जगदीप छोकर और ‘एडीआर’ : क्या उनके बिना भी ऐसा ही होता हमारा लोकतंत्र

राकेश दीवान

12 सितंबर को प्रो. जगदीप छोकर के निधन से लोकतंत्र का एक प्रहरी चला गया। एडीआर की पहल से मतदाताओं को उम्मीदवारों की आपराधिक, आर्थिक व शैक्षिक पृष्ठभूमि जानने का अधिकार मिला और ‘नोटा’ विकल्प भी संभव हुआ। उनकी भूमिका ने चुनावी पारदर्शिता और जनजागरूकता को नई दिशा दी।

12 सितंबर की सुबह हम सबसे सदा के लिए विदा हुए प्रोफेसर जगदीप छोकर का होना हमारे लोकतंत्र के लिए क्या और कितनी अहमियत रखता था? क्या प्रोफेसर छोकर और उनके मित्रों की बनाई संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) के बिना हमारा लोकतंत्र, खासकर चुनाव वैसे होते, जैसे हम आज देख, महसूस रहे हैं? क्या चुनाव के बाद हमें पता चल पाता कि हमने अपनी-अपनी विधानसभाओं, संसद में कितने करोडपति, अपराधी और अपढ प्रतिनिधि भेजे हैं? क्‍या हम अपने क्षेत्र के सभी उम्‍मीदवारों को नकारा मानकर ‘नन ऑफ द अबव’ यानि ‘नोटा’ का बटन दबा पाते?

दरअसल इस पूरे सिलसिले की शुरुआत 1999 में तब हुई थी जब ‘भारतीय प्रबंधन संस्‍थान,’ (आईआईएम) अहमदाबाद के प्रोफेसर त्रिलोचन शास्‍त्री, प्रोफेसर जगदीप छोकर और डॉ. अजीत रानाडे ने दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय में जनहित याचिका लगाकर मांग की थी कि चुनाव में खडे होने वाले उम्‍मीदवारों को अपनी अपराधिक, आर्थिक और शैक्षणिक पृष्‍ठभूमि की जानकारी शपथपत्रों में भरकर ‘चुनाव आयोग’ को सौंपने के आदेश दिए जाएं। वर्ष 2002 में अदालत ने इस बात को मंजूर कर लिया, लेकिन फिर राजनीतिक जमातों की जिद पर मामला उच्‍चतम न्‍यायालय में गया। अगले साल, 2003 में उच्‍चतम न्‍यायालय ने भी लोकतंत्र के हित में उम्‍मीदवारों की पृष्‍ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग मान ली।

अदालत, ‘चुनाव आयोग,’ ‘सूचना आयोग’ जैसी संवैधानिक संस्‍थाओं, सहधर्मी संगठनों और देशभर में फैले अपने कुछ सैकडा स्‍वयंसेवकों की मदद से लोकतंत्र के एक बेहद महत्‍वपूर्ण अनुष्‍ठान, चुनाव और उसकी प्रक्रिया में सुधार या बदलाव की ‘एडीआर’ की इन कोशिशों को कभी राजनीतिक पार्टियों से कोई समर्थन, सहयोग नहीं मिला। उलटे, हर बार उसे अपनी कोशिशों की एवज में तीखे विरोध का सामना ही करना पडा है।

शुरुआत में उम्‍मीदवारों की निजी जानकारियों को शपथपत्र की मार्फत सार्वजनिक करने से लगाकर चुनावी चंदे की खातिर जारी किए जाने वाले ‘इलेक्‍टोरल बॉन्‍ड्स’ तक, किसी मामले में राजनीतिक दलों ने सहमति नहीं दिखाई। हालांकि लगभग सभी मामलों में उच्‍च व उच्‍चतम न्‍यायालयों, राज्‍य व केन्‍द्र के ‘चुनाव आयोगों,’ ‘सूचना आयोगों’ और दूसरी संवैधानिक इकाइयों ने हमेशा ‘एडीआर’ की बातों की तस्‍दीक ही की है। आखिर चुनावी प्रक्रिया के सुधार और वोटरों के प्रशिक्षण से लोकतंत्र तो मजबूत होगा ही, इससे राजनीतिक दलों को चुनावी मशक्‍कत में ज्‍यादा आसानी होने लगेगी। फिर क्‍यों सत्ता पर काबिज पक्ष और काबिज होने को हुलफुलाते विपक्ष को ‘एडीआर’ की कार्रवाइयों से इतनी असहमति होती रही?

इस सिलसिले में कुछ उदाहरण काबिल-ए-गौर हैं – ‘एडीआर’ की पहल पर उच्‍चतम न्‍यायालय ने सितम्‍बर 2013 में निर्वाचन अधिकारियों के लिए अनिवार्य कर दिया कि उम्‍मीदवारों द्वारा निजी जानकारियों को लेकर भरे गए शपथपत्र ठीक-ठाक भरे गए हों और ऐसा न होने पर आधे-अधूरे शपथपत्रों को निरस्‍त कर दिया जाए। फरवरी 2018 में सांसदों, विधायकों की संपत्‍ति में अकूत वृद्धि को लेकर ‘एनजीओ’ ‘लोक प्रहरी’ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। ‘एडीआर’ ने इस मामले में हस्‍तक्षेप करने के अलावा संबंधित जानकारियां भी उपलब्‍ध करवाईं और अदालत ने शपथ-पत्र के फॉर्म 26 में पति, पत्‍नी और आश्रितों की आय के श्रोत घोषित करना अनिवार्य कर दिया।    

मई 2014 में उच्‍चतम न्‍यायालय ने व्‍यवस्‍था दी थी कि ‘चुनाव आयोग’ किसी भी उम्‍मीदवार को चुनाव खर्च संबंधी गलत सूचना देने पर अयोग्‍य घोषित कर सकता है। राजनीतिक दलों को पारदर्शी और जबावदेह बनाने के लिहाज से ‘केन्‍द्रीय सूचना आयोग’ ने जून 2013 में छह राजनीतिक दलों को ‘लोक-सेवक’ यानि ‘पब्‍लिक अथॉरिटी’ घोषित कर दिया था, लेकिन दलों ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया। ‘एडीआर’ ने इस मामले पर उच्‍चतम न्‍यायालय में याचिका दायर की थी। 

इसी तरह मार्च 2014 में ‘एडीआर’ की याचिका पर दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को विदेशी धन लेने और ‘फॉरेन कन्‍ट्रीब्‍यूशन रेगुलेशन एक्‍ट’ (एफसीआरए) के उल्लंघन का दोषी पाया था। इस मामले में अदालत ने केन्‍द्रीय गृह मंत्रालय और ‘चुनाव आयोग’ को छह महीने में कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे, लेकिन भारतीय राजनीति के दोनों ही प्रमुख दल कानूनी कार्रवाई रुकवाने की गरज से उच्‍चतम न्‍यायालय चले गए।

‘एडीआर’ से जुडे एक कार्यकर्ता का कहना है कि ‘उपरोक्‍त तमाम प्रकरणों में समानता यह है कि सरकार और सारे राजनीतिक दल एकजुट होकर न्‍यायालयों के उन निर्णयों का विरोध कर रहे हैं जिनमें चुनावी व राजनीतिक सुधार प्रस्‍तावित हैं। पिछले सालों में चुनावों में बढता अपराधीकरण, बढता चुनावी खर्च, राजनीतिक दलों का वित्‍त-पोषण, ‘पेड-न्‍यूज रिपोर्टिग’ और इन्‍हें उजागर करने वाले कानूनों की कमी हमें देखने को मिलती है। पिछले दो-तीन दशकों में जो भी चुनावी सुधार हुए हैं वे न्‍यायिक सक्रियता और वकालत का ही परिणाम हैं।’  जाहिर है, चुनाव लडकर सत्‍ता प्राप्‍त करना सभी राजनीतिक दलों को सुहाता है, लेकिन उन चुनावों को सुधारने, उन्‍हें ईमानदार, पारदर्शी बनाने में किसी की कोई रुचि नहीं है। ऐसे में राजनैतिक जमातों, उनके स्‍वनामधन्‍य नेताओं का जो होना है, सो होगा, लेकिन इन कारनामों से क्‍या लोकतंत्र बच पाएगा? और क्या ऐसे में ‘एडीआर’ और उसे कुछ दशकों की अपनी मेहनत और निष्ठा से ठोस हकीकत में तब्दील करने वाले प्रोफेसर जगदीप छोकर जैसे कमाल के लोगों की कमी नहीं अखरेगी? (सप्रेस)

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