नर्मदा बचाओ आंदोलन के 36 साल पूरे होने पर जन संसद का आयोजन

बडवानी । नर्मदा बचाओ आंदोलन के 36 वर्ष पूर्ण होने पर बडवानी में आज किसान मजदूर जन संसद का आयोजन किया गया। जिसमें मध्य प्रदेश ,गुजरात और महाराष्ट्र के हजारों किसानों ने शिरकत की। वहीं नर्मदा घाटी के गांव गांव से हजारों लोग बड़वानी पहुंचे। इस किसान मजदूर जन संसद में अतिथि के रूप में किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, हन्नान मोल्ला, डॉ सुनीलम, तेजिंदर सिंह विर्क, मेधा पाटकर ने भरी बारीश में मंच संभाला। शहीद भगत सिंह की भांजी गुरजीत कौर,  पूनम पंडित सहित विभिन्न किसान और जनांदोलन के साथी भी इसमें सम्मिलित हुए।

जन संसद में पहुंचने से पहले बडवानी शहर में एक रैली का आयेाजन किया गया जिसमें बैलगाडी पर राकेश टिकैत,  योगेंद्र यादव, डॉ सुनीलम, मेधा पाटकर बैठकर आमजन के बीच पहुंचे।

राकेश टिकैत ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि ये सरकार किसी विचार धारा या देश की नहीं है, ये सरकार उद्योगपतियों की सरकार है। ये सिर्फ बड़े-बड़े उद्योगपतियों की चिंता करती है। टिकैत ने कहा कि सरकार किसान नीतियों को लेकर देश को गुमराह करने का काम कर रही है। स्वामीनाथन की रिपोर्ट को लेकर कहा कि जो सिफारिश लागू की गई है, ये सिर्फ गुमराह करने वाली है। इसे लागू करने में भी सरकार ने गुमराह किया है, जो नीति तय होना था वह न करते हुए उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का काम किया है, ये सरकार उद्योगपतियों की सरकार है।

स्‍वराज इं‍डिया के संयोजक योगेन्‍द्र यादव ने कहा कि नर्मदा बचाओ आंदोलन ऐसा संघर्ष है जिसने आज के समय के संघर्षों के लिए सीख ली जा सकती है। पूरे देश में जल, जंगल और जमीन की लडाई के लिए एक उदाहरण है नर्मदा बचाओ आंदोलन।

उल्‍लेखनीय है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन का 36 साल का सफर दिखाता है कि आखिर कैसे ये आंदोलन इतने लंबे समय से टिका रह पाया और कैसे इसके बिना देश में जनसंघर्षों और विकास के अंतर्विरोधों की बहस भी अधूरी रह जाती है। मोटे तौर पर हैरान कर देने वाले इस तथ्य की बारीकी में जाएं तो हमें संगठन का पारदर्शी और पदाधिकारविहीन लोकतांत्रिक स्वरूप, ठोस सुचिंतित और सुव्यवस्थित योजना, दीर्घ कार्ययोजना, संगठित, सुगठित, प्रतिबद्ध और समर्पित कार्यकर्ता और कुशल जनसंपर्क अभियान जैसे रणनीतिक कौशल देखने को मिलते हैं।

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