क्या दलीय लोकतंत्र से आगे कोई रास्ता नहीं है?

जयप्रकाश नारायण

जयप्रकाश नारायण

क्या वर्तमान दलीय लोकतंत्र का कोई विकल्प हो सकता है? और यदि हो सकता है तो उसका स्वरूप कैसा होगा? इस सिलसिले में प्रस्तुत है, ‘सप्रेस’ के भंडार में से देश के मूर्धन्य नेता, स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी स्व. श्री जयप्रकाश नारायण की जयन्ती (11 अक्टूबर, 1902 – 8 अक्टूबर, 1979) के अवसर पर ‘जेपी’ का यह विचारपूर्ण लेख।

जेपी की 122 वीं जयन्ती (11 अक्टूबर) पर विशेष

पिछली सदियों में राजनीति के विकास ने मानव समाज को जहां पहुंचा दिया है, वहां हम मानने लगे हैं कि अब उससे आगे कोई रास्ता नहीं है। मैं मानता हूं कि आज की मौजूदा शासन-व्यवस्था और उसके दावों के संबंध में हमें गंभीरता से सोचना चाहिये तथा उन दोषों को दूर करने के उपाय ढूंढने चाहिये। दलबंदी के झगड़े, सैद्धान्तिक धुवीकरण के बदले स्वार्थ की खींचातानी, सिद्धांतों को किनारे रखकर व्यक्तिगत या निहित स्वार्थों के लिये होने वाले दल-बदल, दलों की अंदरूनी अनुशासनहीनता, अवसरवादी गठबंधन, दलों, प्रतिनिधियों और प्रधानों का स्वेच्छाचार, पैसों का बेहिसाब खर्च, घूसखोरी, यह सब तो सहज ही हमारी नजरों के सामने आता रहता है। हमें अधिक गहरायी में जाना चाहिये।

क्या देश और दुनिया में स्थापित दलीय लोकतंत्र ही सर्वोतम लोकतंत्र है? उसके आगे का कोई मार्ग नहीं? अनुभव यह आया है कि दलीय लोकतंत्र मात्र दलतंत्र बन जाता है। दल भी गुटों में विभाजित होते हैं। अतः लोकतंत्र के स्थान पर ‘गुटतंत्र’ ही चलता है। उस पर भी नौकरशाही हावी हो जाती है। फिर वह जनता के नाम पर अपनी हुकूमत चलाती है। आज के लोकतंत्र में असली ‘लोक’ का तो कहीं अता-पता नहीं है। इसलिए दुनिया भर के विचारकों में दलगत लोकतंत्र के विषय में विचार-मंथन चल रहा है।

यह कैसा बहुमत है?

संसदीय लोकतंत्र के कई रूप हैं, जिनमें से एक इस देश में चल रहा है। यह लोकतांत्रिक ढांचा चुनाव प्रथा तथा मताधिकार पर आधारित है। मताधिकार का विचार एक जमाने में बड़ा क्रांतिकारी विचार था, लेकिन हम देख रहे हैं कि उससे सारा समाज कोई बहुत आगे नहीं बढ़ पाया। फिर भी वह कोई निकम्मी चीज है, ऐसी बात नहीं है, लेकिन जब हम आगे जाने की सोचते हैं, तब हमें जरूर देखना और समझना चाहिये कि वोट ही काफी नहीं है।

मतदाता सब कुछ सोच-समझकर मतदान करे, ऐसी स्थिति न तो यहां है और न दुनिया में ही कहीं है। फिर भी हम मानते हैं कि हमारे वोट पर बड़ा संसदीय लोकतंत्र बहुत अच्छी तरह चल रहा है। राज चलाने वाले मानते हैं कि वयस्कों को वोट का अधिकार दे दिया तो आदर्श राज्य-व्यवस्था हो गयी।

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हम आज जिसे बहुमत का राज कहते हैं, अगर सचमुच देखा जाय तो वह भी क्या बहुमत का राज होता है? संसद में किसी पार्टी को ज्यादा स्थान मिल जाते हैं, लेकिन फिर भी देश के कुल मतदाताओं का बहुमत उनके पीछे नहीं होता। वोट एक पक्ष को ज्यादा और सीट दूसरे पक्ष को ज्यादा, ऐसा कई जगह, कई बार देखने को मिलता है। इस तरह देखा जाये तो अगर किसी एक पार्टी को 35 प्रतिशत ही मत मिले, परंतु संसद में सीटें ज्यादा मिलीं, तो सरकार उसी पार्टी की बनेगी।

जितने मतदाता होते हैं, वे सब-के-सब मत देने तो कभी नहीं आते। औसतन 50-60 प्रतिशत में से भी वास्तव में 20-25 प्रतिशत लोगों ने ही जिस पार्टी को वोट दिया है, आज के जनतंत्र में उसी पार्टी का राज होगा। तब भी माना यह जाता है कि यह जनतंत्र, यानी बहुमत का राज है, यद्यपि व्यवहार में अल्पमत का ही राज चलता है। चुनाव को हमने लोकतंत्र का मुख्य साधन तो बनाया, लेकिन किसी गरीब के लिये यह असंभव हो गया है कि वह चुनाव में स्वयं खड़ा हो सके या गरीब लोग मिलकर ही उसे खड़ा कर सकें। ऊपर से खड़े किये गये उम्मीदवारों में से जो जीतते हैं, वे ही जनता के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

मौजूदा लोकतंत्र के ऐसे कई बड़े और महत्वपूर्ण दोष हैं। वास्तव में जरा बारीकी से देखें तो आज न जनता का राज है, न ही बहुमत का राज है। वस्तुत: अंत में चंद लोगों के हाथ में ही सता का केन्द्रीकरण हो जाता है और फिर वह अफसरों का ही राज बन जाता है। इस तरह, अभी सही मायने में जनता का राज तो कोसों दूर है। ‘आज तक जिस रास्ते चलते आये हैं, उसी रास्ते पर आंख मूंदकर चलते रहो’ – यह सोचने का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है। इससे तो जनता का राज कभी आने वाला नहीं है।

जनता का राज कैसे?

जनता का राज लाना है तो नीचे से ही स्वराज्य का विकास करना होगा। छोटे-छोटे समुदायों को भीतर से ही अधिक-से-अधिक अधिकार और शक्ति प्राप्त हो और कम-से-कम अधिकार ऊपरवालों के पास रहें। उतने ही, जिनते अनिवार्य हों। जीवन के मुख्य सवालों का हल इन छोटे समुदायों के बीच ही, उनके अपने ढंग से हो। जनता जैसे-जैसे अपना काम संभालती जायेगी, वैसे-वैसे जनता का राज आयेगा। लोकतांत्रिक दृष्टि से विचार करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि तंत्र जितना हल्का और सरल होगा उतनी ही लोकशाही सरल और सफल सिद्ध होगी-यदि तंत्र बोझिल और जटिल होगा तो लोकशाही भी उतने अंशों में निष्फल सिद्ध होगी।

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जहां केन्द्रित संचालन आया, वहां जनता का संचालन मर गया समझिये। जनता के द्वारा संचालन कराना हो तो वह विकेन्द्रित तरीके से ही संभव होगा और मैं ऐसा मानता हूं कि लोकशाही का बचाव भी इसी में है। यदि हमें आज के औपचारिक लोकतंत्र से संतोष न हो, यदि इस ‘पार्टिसिपेटिव डैमोक्रेसी’ – जिसमें खुद जनता भाग लेती है ऐसा लोकतंत्र चाहते हो तो गांधीजी के ग्रामराज की तरफ ध्यान देना ही पड़ेगा। हमारा लोकतंत्र बहुत संकुचित आधार पर टिका हुआ है। हमें लोकतंत्र की नयी बुनियाद, नयी आधारशिला रखनी होगी।

प्रक्रिया के संकेत

उदाहरण के तौर पर विधानसभा के चुनाव के लिए एक निर्वाचन क्षेत्र है। उसमें 100 गांव हैं, उनका लोकशिक्षण करना होगा, लोगों को समझाना पडे़गा कि चुनाव में आप स्वयं अपना उम्मीदवार खड़ा करें, गांवों में कुछ सक्रियता आये, शक्ति आये, जागृति आये और मिल-जुलकर काम करने का कुछ अभ्यास हो, तो यह हो सकेगा।

इसकी पद्धति के बारे में थोड़ा-बहुत विचार किया जा सकता है। पहले तो हर एक गांव निर्वाचन-क्षेत्र की जनसंख्या के अनुसार अपने एक-दो या तीन-चार आदमी पसंद करेगा। यदि गांव छोटी-छोटी इकाइयों में, जिन्हें हम ग्रामसभा कह सकते हैं, विकेन्द्रित रूप से यह करे तो उचित होगा। यदि ग्रामसभा छोटी है तो वह एक आदमी को पसंद करेगी और यदि कोई बड़ा गांव होगा तो वह चार-पांच लोगों को पसंद करेगा। इस तरह 100 गांवों में से औसतन तीन के हिसाब से लगभग 300 लोगों को गांव वालों ने पसंद किया। ये लोग किसी दल के नहीं, बल्कि ग्रामसभाओं द्वारा पसंद किये गये प्रतिनिधि होंगे।

इन सभी प्रतिनिधियों का एक ‘ग्रामसभा-प्रतिनिधि मण्डल’ बनेगा। वे सब मिलकर अपने में से एक व्यक्ति को उस मतदान क्षेत्र के उम्मीदवार के रूप में पसंद करेंगे। पसंदगी की पद्धति भी उन्हें समझायेंगे। कहेंगे कि सर्व-सम्मति से किसी एक को ही पसंद करें और यदि संभव न हो तो ‘एलिमिनेशन’ की प्रक्रिया से पसंद करें। उदाहरण के तौर पर 4-5 उम्मीदवार खड़े हों, तो तीन-चार बार मतदान कराकर जिसे सबसे कम मत मिले उसे एक-के-बाद-एक निकालते जायें, अंत में जो एक रहे उसे ही उम्मीदवार के रूप में पसंद हुआ समझें।

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इस तरह जो उम्मीदवार खड़ा होगा वह वस्तुतः जनता का उम्मीदवार होगा। यदि ग्रामसभाएं जागृत होंगी तो स्पष्ट है कि मत उनके द्वारा खड़े किये गये उम्मीदवार को ही मिलेंगे और वही चुना जायेगा। इसमें दल का उम्मीदवार हो या जनता का, मात्र इतना ही भेद नहीं है, बल्कि मूल बात यह है कि आज तो जनता मिलकर, साथ बैठकर विचार ही नहीं करती। अगर समुदाय, कम्युनिटी सक्रिय होती है तो वह जहां तक संभव होगा, सर्वानुमति से काम करेगी।

दलमुक्त लोकतंत्र

इस तरह जो ग्रामसभाओं द्वारा खड़े किये गये उम्मीदवारों में से चुनकर आये होंगे, वे किसी दल के नहीं, बल्कि सीधे जनता के प्रतिनिधि बनकर आये होंगे। इन दलमुक्त सदस्यों द्वारा दलमुक्त लोकतंत्र की शुरूआत होगी। फिर वे सब मिलकर एक नेता चुनेंगे, जो योग्य व्यक्तियों का एक मंत्रिमण्डल बनायेगा। उसमें फिर एक सत्ताधारी पक्ष और दूसरा विरोधी पक्ष, ऐसा नहीं होगा। विधानसभा के सब सदस्य साथ मिलकर शासन चलायेंगे। प्रशासन-व्यवस्था भी अलग-अलग विभागों के अनुसार की जा सकती है। विधानसभा के सभी सदस्यों को अलग-अलग समितियों में बांट दिया जाये और हर एक समिति को एक-एक विभाग सौंपा जाये। इन समितियों के माध्यम से शासन चलेगा। तब फिर आज जैसी दलीय खींचतान नहीं होगी और न विधानसभा के सदस्य एक दूसरे पक्ष को नीचे गिराने की कोशिश में ही लगे रहेंगे। जनता का हित साधना है। जो भूलें होंगी उनको सुधारना है, यह दृष्टि होगी। इस तरह एक नयी प्रकार की लोकसत्ता का उदय होगा।

आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा कोई क्रांतिकारी कदम उठाया जाये, सारी दुनिया ऐसा चाहती है। आज की प्रातिनिधिक लोकतंत्र से किसी को संतोष नहीं। दुनिया भर के प्रगतिशील विचारक आज प्रत्यक्ष और सहभागी लोकशाही का समर्थन करते हैं। यह काम कोई पुरानी लीक पीटने का काम नहीं है, बल्कि दुनिया की जो सबसे आगे बहने वाली धारा है, उसके साथ-साथ यह विचार है। (सप्रेस)

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