विकास : आँकड़े बदले हैं, गरीबी नहीं

अरविन्द मोहन

आज फिर चुनावी राजनीति में गरीब और खास तौर से गरीबों की संख्या मुद्दा बनती जा रही है और संभव है काफी सारे मुद्दे हवा में उछालकर टेस्ट कर चुकी मोदी सरकार को अपनी यह ‘उपलब्धि’ चुनाव जिताने लायक लगे। अपनी हाल की अमेरिका यात्रा में वहां की संसद के दोनों सदनों की साझा बैठक को संबोधित करते समय उन्होंने जब देश से गरीबी घटाने की बात की तो सबसे जोरदार तालियां बजी थीं।

इंदिरा गांधी को दोष दिया जाता है कि उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे का राजनैतिक इस्तेमाल कर लिया और गरीबी जस की तस बनी रही। जाहिर है तब भी, अर्थात सत्तर के दशक के शुरुआत में गरीबी हमें चुभने लगी थी और इसे राजनीतिक इस्तेमाल करने की स्थिति आ गई थी। बल्कि साठ के दशक के अंत में महंगाई बड़ा मुद्दा बनी थी और कांग्रेस 1967 का चुनाव मुश्किल से जीत पाई थी। इंदिरा गांधी ने अपनी समझ से समाजवाद लाने की दिशा में प्रीवी पर्स की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे की कदम उठाए थे जिसके बाद ही उनको इस नारे की सूझी होगी और लोगों ने भी उसी आधार पर इसे भी एक बड़ा प्रयास मानते हुए इंदिरा गांधी को वोट दिया।

आज फिर चुनावी राजनीति में गरीब और खास तौर से गरीबों की संख्या मुद्दा बनती जा रही है और संभव है काफी सारे मुद्दे हवा में उछालकर टेस्ट कर चुकी मोदी सरकार को अपनी यह ‘उपलब्धि’ चुनाव जिताने लायक लगे। अपनी हाल की अमेरिका यात्रा में वहां की संसद के दोनों सदनों की साझा बैठक को संबोधित करते समय उन्होंने जब देश से गरीबी घटाने की बात की तो सबसे जोरदार तालियां बजी थीं। प्रधानमंत्री जो आँकड़े दे रहे थे वे ऐसे जोरदार थे भी।

मोदी जी ने कहा कि देश में गरीबों की संख्या में लगभग 42 करोड़ की कमी हो चुकी है। जाहिर तौर पर वे इसे अपनी सरकार की नौ साल की उपलब्धि बताते रहे। और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वे मजे लेकर यह भी बताते रहे कि यह संख्या यूरोप के किसी भी देश की आबादी से काफी अधिक ही नहीं अमेरिका की आबादी से भी अधिक है। किसी देश का प्रधानमंत्री, और वह भी जिसे संसद के संयुक्त सत्र में भाषण देने के लिए बुलाया जाए, अगर ऐसी उपलब्धि बताता है तो उत्साह दिखाना या तालियां बजाना तो बहुत छोटी बात है। कायदे से इसे बहुत बड़ी उपलब्धि मानना चाहिए और यह बात इतिहास में दर्ज होने लायक है।

See also  विकास की ‘बकासुरी’ नीतियों से निपटता किसान

पर जल्दी ही यह बात खुल गई कि प्रधानमंत्री जिस आँकड़े का जिक्र कर रहे थे वह यूएनडीपी की एक खास शैली की गणना पर आधारित है (और यह प्रति व्यक्ति आय या खर्च वाली पारंपरिक गणना नहीं है) और ये आँकड़े असल में 2005-06 से 2019-20 के हैं। इसका मतलब हुआ कि ज्यादातर हिसाब मनमोहन सरकार के दौर का है और इस सरकार के कामकाज के पहले पाँच साल ही हिसाब में आए हैं। दूसरी गड़बड़ बाद में कई अर्थशास्त्रियों ने बताई कि हाल के वर्षों में आंकड़ों का जमा होना और उनका हिसाब ही गड़बड़ा गया है, इसलिए इस पूरे आँकड़े को बहुत विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

रायटर्स ने बाद में भारत सरकार के आंकड़ों के आधार पर ही बताया कि मार्च 2021 के पहले के पाँच वर्षों में भारत में 13.5 करोड़ लोग गरीबी से मुक्त हो गए। यह आंकड़ा यूनाइटेड नेशंस मल्टीडाईमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के आधार पर तैयार हुआ है जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छ ईंधन जैसे बारह मानकों का हिसाब रखा जाता है। इसमें प्रति व्यक्ति खर्च का आधार भी हल्का ऊंचा है। अब जब सामान्य आँकड़े नहीं जुटाए जा रहे हैं तो बारह तरह के आँकड़े कैसे आए यह सवाल अपनी जगह है। पर बयालीस करोड़ और साढ़े तेरह करोड़ का फरक तो कोई भी बताया सकता है।

लेकिन अगर हम इसमें करोना काल और अभी हाल तक सरकार द्वारा गरीबों को मुफ़्त राशन उपलब्ध कराने वाले आंकड़ों को सामने रख दें तो आँकड़े क्या हमारी बुद्धि भी काम करना बंद कर देगी क्योंकि सरकार 80 करोड़ गरीबों को राशन खिलाने के दावे करती रही है। बहुत सारे राजनैतिक पंडित इससे पैदा लाभार्थियों का वोट मोदी जी के लिए सबसे बड़ी ताकत मानते रहे हैं। वैसे साढ़े तेरह करोड़ का आंकड़ा भी कम नहीं है क्योंकि यह देश की आबादी का दस फीसदी हुआ।

See also  कैसे मापें, गरीब और गरीबी की गहराई

पर असली चमत्कार प्रो. सुरजीत भल्ला, करण भसीन और विरमानी द्वारा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के लिए किए अध्ययन में हुआ जिसमें दावा किया गया कि अब देश में मात्र 1.2 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे रह गए हैं, जो भाजपा सरकार की नीतियों से संभव हुआ है। गरीबों की संख्या एक फीसदी के नीचे आ जाना सचमुच एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। प्रो. भल्ला इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने जाने क्या – क्या आधार अपनाकर यह दावा भी कर दिया कि गरीबी मनमोहन राज में भी घटी लेकिन भाजपा राज में इसमें भारी तेजी आ गई है। पर समय न लगा कि ज्यां ड्रेज और अरुण कुमार जैसे अर्थशास्त्रियों ने इस सारे हिसाब की भयावह गड़बड़ियों को उजागर किया। तब तो यह सवाल भी उठे कि आर्थिक गणनाओं में ऐसी चूक या फरेब करने वालों से आईएमएफ ऐसे अध्ययन क्यों कराता है।

भल्ला ऐंड कंपनी ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने 2011-12 का जो आधार बनाया वह असल में 2005-06 की एक अलग शृंखला (जिसका आधार भी अलग था) थी। ऐसा ही एक गड़बड़ अमेरिका के नामी अर्थशास्त्री नोह स्मिथ ने किया जो लगातार ब्लाग के जरिए अपना अनुमान देते थे। उन्होंने लिखा कि 2016 में भारत में 12.4 करोड़ गरीब थे, जो 2022 में 1.5 करोड़ रह गए। पर जल्दी ही उनको जब चौतरफा मार पड़ी तो उन्होंने सुधार किया कि और बताया कि 1993 में भारत में गरीबी रेखा के नीचे अगर 47.6 फीसदी लोग रहते थे तो अब यह अनुपात 10 फीसदी हो गया है।

See also  प्रजातंत्र की शासन-प्रणाली

आर्थिक गणना, उसके आधार, उसके पैमाने और नतीजों के पीछे का नजरिया अपनी जगह है और इसमें गरीबी काम होने के आंकड़ों में हल्का अंतर आ सकता है। पर जैसा ऊपर बताया गया है भारत में गरीबी का अध्ययन कुछ खास किस्म के चश्मों से ही नहीं होता। इसके पीछे कुछ खास नीतियों और बड़े आर्थिक फैसले कराने का दबाव भी होता है। मोटा-मोटा अनुमान यह है कि अगर अगले 25 वर्षों तक भारत साढ़े सात फीसदी के विकास दर से चल पाने में सफल रहा तभी यहां से गरीबी खत्म होगी। प्रो. भल्ला और नोह स्मिथ जैसों की मंशा सिर्फ चूक नहीं है।

जाहिर है हमारे प्रधानमंत्री कहीं ऐसे आंकड़ों का हल्का लाभ ले सकते हैं, चुनाव में उसे गरीबी हटाओ जैसा नारा नहीं बना सकते। उन्होंने अगर करोना काल में अस्सी करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन देने का फैसला किया है तो यह देखकर ही कि किस तरह तालाबंदी घोषित होते ही करोड़ों प्रवासी घर की तरफ भागे क्योंकि कमाने की जगह पर होने के बावजूद वे हफ्ते भर का राशन जमा करने की स्थिति में नहीं थे। और जिस जगह की आर्थिक स्थितियां उनको पलायन के लिए मजबूर करती हैं उसे भी मोदी जी अच्छी तरह जानते हैं।  

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »