स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए विनिवेश नहीं, बल्कि प्रभावी सार्वजनिक निवेश आवश्यक – प्रो. डॉ. रमा बारु

जन स्वास्थ्य सम्मान 2024 से डॉ. घनश्याम दास वर्मा और कैलाश मीणा सम्‍मानित

भोपाल, 6 मार्च। ग्यारहवीं डॉ. अजय खरे स्मृति व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर (डॉ.) रमा वी. बारु ने स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा शिक्षा में हो रहे विनिवेश पर गहरी चिंता व्यक्त की। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. बारु ने कहा, वैश्विक परामर्श समूहों की सिफारिशों के आधार पर नीति आयोग ने 2022 में जिला अस्पतालों को निजी मेडिकल कॉलेजों को सौंपने के दिशानिर्देश दिये है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की आधारभूत संरचना प्रभावित होगी।”

डॉ. बारु गुरूवार को “सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल और चिकित्सा शिक्षा में विनिवेश: नीतियां और चुनौतियां” विषय पर व्‍याख्‍यान दे रही थी। कार्यक्रम का आयोजन जनस्‍वास्‍थ्‍य अभियान,मध्‍यप्रदेश एवं म.प्र. मेडिकल आफिसर्स एसोसिएशन के संयुक्‍त तत्‍वावधान में किया गया।

प्रोफेसर (डॉ.) रमा वी. बारु ने आगे कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत स्वास्थ्य सेवाओं के व्यावसायीकरण से स्वास्थ्य सुविधाएं आम जनता की पहुंच से बाहर हो सकती हैं। जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) को निजी मेडिकल कॉलेजों के साथ साझेदारी के लिए सौंपने का यह प्रस्ताव, एक प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की मूलभूत रेफरल व्यवस्था को तोड़ने का कार्य करेगा,” उन्होंने आगाह किया।

उन्‍होंने कहा कि 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद से देश ने प्रभावशाली आर्थिक प्रगति दर्ज की है, लेकिन स्वास्थ्य स्थिति में सुधार की गति धीमी और असमान रही है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और समग्र स्वास्थ्य स्थिति में बड़ी असमानताएँ बनी हुई हैं, जो राज्यों के बीच, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच, और समुदायों के भीतर और भी गहरी हो गई हैं।

See also  World Health Day 7 April : अधूरी स्वास्थ्य सेवाएं, अधूरे सपने

उन्‍होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं, चिकित्सा तकनीक और दवाओं की आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त नियामक ढांचे की आवश्यकता है। इससे उपचार की लागत को नियंत्रित करने, गुणवत्ता में सुधार करने और सेवा प्रदाताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। सेवा प्रदाताओं के व्यवहार को अधिक उत्तरदायी बनाने के लिए नागरिक समुदायों और उनके प्रतिनिधियों को निगरानी में शामिल करने के नए और नवाचारपूर्ण तरीके अपनाने होंगे।

उल्‍लेखनीय है कि प्रो. रमा वी. बारू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सामाजिक चिकित्सा और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं। उनके शोध क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का व्यावसायीकरण, संक्रामक रोग, तुलनात्मक स्वास्थ्य प्रणाली, और स्वास्थ्य असमानताएं शामिल हैं। उन्होंने भारत सरकार, विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की शोध समितियों के सदस्य के रूप में काम किया है। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व अतिरिक्त सचिव एवं अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रोफेसर डॉ. मनोहर अगनानी ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में उत्पन्न शून्य को भरने का प्रयास निजी क्षेत्र ने किया, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा इस पहलू की अनदेखी करती रही। हालाँकि, कुछ प्रयास जरूर किए गए और समस्याओं की पहचान भी हुई।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमें “क्या किया जा सकता है” इस सिद्धांत पर कार्य करने की आवश्यकता है। सबसे पहले, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सशक्त बनाना होगा, क्योंकि अभी तक इन पर निजी क्षेत्र का दखल नहीं हुआ है। इन्हें इतना मजबूत किया जाना चाहिए कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की सार्थकता को सफलतापूर्वक साबित किया जा सके। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. राकेश मालवीय भी उपस्थित रहे।

See also  ‘सभी के लिए स्वास्थ्य’ की माँग के साथ जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया की राष्ट्रव्यापी पहल

सम्मान समारोह में विशिष्ट व्यक्तित्वों का सम्मान

कार्यक्रम में वर्ष 2024 का जन स्वास्थ्य सम्मान  डॉ. घनश्याम दास वर्मा और कैलाश मीणा को प्रदान किया गया। देानों कर्मठ स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ताओं को जन स्वास्थ्य सम्‍मान में प्रशस्ति पत्र, स्‍मृति चिन्‍ह एवं शॉल भेंट किये गए।

डॉ. घनश्याम दास वर्मा ने झाबुआ में आदिवासी समुदायों के साथ स्वास्थ्य जागरूकता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के साथ ही आरसीएच कार्यक्रम का दस वर्षों तक सफल संचालन किया। पिछले दो दशकों से वे मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में सिलिकोसिस जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं पर कार्यरत हैं।

कैलाश मीणा पिछले तीन दशकों से राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। वे हाशिए पर खड़े समुदायों और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

इसके पूर्व कार्यक्रम के दौरान डॉ. अनंत भान ने जन स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍मान के चयन प्रक्रिया और दोनों विभूतियों के स्‍वास्‍थ्‍य एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किये गए विशिष्‍ट कार्यों से परिचित कराया गया।  मुख्य वक्ताओं का स्वागत जन स्वास्थ्य अभियान की आरती पांडेय, राकेश चंदौरे, सुभाष शर्मा  ने किया। वक्‍ता का परिचय अमूल्य निधि, धीरेन्द्र आर्य ने दिया। डॉ शशि खरे का स्वागत म प्र विज्ञान सभा के आशीष पारे ने किया।

कार्यक्रम का प्रभावी संचालन एस. आर. आज़ाद ने किया तथा आभार मध्यप्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के डॉ. माधव हसानी ने व्यक्त किया।

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »