लोक गायक कालूराम बामनिया : मालवा के कबीर

बाबा मायाराम

‘मालवा के कबीर’ के नाम से मशहूर लोक गायक कालूराम बामनिया को पदमश्री अवार्ड से सम्मानित करने की घोषणा गणतंत्र दिवस के मौके पर की गई है। देवास जिले के टोंकखुर्द के रहने वाले कालूराम पारंपरिक निर्गुण भक्ति के गायक हैं। वे कबीर, गोरखनाथ और मीरा के भजनों को अनूठे तरीके से प्रस्तुत करते हैं। लोकगायक मालवा से लेकर विदेशों तक कबीर का संदेश फैलाने में जुटे है।

मध्यप्रदेश के देवास जिले के खटामा गांव में कबीर भजन का कार्यक्रम है। मन मस्त हुआ फिर क्या बोले की टेर माइक पर गूंज रही है।  रंग-बिरंगे टेंट में मंच सजा है। तम्बूरे, हारमोनियम, वायलिन, तबला, ढोलक के साज-सामान के साथ दयाराम सरोलिया की टीम मगन हो कर गा रही है। श्रोता ताली बजा बजाकर झूम रहे हैं जिनमें युवा, महिलाएं और वृद्ध सभी शामिल हैं।

कालूराम जी से मैं कुछ महीने पहले भोपाल में कार्यक्रम में मिल चुका था। वहीं मैंने तय किया था कि मालवा में जाकर कबीर को नए तरह से मानने-गाने वालों से मिलकर समझने की कोशिश करूंगा। कबीर के बारे में बरसों से सुनते पढ़ते रहे हैं। लेकिन किताबों के कबीर और मालवा के गायकों के कबीर अलग हैं।

कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी, वाली कहावत कबीर के गीतों पर भी लागू होती है। कबीर को लोग जगह-जगह अपनी बोली वाणी में गा रहे हैं। उन्हें मालवा में यहां की मालवी में सुनने का अलग ही अहसास है। यहां केवल कबीर भजन गाने कार्यक्रम नहीं है, इसका उद्देश्य कबीर के भजनों के संदेश पर और उनके गीतों के अर्थ पर बात करने और उसे फैलाना भी है। लोक-भाषा में कबीर के विचार होने के कारण लोगों के बीच संवाद बनाना आसान होता है।

कबीर को इस मालवा अंचल में नए सिरे से देखने व सुनने से पहले यह जानना जरूरी है कि आज  कबीर का महत्व क्या है। कबीर 15 वीं शताब्दी के ऐसे कवि और संत हुए हैं जिन्होंने आर्थिक अभाव में रहते रहते धार्मिक कर्मकांड, जातिवाद पर करारा हमला किया। उन्होंने जुलाहे के रूप अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करते करते ही अपने परिवार की जरूरत पूरी की और सामाजिक बुराईयों और विषमताओं से जूझे। उन्होंने एक निडर और सामाजिक आलोचक की भूमिका को भक्ति और आध्यात्मिकता से जोड़ा। इन्हीं सबसे वे आज के समय भी प्रासंगिक हैं और पांच-छह शताब्दियों बाद भी लोक मानस में रचे-बसे हैं। और इसीलिए आज के माहौल में नए सिरे से समझने की जरूरत है। 

70 वर्षीय नारायण देल्म्या बताते हैं कि वे कबीर भजन के कार्यक्रम 90 के दशक से कर रहे हैं। गांव-गांव जाकर ऐसे मंडलियों व गायकों की पहचान करते हैं जो कबीर भजन गाते हैं या गाने की इच्छा रखते हैं। इनके कार्यक्रम करवाते हैं, सिखाते हैं और इस पूरी मुहिम से जोड़ने का काम करते हैं।

इन्होंने शुरूआत में 10 गांवों की कबीर मंडलियों के साथ काम किया। इस पूरे काम में एकलव्य संस्था ने सहयोग किया। कबीर मंडलियां कबीर के भजन गाने के साथ साथ, भजनों से जुड़े संदेशों पर बात करती थी। कबीर ने जो पाखंडवाद और जातिवाद पर करारा प्रहार किया है, उस पर बात होती थी।

इस काम के विस्तार को व्यवस्थित ढंग से और नियमित रूप से करने के लिए कबीर भजन विचार मंच समूह का गठन हुआ। इसमें गांव-गांव जाकर मंडलियों को जोड़ा और 1991 से हर माह की 2 तारीख को कबीर भजनों का कार्यक्रम करते हैं। यह सिलसिला अब तक चल रहा है। यह सब स्थानीय ग्रामीण और कुछ साथियों के सहयोग से हो रहा है।

कबीर भजन विचार मंच से जुड़े प्रमुख कालूराम बामनिया कहते हैं कि वे किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़े। पहले वे भी कबीर के भजन व सत्संग से जुड़े थे पर इनमें छुपा असली अर्थ उनको नहीं पता था। लेकिन धीरे धीरे इसके अर्थ जानने समझने लगे। कालूराम बामनिया की कहानी बचपन में ही शुरू हो गई थी। महज 9 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता, दादा और चाचा के साथ मंजीरा सीखना शुरू कर दिया था। 13 साल की उम्र में वे घर से भाग के राजस्थान चले गए। यहां उन्होंने गायन सीखा। इसके बाद करीब 1- 2 साल तक उन्होंने भ्रमणशील मिरासी गायक राम निवास राव के गीतों की एक विस्तृत सूची को समाहित किया। 

कालूराम अपने गायन को लेकर कहते हैं कि उनके लिए सिर्फ एक पेशा नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। उनका कहना है कि कबीर को गाने से बहुत शक्ति मिलती है।

उन्‍होंने महिलाओं की कबीर मंडलियां बनाईं और उन्हें सिखाया लेकिन इसमें आंशिक सफलता मिली। फिर भी लीलाबाई जैसी कुछ महिलाएं आज मंच पर कबीर भजन गाती हैं। कबीर भजन विचार मंच ने कबीर के निडरता के रूप को सामने रखा और आज की बुराईयों- मद्यपान, मांस मदिरा, बराबरी का व्यवहार के खिलाफ कबीर के संदेश को फैलाया। और कुछ हद तक इसमें सफल भी हुए। वे कहते हैं कि उनका  खुद का जीवन भी बदला।

इसी प्रकार कबीर भजन गायक लीलाबाई ने बताया कि उन्हें नारायण जी और कालूराम भाई ने कबीर भजन गाना सिखाया। पहले परिवार के लोगों ने विरोध किया पर अब सब ठीक हो गया।

कबीर को मालवा में फिर से लोकप्रिय बनाने की इस मुहिम में एकलव्य के रामनारायण स्याग की प्रमुख भूमिका है। स्याग भाई ने बताया कि जब हम 1990 में साक्षरता वर्ष के दौरान शिक्षा कैसे बढ़ाएं, यह सोच रहे थे, तब हम कई गांवों में गए। हमने वहां देखा कि गांवों में तो पहले से ही ऐसी मंडलियां हैं, जो कबीर भजन गाती हैं, क्यों न उन्हें इस काम में जोड़ा जाए।

2 जुलाई 1991 को हम कुछ साथियों ने तय किया कि हम हर माह की 2 तारीख को मिलेंगे और कबीर भजन मंडलियों के भजन सुनेंगे। साथ ही उन भजनों में जो कबीर का संदेश है, उस पर बात करेंगे। प्रहलाद सिंह टिपानिया, नारायण देल्म्या इस पूरे काम में शुरूआत से ही जुड़े हैं। दरअसल, सोच यह थी कि ऐसा मंच बने जहां लोग आएं, भजन गाएं, आराम से बैठकर बराबरी से बात करें और जहां किसी प्रकार का भेदभाव न हो।

स्याग भाई के मुताबिक उस समय दो धाराएं निकलकर सामने आईं- एक, आध्यात्मिक धारा, जो मानती थी कि कबीर भगवान हैं और उनका मार्ग हमें ईश्वर से मिला सकता है। दूसरी, कबीर ने निडरता से सामाजिक बदलाव का काम किया। धर्म के पाखंड, कर्मकांड व जातिवाद पर सवाल किए। दुनिया को कैसे बेहतर बनाएं, ऐसा प्रयास किया। हमने दूसरी धारा को बढ़ावा दिया। इसमें लोग जुड़ते चले गए। और आज भी यह प्रयास जारी है।

मालवा में कबीर पंथ के अनुयायी काफी बड़ी संख्या में हैं जिनमें दलित भी हैं। कबीर ने इंसानियत का संदेश दिया है, जिससे स्वत ही लोग जुड़ाव महसूस करते हैं। कबीर ने लोकभाषा में दैनिक जीवन के अनुभवों को अपने गीतों, दोहों व दर्शन में स्थान दिया है। इसलिए कबीर को मानने वालों में परंपराओं के व्यवहार में हैं, जो मालवा में भी है। लेकिन कबीर भजनों के साथ बातचीत, चाय पीना, दोस्ती बढ़ाना और अपने दुख-दर्दों को आपस में बांटना और कबीर के भजनों में इसके समाधान ढूंढ़ना यह पूरी मुहिम में नया आयाम जोड़ता है।

इस मुहिम का असर यह हुआ कि कबीर के विचारों पर लोगों का ध्यान गया। कई नए गायकों ने कबीर को गाना शुरू किया, इसकी सूची लंबी है। प्रहलाद सिंह टिपानिया, कालूराम बामनिया, दयाराम सरोलिया, तारासिंह डोडबे, भैरोसिंह चौहान, मानसिंह भोंदिया, लीलाबाई जैसे कई कबीर गायकों ने मालवा ही नहीं देश-विदेश में कबीर के नए  रूप में लोक-भाषा में प्रस्तुत किया। इन सबकी सीडी, कैसेट बाजार में आए। इनके कार्यक्रम रेडियो, टेलिविजन व टीवी चैनलों पर आने लगे। विदेश में कबीर पर शोधकार्य करने वाली लिंडा हैस ने कबीर के कार्यक्रम अमरीका में करवाए। फिल्म निर्माता शबनम विरमानी ने फिल्म बनाई और कबीर भजन सीखे और खुद गाकर इसका संदेश फैलाय़ा। मालवा की लोकभाषा में कबीर गांव से लेकर विदेशों तक पहुंचे।

कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कबीर विचार की इस यात्रा से जनता में कुछ हद तक पाखंड व कर्मकांड पर रोक लगी, जनता में जागरूकता बढ़ी,  कुछ महिलाएं भी कबीर गायन से जुड़ीं, युवाओं का कबीर की तरफ रूझान बढ़ा, कबीर को इकतारा की जगह वायलिन, हारमोनियम के साथ गाया जाने लगा, गायक लोकप्रिय हुए और मालवा से लेकर विदेशों तक कबीर का संदेश फैला। सीमित संसाधनों के कारण इस कार्यक्रम को लगातार करने की चुनौती भी सामने रहती है पर फिर भी कबीर आज भी गाया जा रहा है, लोग उससे अपने आप को जोड़ पा रहे हैं।

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