किसानों की समस्याओं की अवहेलना और मांगों के संदर्भ में लिखा प्रधानमंत्री को पत्र

जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय व्‍दारा किसानों के हित में की गई मांगें

कोविड महामारी और लगातार चले लाकडाउन की स्थिति में देश के किसान और जनता के सामने गम्भीर समस्याएं पैदा हो गई है। किसानों की अर्थव्यवस्था ने ही विश्व वित्तीय व आर्थिक संकट के दौरान भारत को कुछ हद तक बचाए रखा है। कोविड से लड़ने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि देश के खेतों की अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता को सुधारा जाए।

जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की राष्‍ट्रीय समन्‍वयक मेधा पाटकर एवं साथियों ने राहत पैकेज में घोषित किये गये किसान विरोधी फैसले के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में कहा कि यह एक उचित समय था जब किसानों और खेत मजदूरों को, देश के कुल श्रम शक्ति का 50 फीसदी हैं, पर्याप्त राहत प्रदान करके सबसे निचले पायदान पर जीवन बसर कर रहे नागरिकों का विकास सुनिश्चित किया जा सकता था। ये वे लोग हैं जो बाजार की कठिन परिस्थितियों और सरकार की विपरीत नीतियों के बावजूद मेहनत करके पूरे देश में खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। हम इस बात की सराहना करते हैं कि आपने इन मेहनतकश किसानों के योगदान पर भरोसा करके ही एक साहसी घोषणा की थी कि देश के खाद्यान्न भंडार भरे हुए हैं और आपकी सरकार किसी तरह की कमी नहीं आने देगी।

मेधा पाटकर, सुनीती सु.र., संजय मं गो, सुहास कोल्हेकर आदि साथियों व्‍दारा जारी इस  पत्र में किसानों, गरीबों और प्रवासी मजदूरों की देखभाल तथा सरकार की आर्थिक राहत योजना के बारे में कई जायज समस्‍याओं के निराकरण के लिए मांग की गई है। किसानों की देखभाल के बारे में कहा गया कि सभी किसानों, भूमिहीनों व खेतीहर मजदूरों के कर्जे माफ एवं इस अवधि के बिजली के घरेलू, व्यवसायिक व ट्यूबवेल के बिल माफ किेये जाए। बीज, खाद, कीटनाशक दवा के दाम इस सत्र में कम से कम 50 फीसदी किये जाने की मांग की है।

 गरीबों की देखभाल के लिए केवल कार्ड धारकों को 5 किलो अनाज प्रति व्यक्ति प्रति माह देने की नीति बदली जानी चाहिए और उन सबको 15 किलो अनाज और कम से कम 1 किलो दाल, तेल व चीनी प्रति माह उपलब्ध कराया जाए। यदि सभी 135 करोड़ लोगों को 15 किलो अनाज दिया जाएगा तो इसका बोझ मात्र लगभग 2 करोड़ टन प्रति माह ही पड़ेगा।

पत्र में मनरेगा के संदर्भ में कहा गया कि ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर काम चाहने वाले व्‍यक्ति को 6 माह तक मनरेगा के अन्तर्गत काम मिले या कानून के अनुसार इस अवधि का भुगतान मिले,  उन सभी मनरेगा कार्डों, जो काम न करके केवल भुगतान उठाते हैं, को रद्द किया जाए और ऐसे नीतिगत परिवर्तन लाए जाएं जिससे मनरेगा काम का लाभ किसानों को मिल सके।

साथ ही यह भी मांग की गई कि कोरोना संकट से उबरने के लिए, इस दौरान हुई जीविका के नुकसान की भरपाई के लिए हर व्यक्ति को 10,000 रुपये प्रतिमाह भुगतान किया जाए। सारी स्वास्थ्य सुविधाएं तुरन्त चालू कराई जाएं और हर गांव में डिस्पेन्सरी खोली जाएं।

पत्र में प्रवासी मजदूरों की देखभाल के संदर्भ में लिखा है कि सभी ट्रेन व अन्तर्राज्यीय बसें तुरंत शुरु की जाएं ताकि प्रवासी मजदूर घर लौट सकें। इसमें विलम्ब करने से शहरों की बस्तियों में कोरोना वायरस का फैलाव बढ़ता जाएगा। सभी छोटे व्यवसायियों, उत्पादन व स्थानीय परिवहन को तुरंत चालू किया जाए।

अंत में सरकार की आर्थिक राहत योजना के बारे में लिखा है कि केंद्र सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु कानून व मंडी कानून समाप्त करने, ई-नाम, खेत की दहलीज से बड़े व्यापारियों व व्यवसायिक एजेंटों द्वारा फसलें खरीदने, ठेका खेती शुरु कराने, निजी भंडारण, शीत भंडारण, खाद्यान्न प्रसंस्करण और सप्लाई चेन, आदि में करापोरेट को बढ़ावा देने से किसानों की बची-खुची स्वतंत्रता भी समाप्त हो जाएगी।

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