नर्मदा घाटी में पुनर्वास अधूरा, संघर्ष जारी, शासन की उपेक्षा से गहराया संकट : मेधा पाटकर

मध्यप्रदेश में 32,000 भूखंड आवंटित, लेकिन अधिकांश की रजिस्ट्री अब तक लंबित

बडवानी, 21 अप्रैल। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस में नर्मदा घाटी के हजारों विस्थापितों की बदहाली पर गहरी चिंता जताई और राज्य तथा केंद्र सरकारों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि “बिना पुनर्वास डूब” जैसी त्रासदी आज भी जीवित है, और शासनकर्ता नर्मदा माता और घाटीवासियों के अधिकारों की अनदेखी कर रहे हैं।

सुश्री पाटकर ने कहा कि पिछले चार दशकों से चल रहे इस जनआंदोलन ने कई अहम उपलब्धियां प्राप्‍त की हैं, लेकिन अब भी हजारों परिवार ऐसे हैं जिन्हें न्याय, पुनर्वास और जीवन यापन के मूल अधिकार नहीं मिल सके हैं। उन्होंने इस स्थिति को न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया, बल्कि शासन की संवेदनहीनता का प्रतीक भी कहा।

उन्होंने कहा कि 2023 की भयावह डूब में हजारों मकान और एकड़ों में फैली खेती नष्ट हो गई, जिससे मजदूर, किसान, मछुआरे और अन्य समुदायों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा। कई लोग अब भी टिनशेड में रह रहे हैं और उन्हें वैकल्पिक खेती के लिए ज़मीन, मकान, या अनुदान नहीं मिला।

कानूनी आदेशों का उल्लंघन, फिर भी चुप शासन

प्रेस कांफ्रेंस में मेधा पाटकर ने जोर देकर कहा कि 2017 के सुप्रीम कोर्ट आदेश के बावजूद न तो ₹60 लाख की सहायता दी गई, न मकान निर्माण की सुविधा मिली। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में करीब 32,000 भूखंड आवंटित किए गए, लेकिन अधिकांश की रजिस्ट्री नहीं हुई। कई लोगों को भूखंड आज तक मिले ही नहीं, या केवल कागजों पर ही दिए गए।

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इससे भी गंभीर बात यह है कि नवंबर 2024 में इंदौर उच्च न्यायालय खंडपीठ में इस मुद्दे पर दायर याचिका पर आज तक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और राज्य सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। जबकि मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें ₹10,000 का दंड तक लगाया था, फिर भी शासन की ओर से चुप्पी क्यों बनी हुई है – यह एक बड़ा सवाल है।

प्रशासनिक ढाँचे की अव्यवस्था और राजनीतिक असंवेदनशीलता

उन्होंने कहा कि घाटी के अधिकांश पुनर्वास अधिकारियों के पद रिक्त हैं और शिकायत निवारण प्राधिकरण के 5 न्यायाधीशों के पद सितंबर 2024 से खाली पड़े हैं। गुजरात ने अपनी कानूनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए न तो मध्यप्रदेश की डूबग्रस्त ज़मीन की भरपाई की है, न ही पुनर्वास के खर्च को वहन किया है।

जबकि सरकार ने नर्मदा पर नए बांधों के लिए हज़ारों करोड़ की राशि दी, पुनर्वास के लिए मात्र ₹150 करोड़ का आवंटन किया गया।

नदी का दोहन और गंदगी की मार

मेधा पाटकर ने कहा कि नर्मदा को ‘जीवित इकाई’ मानने के बावजूद जबलपुर से बड़वानी तक कोई भी STP (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) नहीं है, जिससे गंदा पानी सीधे नदी में जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के आदेशों का पालन नहीं होना भी एक अपराध नहीं है?

गुजरात में बर्बाद पानी, प्यासे किसान

गुजरात सरकार द्वारा सरदार सरोवर परियोजना पर ₹75,000 करोड़ से अधिक खर्च होने का दावा किया गया है, लेकिन कच्छ और सौराष्ट्र के गांवों को आज भी पेयजल नहीं मिल रहा। लाखों लीटर पानी रण में बर्बाद हो रहा है क्योंकि नहरें अधूरी हैं।

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संघर्ष जारी रहेगा या संवाद से हल निकलेगा?

प्रेस कांफ्रेंस में मेधा पाटकर ने स्पष्ट किया कि यदि ज़िम्मेदार अधिकारी – जिला अधिकारी, एनवीडीए उपाध्यक्ष, मुख्य सचिव – इन गंभीर सवालों पर संवाद नहीं करते, तो घाटीवासियों को एक बार फिर उपवास, धरना, रैली और जलसत्याग्रह का रास्ता अपनाना पड़ेगा। उनके साथ इस प्रेस काफ्रेंस में मौजूद अन्य कार्यकर्ता  भगवान सेप्टा, श्यामा मछुआरा, राहुल यादव, कमला यादव, देवीसिंह तोमर, गजानंद यादव ने भी कहा कि 40 वर्षों के बाद भी अगर अधिकारों की लड़ाई बाकी है, तो आंदोलन आगे भी जारी रहेगा।

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