जोशी ने कहा कि पानी आने के बाद वहां प्रकृति ने अपना काम खुद शुरू कर दिया। पहले छोटी-छोटी वनस्पतियां आईं, फिर पेड़-पौधे विकसित हुए। इसके बाद खरगोश और दूसरे छोटे जीव आए, फिर हिरण और अंततः तेंदुआ भी उस क्षेत्र में लौट आया। उन्होंने कहा कि करीब 12-14 वर्षों में उस क्षेत्र का जंगल बिना बड़े पैमाने पर पौधरोपण किए अपने आप विकसित हुआ।

उन्होंने कहा कि हम अक्सर जंगल लगाने की चिंता करते हैं, लेकिन यह समझने की कोशिश नहीं करते कि जंगल को वास्तव में चाहिए क्या। प्रकृति ने हर स्थान के लिए एक व्यवस्था तय की है कि वहां किस तरह की वनस्पतियां और प्रजातियां विकसित होंगी। यदि हम उस व्यवस्था को समझ लें और पानी जैसी मूल जरूरत पूरी कर दें तो प्रकृति खुद को पुनर्जीवित करने लगती है।

उन्होंने कहा कि पानी केवल नदी को नहीं लौटाता, बल्कि उसके साथ पूरा पारिस्थितिकी तंत्र लौटता है। पानी आया तो वनस्पतियां आईं, वनस्पतियां आईं तो छोटे जीव लौटे और धीरे-धीरे पूरा जैव-विविधता तंत्र विकसित होने लगा। इसलिए जल संरक्षण को केवल पानी बचाने के रूप में नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के माध्यम के रूप में देखना चाहिए।

प्रारम्भ में संस्था सेवा सुरभि की ओर से ओमप्रकाश नरेडा, मोहन अग्रवाल, डॉ. दिलीप वाघेला, किशोर पंवार और प्रेस क्लब की ओर से मुकेश तिवारी ने डॉ. जोशी का स्वागत किया। चर्चा में सांसद शंकर लालवानी, शहर काजी डॉ. इसरत अली, उद्योगपति वीरेन्द्र गोयल, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. भारत शर्मा भी अतिथि के रूप में शामिल हुए।

इसके पूर्व विषय की प्रस्‍ताव रखते हुए डॉ. ओ पी जोशी ने मालवाचंल में पर्यावरण के इतिहास को व्‍यवस्थित रूप से साझा किया। उन्‍होंने आंकडे प्रस्‍तुत करते हुए मालवा के बदलते पर्यावरण के पहलुओं की ओर ध्‍यान आकर्षित कराया।

सभागृह में उपस्थित शहर के प्रबुद्ध और गणमान्य नागरिकों ने अनेक प्रश्न भी पूछे और प्रकृति से लेकर मौसम की बेरुखी के बारे में अनेक जानकारियां भी प्राप्त की। इस अवसर पर पर्यावरणविद ओपी जोशी, अतुल शेठ, कुमार सिद्धार्थ, पद्मश्री जनक पलटा, केट के पूर्व वैज्ञानिक निकेतन सेठी, वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी, डॉ. किशोर पंवार, डॉ. भोलेश्वर दुबे, डॉ. दिलीप वाघेला, पंकज कासलीवाल, कमल कलवानी सहित शहर के अनेक संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। संचालन अतुल शेठ ने किया और आभार माना अनिल त्रिवेदी ने।

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