KIIT भुवनेश्वर : सीखने लायक नेपाल

अरुण कुमार डनायक

अभी कुछ दिन पहले उडीसा के एक निजी संस्थान में नेपाली छात्रा की आत्महत्या और प्रतिकार करने पर सैकडों नेपाली छात्रों को संस्थान से निकाल दिए जाने को लेकर नेपाल में भारी बवाल मचा है। इस दबाव में जांच समिति बनाने और निकाले गए छात्रों को वापस लेने के बावजूद मामला शांत नहीं हुआ है। सवाल है कि क्या हम इस पूरे कांड से कुछ सीख सकते हैं?

उडीसा के भुवनेश्वर स्थित निजी संस्थान ‘कलिंगा इंस्टिट्यूट आफ इंडस्ट्रियल टेक्नॉलॉजी’ (KIIT) की एक बीस वर्षीय नेपाली छात्रा प्रकृति लंसाल ने विगत दिवस जब अपने छात्रावास कक्ष में आत्महत्या कर ली तो इससे आक्रोशित 500 से अधिक नेपाली छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना-प्रदर्शन शुरू कर वहाँ से लोगों की आवाजाही बंद कर दी। बदले में विश्वविद्यालय ने विरोध प्रदर्शन कर रहे इन नेपाली छात्रों को तत्काल न केवल बर्खास्त कर दिया, बल्कि उन्हें अपने घर वापस जाने का नोटिस थमा दिया। नेपाली छात्रों को बसों में भरकर रेलवे स्टेशन तक छोड़ दिया गया।  

जब विश्वविद्यालय प्रशासन की इस हरकत की जानकारी नेपाल सरकार को मिली तो उसने तत्काल भारत स्थित अपने दूतावास को सचेत किया। नेपाल दूतावास से दो अधिकारियों को वहाँ भेजा गया। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली व दूतावास के अधिकारियों के हस्तक्षेप के फलस्वरूप विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने निर्णय को वापस ले लिया और छात्रों को परिसर में रहने की अनुमति दे दी। उडीसा की ‘भारतीय जनता पार्टी’ की राज्य सरकार ने भी विश्वविद्यालय से छात्रों को छात्रावास में रहने देने के लिए निर्देशित किया है।

नेपाली दूतावास ने विश्वविद्यालय से वहाँ रह रहे नेपाली छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। नेपाल सरकार की सक्रियता के कारण नेपाली छात्रों का उत्पीडन रुक गया। नेपाल सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने ऐसे संस्थानों पर भविष्य में प्रवेश हेतु अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगा देने का आदेश भी जारी कर दिया जहां से नेपाली छात्रों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें आयेंगी।   

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उधर, नेपाल की संसद में भी 18 फरवरी को विपक्ष द्वारा तीव्र विरोध प्रदर्शन किया गया। विपक्षी सदस्यों ने ‘कलिंगा इंस्टिट्यूट आफ इंडस्ट्रियल टेक्नॉलॉजी, भुवनेश्वर’ में छात्रा की आत्महत्या को लेकर आक्रोश व्यक्त किया और जांच की मांग कर रहे नेपाली छात्रों के खिलाफ विश्वविद्यालय के कर्मचारियों द्वारा की गई नस्लभेदी टिप्पणियों पर भी नाराजगी जताई।  विपक्षी सांसदों ने विश्वविद्यालय की मृतक छात्रा व विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ व्यक्त प्रतिक्रिया को नेपाल का अपमान बताया।  

नेपाल के प्रधानमंत्री व दूतावास के अधिकारियों के सक्रिय हस्तक्षेप तथा संसद में हुई व्यापक चर्चा का परिणाम यह हुआ कि उडीसा सरकार को अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करना पडा है। यह समिति उन परिस्थितियों की जांच करेगी जिसने छात्रा को आत्महत्या के लिए विवश किया। इसके अलावा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गई कथित सख्ती, नेपाली छात्रों को जारी किये गए बेदखली नोटिस के कारणों और घटना के अन्य पहलुओं की जांच भी समिति के द्वारा की जायेगी। इस घटना के दोषी दो छात्रों व विश्वविद्यालय के तीन कर्मचारियों को राज्य पुलिस ने अभी तक गिरफ्तार भी कर लिया है तथा नेपाली छात्रों की मांग पर मृतक छात्रा को ब्लैकमेल कर रहे उसके सहपाठी, आरोपी छात्र का लेपटाप व मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया है।

नेपाल के छात्रों के अहिंसक विरोध प्रदर्शन, नेपाल के प्रधानमंत्री के निर्देश पर दूतावास के अधिकारियों की सक्रियता, विपक्ष द्वारा नेपाल की संसद के दोनों सदनों-‘राष्ट्रीय सभा’ व ‘प्रतिनिधि सभा’ में चर्चा की मांग उठाए जाने व सरकार द्वारा इस मांग को स्वीकार करते हुए पर्याप्त चर्चा कराने से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

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राष्ट्रीय अस्मिता व सम्मान की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का सर्वप्रथम कर्तव्य है। हमें यह सीख तो महात्मा गांधी ने ही सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन के माध्यम से दी है। जनता के साथ-साथ सरकार का भी कर्तव्य है कि जहां कहीं भारतीय नागरिकों को शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़े और हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का अपमान हो, हमारी एकता और अखंडता पर आंच आये, उसका उचित तरीके से राजनीतिक व कूटनीतिक स्तर पर दृढ़ता से प्रतिकार करना चाहिए।

लोकसभा व राज्यसभा के पीठासीन अधिकारियों को भी विपक्ष द्वारा ऐसे मुद्दे उठाये जाने का तत्काल संज्ञान लेना चाहिए तथा सरकार को इस विषय में सत्य जानकारी बिना किसी लीपापोती के सदन को देने हेतु निर्देशित करना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। जब कभी विपक्ष सदन में लोकहित के मुद्दे उठाने का प्रयास करता है अथवा स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से चर्चा कराने की मांग करता है, तो दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा विपक्ष की मांग को बिना कोई कारण बताये  नकार दिया जाता है।

किसी गंभीर घटना पर सदन में सम्बंधित विभाग के मंत्री द्वारा स्वप्रेरित अथवा स्वयं की पहल पर दिए गए बयान से बात नहीं बनती, क्योंकि इसमें न तो चर्चा का प्रावधान होता है और न ही जवाबदेही तय होती है। नेपाल की संसद में चर्चा से हमारी सरकार को सबक लेना चाहिए। हमें अभी हाल में महाकुम्भ में भगदड़ से मौत, दिल्ली रेलवे स्टेशन का हादसा, प्रदूषित हो रही गंगा-यमुना, अमेरिका से प्रवासी भारतीयों की अपमानजनक वापसी पर सदन में व्यापक चर्चा करानी चाहिए तभी लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना होगी। (सप्रेस)

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