‘चिप’ का चमत्कार : सेमीकंडक्टर में स्वावलंबी होता भारत

चक्रेश जैन

यह विज्ञान का चमत्कार ही है कि आधुनिक जीवन की अधिकांश सुविधाएं एक मामूली-सी ‘सेमीकंडक्टर चिप’ में समाहित हो गई हैं। आज की दुनिया में इसी ‘चिप’ को हासिल करने, बनाने की होड मची है। अपना देश भी इस दिशा में कदम बढ़ाकर अनेक उपलब्धियां कमा चुका है। क्या हैं, ‘सेमीकंडक्टर चिप’ की अहमियत और उपलब्धियां?

चक्रेश जैन

साल 2025 के उत्‍तरार्द्ध में भारतीय विज्ञान ने बड़ा कदम बढ़ाते हुए देश में पूरी तरह स्वदेशी ‘32-बिट माइक्रोप्रोसेसर चिप’ लॉन्च की है। पूरी तरह देश में ही निर्मित पहली सेमीकंडक्टर चिप के साथ भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच गई है। इस यात्रा का शुभारंभ दो सितंबर 2025 में ‘सेमीकॉन इंडिया 2025’ सम्मेलन के साथ हुआ, जो इसमें एक और नया अध्याय जोड़ने का अवसर साबित हुआ है। दरअसल इसका लक्ष्य आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका रेखांकित करना है।

भारत ने लगभग चार साल पहले 2021 में ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (आईएसएम) शुरु किया था, जिसका उद्देश्य देश के भीतर ही वाइब्रेंट चिप्स का निर्माण रखा गया है। ‘आईएसएम’ की नोडल एजेंसी ‘इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’ है। भारत सरकार ने इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के लिए पचहत्‍तर हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। सरकार द्वारा देश में सेमीकंडक्टर  चिप बनाने के लिए गुजरात के साणंद और धोलेरा तथा असम के मोरीगांव में संयंत्र स्थापित किये गये हैं। इनमें इसी साल उत्पादन शुरु हो जायेगा।

वस्तुतः सेमीकंडक्टर अथवा अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स का दिमाग अथवा ब्रेन है। सेमीकंडक्टर चिप को ‘एकीकृत परिपथ’ और ‘माइक्रोप्रोसेसर’ भी कहते हैं। सेमीकंडक्टर आमतौर पर सिलिकॉन, जर्मेनियम अथवा गैलियम आर्सेनाइड से बनाये जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चिप निर्माण के क्षेत्र में भारत पारम्परिक सिलिकॉन आधारित सेमीकंडक्टरों से नवीनतम सिलिकॉन कॉर्बाइड आधारित सेमीकंडक्टरों की ओर अग्रसर हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2026 में भारत का सेमीकंडक्टर बाजार पचपन बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जायेगा। अभी तक सेमीकंडक्टर चिपों के निर्माण में अमेरिका, चीन, ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया का एकाधिकार रहा है, लेकिन अब भारत भी इस दौड में शमिल हो चुका है।

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सेमीकंडक्टर चिप के बिना स्मार्टफोन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी प्रकार इस चिप के बिना लैपटॉप के बारे में भी सोचा नहीं जा सकता। यही नहीं यह वही चिप है, जिसके बिना रॉकेट और उपग्रहों का प्रक्षेपण संभव नहीं है। अतः यहां पर एक सवाल सहज रूप से पूछा जा सकता है कि हमारे जीवन में सेमीकंडक्टर का क्या स्थान है? बहुत ध्यान से देखा जाये तो सेमीकंडक्टरों की भूमिका मोटे तौर पर तीन तरह से दिखाई दी है। पहला, मानव जीवन को बेहतर बनाते हैं। दूसरा, भविष्य का निर्माण करते हैं। तीसरा, किसी भी राष्ट्र अथवा देश को मजबूत बनाते हैं।

सेमीकंडक्टरों के बारे में बात करते समय ‘आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस’ (एआई) की चर्चा भी बेहद प्रासंगिक है। अभी तक इस दिशा में अनुसंधान और अनुभवों से यह स्पष्ट हो चुका है कि ‘एआई’ केवल एक उपकरण नहीं है। यह मानवीय रचनात्मकता का सहयोगी भी है। अगर यह पूछा जाये कि ‘एआई’ को कौन ताकत प्रदान करता है, तो इसका संक्षेप में जवाब होगा सेमीकंडक्टर चिप। अगर हम गणितीय कोण से सोचें तो कहा जा सकता है कि जितने ज्यादा सेमीकंडक्टर चिप्स होंगे, कम्प्यूटिंग पॉवर का उतना अधिक विस्तार होगा और जितना अधिक कम्प्यूटिंग पॉवर होगा, उतना अधिक ‘एआई’ स्मार्ट होगा। स्मार्ट ‘एआई’ की बदौलत हम आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे। सच तो यह है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में विशिष्ट भूमिका के कारण सेमीकंडक्टर हमारी आम जिन्दगी का अहम हिस्सा बन गये हैं। बीते पांच दशकों के दौरान सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी के विकास ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को लघु, तेज रफ्तार और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।

‘विक्रम 32 माइक्रोप्रोसेसर चिप’ पहले से बनाये गये स्वदेशी ‘16 बिट विक्रम 1601’ का उन्नत संस्करण है। खास बात यह है कि इसके निर्माण में प्रयुक्त प्रौद्योगिकी भारत ने विकसित की है। इस चिप का नाम विख्यात भारतीय वैज्ञानिक और अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितृ-पुरुष डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। इसका निर्माण ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इसरो) की चंडीगढ़ स्थित सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला (एससीएल) ने किया है। ‘विक्रम’ चिप का उपयोग रॉकेट और उपग्रहों में किया जायेगा। ‘विक्रम 32’  माइक्रोप्रोसेसर चिप का देश में ही निर्माण हमारी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग क्षमता का ठोस प्रमाण है। कुछ लोग इसे ‘डिजिटल डायमंड’ भी कहते हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने में जी-जान से जुट गया है और कुछ ही वर्षों में इसका व्यापक प्रभाव नजर आयेगा। ‘नीति आयोग’ के पूर्व उपाध्यक्ष और अर्थशास्त्री डॉ. राजीव कुमार के अनुसार भारत की आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी कुंजी सेमीकंडक्टर पदार्थ हैं। उनका विचार है कि इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए निवेश, प्रतिभा विकास और अनुसंधान की आवश्यकता है। सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए कई रसायनों की जरूरत पड़ती है। इनमें सिलिकॉन सबसे प्रमुख है। सिलिकॉन विशुद्ध रूप में एक अच्छा सुचालक है। यह रासायनिक तत्व है, जिसका परमाणु नंबर 14 है। यह कॉर्बन परिवार का नजदीकी रिश्तेदार है। इसकी खोज 1824 में हुई थी।

दरअसल सेमीकंडक्टर वे पदार्थ अथवा मटेरियल हैं, जिनकी ‘विद्युत चालकता’ ‘कंडक्टर’ (सुचालक) और ‘इन्सुलेटर’ (कुचालक) के मध्य होती है। इन पदार्थों की ‘विद्युत कुचालक क्षमता’ को अशुद्धियों अर्थात् डोपिंग द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सेमीकंडक्टर आंशिक तौर पर विद्युत का संचालन करते हैं। सेमीकंडक्टर पदार्थों को मोटे तौर पर आंतरिक और बाहरी अर्धचालक में बांटा गया है।

सेमीकंडक्टर चिप केवल कुछ देशों की सरकारों और वहां के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और विशेषज्ञों के बीच चर्चा और विचार मंथन का मुद्दा नहीं है। इसका रिश्ता डिजिटल अर्थव्यवस्था से है। वास्तव में देखा जाये तो यह डिजिटल व्यवस्था का मजबूत आधार है। मोबाइल अथवा स्मार्ट फोन से लेकर मिसाइल तक रक्षा विज्ञान से लेकर चिकित्सा उपकरणों और लैपटॉप से लेकर कारों के निर्माण में इसका उपयोग हो रहा है। भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में आत्मनिर्भर बनाने में सेमीकंडक्टर चिप का बहुत बड़ा हाथ रहा है। ‘इसरो’ ने रॉकेटों और उपग्रहों के निर्माण में सेमीकंडक्टर का उपयोग किया है।

सेमीकंडक्टर चिप के उपयोग का दायरा व्यापक है। इसका लगातार विस्तार हो रहा है। इनका उपयोग स्वच्छ ऊर्जा और एयरोस्पेस के क्षेत्र में हो रहा है। इसी प्रकार रेडियो, टेलीविजन, वीडियो गेम्स आदि उपकरण भी सेमीकंडक्टर की देन हैं। सेमीकंडक्टर का सौर पैनलों और डॉयोड में भी उपयोग हो रहा है। कैमरा सेंसरों में भी सेमीकंडक्टर की जरूरत होती है। असल में सेमीकंडक्टर चिप्स डिजिटल युग के हर आधुनिक उपकरण की रीढ़ हैं। ऐसा माना जा रहा है कि भारत सेमीकंडक्टर चिप के निर्माण के क्षेत्र लंबी लकीर खींच सकता है। इसका एक बहुत बड़ा कारण उसके पास चिप डिजाइन की अच्छी और व्यापक अनुभव संपदा है। (सप्रेस)

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श्री चक्रेश जैन विज्ञान संचारक हैं और लोकप्रिय विज्ञान के विषयों और समसामयिक मुद्दों पर विज्ञान की पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हैं।

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