मजदूरों की याद दिलाने के लिए ‘मजदूर दिवस’

‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ (1 मई) पर विशेष

प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

जंगल की कटाई की जगह वृक्ष-रोपड़ संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा हो। उनकी देखरेख की संस्कृति हमारे जीवन की संस्कृति बने। यह तभी होगा जब हमारी विश्वास की सघनता बढ़ेगी इस प्रकृति से, जल से और हमारे जलवायु से। यह तभी होगा जब हम अपनी नवोदित पीढ़ी में भी प्रकृति से प्रेम करने का बीज अंकुरित कर सकेंगे। ऐसा करने पर, एक अहिंसक सुखद यात्रा का मनुष्य तभी भागीदार बन सकेगा जब हमारे जीवन में हमारे जीवन के संबल होंगे।

प्रतिवर्ष 1 मई का दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ अथवा ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है। यह दिवस समाज के उस वर्ग के नाम है, जिसके कंधों पर सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति तथा राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार इसी वर्ग के कंधों पर होता है। वर्तमान मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं है। ‘श्रमिक दिवस’ और श्रम के महत्व को रेखांकित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट का कहना था कि किसी व्यवसाय को ऐसे देश में जारी रहने का अधिकार नहीं है, जो अपने श्रमिकों से जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी से भी कम मजदूरी पर काम करवाता है। जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी से उनका आशय सम्मानपूर्वक जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी से था।

‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ के अवसर पर यह जानना आवश्यक है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे कब से और क्यों मनाया जाता है? अमेरिका में 8 घंटे से ज्यादा काम न कराने के लिए की गई कुछ मजदूर यूनियनों की हड़ताल के बाद 1 मई 1886 से ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ मनाए जाने की शुरूआत हुई थी। दरअसल वह ऐसा समय था, जब कार्यस्थल पर मजदूरों को चोट लगना या काम करते समय उनकी मृत्यु हो जाना आम बात थी। ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने, कार्य करने के घंटे कम करने तथा सप्ताह में एक दिन के अवकाश के लिए मजदूर संगठनों द्वारा पुरजोर आवाज उठाई गई।

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1 मई 1886 का ही दिन था, जब वह हड़ताल हुई थी और शिकागो शहर के हेय मार्किट चौराहे पर उनकी रोज सभाएं होती थीं। 4 मई 1886 को हड़ताल के दौरान पुलिस भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास कर रही थी, उसी दौरान किसी अज्ञात शख्स ने एकाएक भीड़ पर बम फैंक दिया। उसके बाद पुलिसिया गोलीबारी के कारण कई श्रमिक मारे गए। हालांकि उस समय अमेरिकी प्रशासन पर उन घटनाओं का कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन बाद में श्रमिकों के लिए 8 घंटे कार्य करने का समय निश्चित कर दिया गया।

मजदूरों पर गोलीबारी और मौत के दर्दनाक घटनाक्रम को स्मरण करते हुए ही 1 मई 1886 से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाने लगा। 1889 में पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में फ्रांसीसी क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि इसे ‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाए। उसी समय से विश्वभर के 80 देशों में ‘मई दिवस’ को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

श्रमिक वर्ग ही है, जो अपनी हाड़-तोड़ मेहनत के बलबूते राष्ट्र के प्रगति चक्र को तेजी से घुमाता है, लेकिन कर्म को ही पूजा समझने वाला श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है। ‘मई दिवस’ के अवसर पर देशभर में भले ही मजदूरों के हितों की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं, ढ़ेरों लुभावने वायदे किए जाते हैं, जिन्हें सुनकर एकबारगी तो लगता है कि उनके लिए अब कोई समस्या नहीं बचेगी, किन्तु अगले ही दिन मजदूरों को पुनः उसी माहौल से रूबरू होना पड़ता है, फिर वही शोषण, अपमान व जिल्लत भरा तथा गुलामी जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है। समय-समय पर मजदूरों के लिए नए सिरे से मापदंड निर्धारित किए जाते हैं लेकिन इनको क्रियान्वित करने की फुर्सत ही किसे है?

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जहां तक मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों की मांग का सवाल है तो मजदूरों के संगठित क्षेत्र द्वारा ऐसी मांगों पर उन्हें अक्सर कारखानों के मालिकों की मनमानी और तालाबंदी का शिकार होना पड़ता है और प्रायः जिम्मेदार अधिकारी भी कारखानों के मालिकों के मनमाने रवैये पर लगाम लगाने की चेष्टा नहीं करते। जहां तक मजदूर संगठनों के नेताओं द्वारा मजदूरों के हित में आवाज उठाने की बात है तो आज के दौर में अधिकांश ट्रेड यूनियनों के नेता भी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बने हैं, जो विभिन्न मंचों पर श्रमिकों के हितों के नाम पर शोर तो बहुत मचाते नजर आते हैं, लेकिन अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु कारखानों के मालिकों से सांठगांठ कर अपने ही साथियों के हितों पर कुल्हाड़ी चलाने में संकोच नहीं करते।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर किसके लिए मनाया जाता है ‘श्रमिक दिवस?’ बहुत से मजदूरों की तो इस दिन भी काम करने के पीछे यह मजबूरी भी होती है कि अगर वे एक दिन भी काम नहीं करेंगे तो उनके घरों में चूल्हा कैसे जलेगा। विड़म्बना है कि देश की स्वाधीनता के सात दशक से अधिक बीत जाने के बाद भी अनेक श्रम कानूनों को अस्तित्व में लाने के बावजूद हम ऐसी कोई कारगर व्यवस्था नहीं कर पाए हैं, जो मजदूरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिला सके। हालांकि इस संबंध में एक सच यह भी है कि अधिकांश श्रमिक या तो अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ होते हैं या वे अपने अधिकारों के लिए इस कारण आवाज नहीं उठा पाते कि कहीं इससे नाराज होकर उनका मालिक उन्हें काम से न निकाल दे और उनके परिवार के समक्ष भूखे मरने की नौबत आ जाए। (सप्रेस)

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