बागियों को साधुता सिखाने वाले भाईजी एस. एन सुब्‍बराव

कौशल किशोर

नब्बे की अवस्था में भी तरुणाई का ख़्वाब देखने वाले लोगों को भाईजी से प्रेरणा लेने की जरूरत है। उनके गीतों पर झूमने वाले लोगों में जय जगत का नारा प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने शांति मंत्रालय का सपना भी देखा, जो हिंसा और हथियारों की होड़ से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करे। उनका जाना एक युग का अंत ही है। आजादी की लड़ाई में शामिल रही पीढ़ी के वे आखिरी स्तंभ थे। स्वतंत्र भारत में राष्ट्र निर्माण कार्य में अहम भूमिका निभाने वाले ‘भाईजी’ के नाम से देश में मशहूर सलेम नानजुंदैया सुब्बाराव को आज याद करने की जरूरत है।

प्रथम पुण्‍य स्‍मरण

तेरह साल की बाल्यावस्था में भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन में स्कूल का बहिष्कार करने पर उनका देशप्रेम उजागर होता है। फिर ‘क्विट इंडिया’ का नारा बुलंद करने के कारण एक दिन पुलिस की कैद में भी रहना पड़ा। आखिरकार वकील साहब के पुत्र को चेतावनी देकर छोड़ना ही मुनासिब माना गया। इस लंबे और रोमांचक सफर का आखिरी समय जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में पूरा होता है। उनके तान पर झूमकर जवान हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बराबर उनको देखने वहां पहुंचते रहे। इस गांधीवादी नेता का यह सपना पूरा करने के लिए उन्होंने महात्मा गांधी के 150वें साल में कला व संस्कृति मंत्रालय में शांति के लिए नया विभाग शुरु कर इस दिशा में पहल किया है। आतंकवाद और हिंसा की आग में जल रही दुनिया को यदि इससे भविष्य में राहत मिले तो भला होगा, अन्यथा यह भी जुमलेबाजी के इस दौर की एक निरर्थक इबारत होगी। 

भाईजी गांधीवादी रचनात्मक कार्य क्षेत्र में देवानंद साबित हुए। काश! उनकी तरुणाई से ईर्ष्या करना मुमकिन होता। अस्सी और नब्बे की अवस्था में भी किसी नवयुवक के ऊर्जा से लबरेज आजीवन तरुण रहने वाले ऋषियों में अग्रणी हैं। इक्कीसवीं शताब्दी के इक्कीस सालों का इतिहास भी इसकी गवाही देगा। पहली ही मुलाकात में सगे बड़े भाईयों जैसा अपनापन महसूस कराने में सक्षम भाईजी इसे उसी गरमी से ताउम्र निबाहने के लिए याद किए जाएंगे। उनके सम्पूर्ण जीवन वृत्त के अवलोकन से समझ होगी कि उचित अवस्था में ग्रीक दार्शनिक ऐपीक्यूरस की बातों से वाकिफ हो गए थे। आज से करीब 2300 साल पहले उन्होंने मुकद्दर का सिकंदर की परिभाषा कहते हुए युवावस्था को भाग्यशाली नहीं मान कर,‌भली-भांति बीतने वाली वृद्धावस्था को बेहतर स्थिति का प्रतीक बताया था। ऐपीक्यूरस ने नित्शे व मार्क्स जैसे विद्वानों को भी कम प्रभावित नहीं किया।

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चंबल रहस्य उनके ही जीवन का प्रसंग है। इसे जाने बगैर उनसे परिचय भी मुमकिन नहीं है। बीहड़ के 654 दुर्दांत डकैतों को मूलधारा में शामिल करना चुनौतियों भरा व्यापार है। कम से कम चौदह साल चलने वाला यह सिलसिला 1960 में शुरु हुआ। इसी जगह ग्रीक दार्शनिक की गांठ बांधने वाली बातें खुलती हैं। तरुणाई और बुढ़ापा के दो भिन्न समझ-बूझ का यह तुलनात्मक अध्ययन दिलचस्प है। यह समझ उनकी चेतना में बहुत पहले ही कहीं गहरी उतर गई थी। चंबल का पानी पीकर बीहड़ के डाकुओं को साधुता का पाठ पढ़ाने वाले महर्षि की वाकसिद्धि बेमिसाल है। आज देश में नक्सवाद, आतंकवाद और पश्चिमी छोर पर तालिबान का संकट उनके कार्यों की प्रासंगिकता बढ़ा देते हैं।

भाईजी जहां कहीं जाते वहीं की जबान बोल कर स्थानीयता के सबसे बड़े वकील साबित होते। जवान ही नहीं, बल्कि बच्चों के बीच भी सहजता से घुल-मिल जाना उनकी विशेषता थी। बोलियों व भाषाओं के प्रति उनका आग्रह और गीत संगीत में गहरी रुचि उनके व्यक्तित्व की बुनावट के बेहद अहम अवयव हैं। मैसूर रियासत के बंगलुरु नगर में जन्मे सुब्बाराव बचपन से ही गायन में रुचि रखते थे। गीत संगीत का दायरा यदि आपकी नज़रों में फिल्मी गीतों तक सीमित नहीं है तो उनका गीत रुचिकर लगेगा। 

उनकी हर तैयारी कमाल की होती थी। यह उनकी रेल यात्राओं पर गौर करने से भी स्पष्ट होता है। लंबी दूरी की यात्राओं में भोजन सामग्री नहीं ले जाते, रेल का खाना भी नहीं खाते, पर कभी भूखे भी नहीं रहे। देश भर में मौजूद उनको प्यार करने वाले लोग ठीक समय पर स्टेशन पहुंचते। उनके लिए भोजन पहुंचाने वास्ते। सूचना क्रांति के आधुनिक युग से पहले भी उनका यही अंदाज था। सीमित आवश्यकता उन्हें उच्च कोटि का तपस्वी बनाती है।

गांधी साहित्य सभा से जुड़ कर उन्होंने शिक्षा का प्रसार आरंभ किया था। स्टूडेंट कांग्रेस और राष्ट्र युवा दल में शामिल हुए। इसी क्रम में कैंपिंग का मौका मिला और 1948 में कांग्रेस सेवा दल के प्रमुख डॉ एन.एस. हार्डिकर से भेंट हुई। नवयुवकों के बीच उनकी लोकप्रियता से विस्मित डॉ. हार्डिकर ने एक साल के लिए शामिल होने का आग्रह किया। नतीजतन वकालत की पढ़ाई पूरी कर 1951 में कांग्रेस सेवा दल में शामिल हुए। हालांकि यह सिलसिला एक साल नहीं, बल्कि उन्नीस सालों तक चलता रहा। उन्होंने इस बीच जिस धज को धारण किया उसे आजीवन अपनाया। तेरह साल के बाद 1964 में उन्होंने चंबल घाटी के जौरा में दस महीनों का शिविर आयोजित किया। इसी साल तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज की सभा में एक दिन उन्होंने अनुवादक का काम किया फिर यह सिलसिला 1967 तक चलता है। इसी बीच 1965 में चार साल चलने वाला गांधी शताब्दी समारोह शुरु हुआ। इसके अंतिम सालों में गांधी दर्शन ट्रेन चला था। इसके डायरेक्टर की जिम्मेदारी भी उन्होंने बखूबी संभाली। उनके रचनात्मक कार्यों की सूची लंबी है। बीते सात दशकों में उनके प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेने वालों की संख्या भी कम नहीं है।

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चंबल के डकैतों को मुख्यधारा से जोड़ने का मामला पचास के दशक के पूर्वार्द्ध में शुरु हुआ।‌ तब उन्होंने पहली बार इस क्षेत्र का दौरा किया‌ था। प्रवास के दौरान पहली ही रात शुरु हुई डकैतो से भेंट की दास्तान सुनाते थे। संवाद की श्रृंखला और चंबल घाटी के प्रति लगाव बढ़ता गया। इस क्षेत्र में उनके क्रियाकलापों पर नजर डालने से यह स्पष्ट होता है। उनके लगातार प्रयासों का नतीजा था कि बीस डकैतों ने 1960 में विनोबा भावे के सामने समर्पण किया। एक दशक की तैयारियों का जायजा लेने हेतु 1964 में देशव्यापी सहभागिता वाली कैंपिंग आयोजित किया। गांधी दर्शन ट्रेन के डायरेक्टर का काम कर अर्जित धन से जौरा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम 1970 में स्थापित किया। इसके बाद उनकी सेवा का दायरा कांग्रेस पार्टी की परिधि से बाहर निकल कर व्यापक हो गया। गांधी शांति प्रतिष्ठान के आजीवन सदस्य हुए और अंत तक इसकी सेवा करते रहे।

जय प्रकाश नारायण और प्रभावती देवी के सामने 1972 में सैकड़ों की संख्या में बागियों ने हथियार डाल दिए। इस समर्पण की तीसरी किस्त 1974 में पूरा हुआ। इस क्रम में सुब्बाराव के कुल बीस साल का मेहनत है। पी.वी. राजगोपाल, रणसिंह परमार और संजय राय जैसे सहयोगी इस आश्रम से जुड़े हैं, जो डाकुओं के उपद्रव से जुड़ी बातें साझा करते हैं। आतंकवाद और नक्सलवाद का सामना करने वाले मुल्क में सुब्बाराव जैसे समाज सुधारक की जरूरत बनी रहेगी।

भारत छोड़ो आंदोलन शुरु होते ही अंग्रेजों ने कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया था। ऐसी दशा में स्वतंत्रता संग्राम को बुलंद करने के लिए आम लोग सामने आते हैं। उनके जीवन की यह एक आकस्मिक घटना थी। इसी वजह से वे स्वयं को एक्सिडेंटल सत्याग्रही कह ते हैं। उनके शिविरों में विविधता में एकता का सूत्र साधने हजारों की संख्या में लोग जाते रहे। उनके जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं के अभाव में इसी बीच कांग्रेस का सेवा दल कागजी खानापूर्ति में सिमटता गया। पर इसका मतलब यह नहीं है, आज देशहित में शिविरों का आयोजन ठप हो गया हो। राष्ट्रहित के लिए शिविरों का आयोजन करने वाले समूहों को उनसे सीखने की जरूरत है। प्रायः सभी भारतवासियों से उनकी बोलियों में संवाद करने वाले इस अतुलनीय महानायक का राष्ट्र निर्माण में योगदान भी शोध का विषय है। भविष्य के लोक सेवकों को तैयार करने में इससे मदद मिलेगी। 

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महात्मा गांधी, ईशा मसीह और गौतम बुद्ध की परंपरा के इस महानायक से दिल्ली के जलसों में मेरी भी भेंट हुई। यह सिलसिला पिछले कुछ सालों से चल रहा था। मित्रों ने भी इसे अर्थपूर्ण बनाने में बराबार योगदान दिया है। भाईजी लोकहित के लिए निजी स्वार्थों का त्याग करने की वकालत करते थे। उन्होंने देश भर की जनता की सेवा के उद्देश्य से दलीय राजनीति की सीमाओं का अतिक्रमण किया। जयपुर में इंतकाल के बाद उनका पार्थिव शरीर जौरा स्थित गांधी आश्रम लाया गया। यहीं उनकी समाधि है। नरेंद्र सिंह तोमर और अशोक गहलोत जैसै राजनेताओं ने उनकी अंत्येष्टि में पहुंच कर उदारता का खूब परिचय दिया। इसे कायम रख कर ही शांति की पुनर्स्थापना और गौ संरक्षण जैसै लक्ष्यों को साधना मुमकिन हो सकता है।

गांधीजी गौसेवा का भाव विकसित करने की पैरवी मौलिक शिक्षा कार्यक्रम में करते हैं। आज इसे गौरक्षा अभियान के तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस लक्ष्य को साधना कृषि की भदेस संस्कृतियों के बूते ही संभव है। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए वैमनस्य को भूल कर कोशिश करना चाहिए। राजनीतिक दल यदि लोक हित के लिए सहभागिता सुनिश्चित करने के बदले उलझनें पैदा करें तो भाईजी जैसे गांधी की भावनाएं आहत होंगी। ऐसा करना देशहित में भी कतई नहीं है। रचनात्मक कार्यों में सफलता के लिए हितों के टकराव को तिलांजलि देना चाहिए। यही भाईजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।(सप्रेस)

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