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नर्मदा क्रूज प्रोजेक्ट से पानी की गुणवत्ता पर असर, मछलियों और जलीय जैव विविधता भी नष्ट होगी

यह कदम सुप्रीम कोर्ट व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के स्पष्ट आदेशों का उल्लंघन

बडवानी, 13 जनवरी । मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने एक बार फिर विवाद खड़ा कर दिया है। विभाग ने हाल ही में नर्मदा नदी पर मेघनाथ घाट, धार जिले में लग्जरी क्रूज प्रोजेक्ट के लिए 7.82 करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया गया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर एवं स्‍थानीय नागरिकों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह कदम पर्यावरणीय चिंताओं और सुप्रीम कोर्ट व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के स्पष्ट आदेशों के उल्लंघन का प्रतीक है। अमीरों के पर्यटन से नर्मदा नदी का पेयजल अधिक प्रदूषित होगा।

नर्मदा नदी, जो लाखों लोगों की आजीविका और जल स्रोत है, इस परियोजना से गंभीर खतरे में पड़ सकती है। ये प्रोजेक्ट पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।

विवादास्पद पृष्ठभूमि

इस क्रूज प्रोजेक्ट का प्रस्ताव पहली बार 2022 में लाया गया था, जिसमें बड़वानी से गुजरात के केवड़िया तक 135 किलोमीटर की दूरी को कवर करने की योजना थी। इसके तहत लग्जरी और बजट क्रूज सेवा शुरू करने की घोषणा की गई, जिसमें शराब के बार, स्विमिंग पूल, वाटर स्पोर्ट्स और फ्लोटिंग जेटी जैसी सुविधाएँ दी जाने वाली थीं।

हालांकि, इस परियोजना को शुरुआत से ही कानूनी और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। एनजीटी ने 2022 में इसे रोकने का आदेश दिया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में इस परियोजना को अवैध करार दिया।

पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

मेधा पाटकर ने कहा कि नर्मदा नदी पर बड़े क्रूज का संचालन नदी की पारिस्थितिकी के लिए खतरा पैदा करेगा। उनका कहना है कि जहाजों से ईंधन का रिसाव, कचरे का निस्तारण और प्रदूषण न केवल जल की गुणवत्ता को खराब करेगा, बल्कि मछलियों और जलीय जैव विविधता को भी नष्ट करेगा।

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स्थानीय मछुआरा समुदाय, जिनकी आजीविका पूरी तरह मछली पकड़ने पर निर्भर है, इस परियोजना से सबसे अधिक प्रभावित होंगे। इसके अलावा, घाटी के ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी और सिंचाई के लिए नदी पर निर्भर लोग भी इस परियोजना से प्रभावित होंगे।

कानूनी उल्लंघन और प्रशासनिक असंवेदनशीलता

नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा जारी प्रेस नोट में गोखरू सोलंकी, श्यामा मछुआरा, कैलाश यादव,        मेधा पाटकर एवं राहुल यादव ने कहा कि यह प्रोजेक्ट वायु और जल संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम और वेटलैंड संरक्षण नियमों का उल्लंघन करता है। इसके साथ ही यह ग्राम सभा और “पेसा” कानून का भी उल्लंघन है, जो आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है।

जनता और विशेषज्ञों की मांग

पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि पर्यटन विभाग इस टेंडर को तुरंत रद्द करे और नर्मदा नदी की सुरक्षा के लिए न्यायालय के आदेशों का पालन करे। इसके अलावा,  इस बात की स्वतंत्र जांच हो कि कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद यह टेंडर कैसे जारी किया गया। स्‍थानीय समुदाय ने मांग की है कि स्थानीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए ताकि उनके अधिकारों चिताओं को समाधान किया जा सके |  पेसा कानून और ग्राम सभा के अधिकारों का सम्मान हो।

नर्मदा नदी केवल एक जल स्रोत नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जीवनरेखा और सांस्कृतिक विरासत है। इसे सुरक्षित रखना समाज और शासन की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस तरह के प्रोजेक्ट केवल आर्थिक लाभ के लिए नदी और उस पर निर्भर समुदायों के अस्तित्व को खतरे में डालते हैं।

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