किसानों के विरोध की विरासत

कुमार संजय सिंह

कडकती सर्दी में डेढ-दो हफ्तों से दिल्‍ली में धरना दिए बैठे देशभर के किसानों के ‘जीने-मरने’ की इस लडाई को पंजाब-हरियाणा के किसानों का नेतृत्‍व मिला है। सवाल है कि क्‍या पंजाब-हरियाणा के किसानों को उनके इतिहास से कोई प्रेरणा मिलती है?

20 और 22 सितम्बर को संसद में तीन कृषि बिल पारित हुए। ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक – 2020,’ ‘कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन, कृषि सेवा पर करार विधेयक – 2020’ और ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक।‘  इनके कारण पंजाब में अभी एक तीखे कृषक आन्दोलन को उभरते हुए देखा जा सकता है। पंजाब में इकतीस कृषि संगठनों ने राज्य को पूरी तरह बंद कर दिया है; ट्रेनें थम गई हैं, टोल प्लाजा बंद हैं, रिलायंस के मॉल और पेट्रोल पंप बंद कर दिए गए हैं और रिलायंस के ‘जिओ सिम कार्ड’ का लोग बहिष्कार कर रहे हैं।

किसान अपने आन्दोलन को वापस ले लें, इसके लिए सरकार के हर उपाय अभी तक नाकाम साबित हुए हैं। हकीकत तो यह है कि भाजपा खुद को पंजाब में बिलकुल अलग-थलग पा रही है। किसानों के गुस्से ने उसके सबसे पुराने मित्र अकाली दल को भी एनडीए छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। अकाली दल और आम आदमी पार्टी के समर्थन से पंजाब सरकार ने केंद्र के कानून के खिलाफ तीन बिल पास किये हैं। किसान आन्दोलन अब दिल्ली पहुँच चुका है। भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार के सामने फिलहाल ठिठुरती सर्दी के बीच किसानों के अंसतोष की आग सुलग रही है।  

यह समझने के लिए कि किसान मोदी सरकार के विधेयकों से इतने नाराज क्यों हैं और केंद्र सरकार क्यों आन्दोलन को काबू करने में विफल रही है, यह जरूरी है कि हम पंजाब की राजनीति में किसान आंदोलनों की भूमिका और कृषि बिलों को लेकर किसानों को हो रही फिक्र की जड़ तक जाएँ। औपनिवेशिक काल में वाणिज्यिक कृषि के शुरू होने के समय से ही किसान आन्दोलन पंजाब की राजनीति का एक ख़ास पहलू रहे हैं। पंजाब में कृषि आन्दोलन विशेष चरणबद्ध तरीके से विकसित हुआ है।

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ब्रिटिश राज के दौरान किसान आन्दोलन इसलिए हुए क्योंकि उनका मकसद था – कैनाल टैक्स के जरिए कर बढाने और भू-राजस्व में वृद्धि के औपनिवेशिक सरकार के प्रयासों का विरोध करना। पंजाब रियासत में किसान इसलिए विरोध कर रहे थे क्योंकि ज़मींदारों और अधिकारियों द्वारा छीनी गई ज़मीन को वे वापस लेना चाहते थे। काश्तकारों ने ज़मींदारों को बटाई या उसका हिस्सा देने से इनकार कर दिया था।     

सन् 1907 के ‘कैनाल कालोनी आन्दोलन’ में पंजाब के कृषकों को सरदार अजित सिंह जैसे बड़े नेताओं ने संगठित किया था। वे शहीदे आज़म भगत सिंह के चाचा थे। सरदार अजित सिंह ने ‘पगड़ी सम्हाल जट्टा’ आन्दोलन को संगठित किया था। यह आन्दोलन 1906 के किसान विरोधी कानून, ‘पंजाब कोलोनाइज़ेशन एक्ट’ के विरोध में था। इसमें पानी की दरें बढ़ाने के प्रशासन के आदेश का भी विरोध किया गया था। सन् 1924 में भी पंजाब के किसानों ने जल-दर बढ़ाये जाने के खिलाफ सफलतापूर्वक आन्दोलन किया था।      

काश्तकारों के अधिकारों को लेकर सामंती कृषि प्रणाली में जो अंतर्विरोध थे, उनके कारण विशेष रूप से कम्युनिस्ट पार्टी की ‘किसान सभा’ के तहत किसान संगठित हुए थे। सन् 1930 के दशक में ‘किसान सभा’ के आन्दोलन ने किसानों को जल और भू राजस्व के मुद्दों पर संगठित किया था। ‘किसान सभा’ के आंदोलनों की सर्वोच्च उपलब्धि आजादी के बाद के ‘लैंड सीलिंग एक्ट’ के रूप में हुई थी।

साठ के दशक की ‘हरित क्रांति’ के समय नई कृषि टेक्नोलॉजी और कृषि संबंधी गतिविधियों का मुद्रीकरण जब शुरू हुआ तो कृषि संबंधी रूपांतरण का दूसरा चरण शुरू हुआ। इस चरण का मुख्य विरोधाभास था –  ग्रामीण और शहरी सेक्टर के बीच व्यापारिक आधार पर असमानताएं। इसी भेदभाव को ख़त्म करने के उद्येश्य से किसानों का आन्दोलन शुरू हुआ। ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) आन्दोलन के इसी चरण का परिणाम था।

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किसानों के संघर्ष के वर्तमान चरण का उद्देश्‍य है, ‘एमएसपी’ के लिए एक सुरक्षा तंत्र निर्मित करना। पंजाब के किसान इस बारे में सजग हैं कि ‘एमएसपी’ की अनुपस्थिति में किसानों के हित पर क्या दुष्प्रभाव होगा। पंजाब में गेंहू और धान के लिए ‘एमएसपी’ पर सरकार की तरफ से शत-प्रतिशत खरीद है, पर मक्का जैसी फसल के लिए यह लागू नहीं होता। इसके लिए केंद्र सरकार हर वर्ष घोषणा करती है, पर राज्य में उस दर पर शायद ही कोई खरीद होती हो।

‘एमएसपी’ की घोषणा के बाद भी जिन फसलों को लेकर सरकारी खरीद का कोई आश्वासन नहीं मिलता, उन फसलों को खुले बाजार में कम मूल्य पर बेचने के अलावा किसानों के पास और कोई चारा नहीं होता। यही कारण है कि पंजाब में किसान केंद्र के नए कृषि कानून के खिलाफ खड़े हैं और इन विवादस्पद कानूनों को ख़त्म करवाने के लिए दृढ हैं।

यह समझा जाना चाहिये कि ‘एमएसपी’ पंजाब के किसानों के लिए जीवन और मृत्यु का प्रश्न है| ‘हरित क्रांति’ ने पंजाब को देश की रोटी की टोकरी में जरूर बदल दिया, पर साथ ही कृषि को श्रम प्रधान प्रक्रिया से एक पूंजी प्रधान प्रक्रिया में बदल डाला। औपचारिक ऋण की सुविधा न होने के कारण कृषि को बहुत हद तक उधार के लिए निजी संस्थानों और व्यक्तियों पर निर्भर रहना पड़ता है। पंजाब में गरीब और मध्यम वर्ग के किसानों के लिए ऋण का बोझ अवसाद और तनाव का मुख्य कारण है।

यह बहुत जरूरी है कि सरकार पंजाब में कृषि उत्पादों की व्यावहारिकता के पहलू को ध्यान में रखते हुए ‘एमएसपी’ के समर्थन की जरुरत को समझे। आर्थिक दृष्टि से इस क्षेत्र को अस्थिर बना देना सही नहीं होगा, क्योंकि अभी भी यह रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र है।

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उबलते हुए क्रोध के राजनीतिक पहलू को देखते हुए भी यह जरूरी है कि भारत सरकार किसानों के आक्रोश को तुरंत शांत करे। ऐसी ख़बरें भी हैं कि खालिस्तान का आन्दोलन पंजाब में वापस लौट रहा है। किसानों का मौजूदा आक्रोश इसे फिर से भड़काने के लिए आग में घी का काम करेगा। जो ऐतिहासिक वास्तविकताओं को भूल चुके हैं, सिर्फ वे ही 1980 के दशक में कृषक आक्रोश और खालिस्तान आन्दोलन के बीच के संबंध को भूलने की गलती करेंगे। (सप्रेस)

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