18 अप्रैल: भूदान आंदोलन के माध्यम से संत विनोबा की अहिंसक क्रांति

डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे

जब दुनिया ने बदलाव के लिए हिंसा का शोर चुना, तब विनोबा भावे ने मौन पदचाप से क्रांति की इबारत लिखी। 18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली से शुरू हुआ भूदान आंदोलन इस विश्वास का प्रतीक बन गया कि सच्चा परिवर्तन तलवार से नहीं, सेवा, त्याग और करुणा से आता है। एक संत की पदयात्रा ने लाखों भूमिहीनों को जमीन दी, और देश को न्याय, स्वावलंबन और सहअस्तित्व की दिशा दिखाई। आज भी ग्रामदान का विचार आत्मनिर्भर भारत की नींव बन सकता है।

डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे

18 अप्रैल : भूदान क्रांति दिवस

भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि संत विनोबा ने 18 अप्रैल 1951 में भूदान आंदोलन की शुरुआत की थी। आज ही के दिन संत विनोबा भावे को तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में रामचन्द्र रेड्डी ने 100 एकड़ भूमि दान में दी थी। विनोबा ने देश में लगातार 13 साल पदयात्रा कर 46,00000 एकड़ भूमि दान में प्राप्त की। इसमें से 32,00000 एकड़ भूमि बेजमीनों में बांट दी गयी। भूदान में से ही ग्रामदान और जिलादान का विचार निकला। मांगरोठ पहला ग्रामदानी गांव है। भूदान और ग्रामदान आंदोलन के मद्देनजर प्रदेश सरकारों ने भूदान और ग्रामदान एक्ट बनाया। दिल्ली और राजधानियों में अटकी आजादी को देश के पांच लाख गांवों तक पहुंचाने के लिए विनोबा ने महापराक्रम किया।

भूदान आंदोलन ने भारत में साम्यवाद के विस्तार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। भूदान और ग्रामदान ने महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिध्दांत को धरातल पर उतारा। आज यदि देश को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाना है तो देश के पांच लाख गावों को ग्रामदान विचार अपना लेना चाहिए। गांव सीधे दुनिया के देश से जुडना चाहिए। विज्ञान युग में बीच में राजधानियों और शहरों की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है।

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विनोबा ने भूदान और ग्रामदान विचार से क्रांति की अवधारणा को बदल कर रख दिया। आम जनजीवन में क्रांति का आशय तलवार, बंदूक, बम और हिंसा से समाज परिवर्तन है। विनोबा ने महात्मा गांधी के अहिंसक सत्याग्रह के लिए भूमि का छोर पकड़ा। भूदान आंदोलन के बीच विनोबा ने ब्रह्मचारी स्त्रियों के लिए वर्धा के नजदीक पवनार में ब्रह्मविद्या मंदिर की स्थापना की। यहां पर पिछले 60 वर्षों से मजदूरी के क्षेत्र में ब्रह्मविद्या का प्रयोग चल रहा है।

भूदान की पदयात्रा के दौरान विनोबा ने दुनिया के सभी धर्मों के धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर सर्वधर्म सार दिया। इनमें ऋग्वेद सार, भागवत धर्म सार, सम्मण सुत्तम, धम्म पद, सिक्ख धर्म सार, ख्रिस्त धर्म सार और कुरान सार प्रमुख हैं। गीता प्रवचन धूलिया जेल में कैदियों के बीच दिया। अपनी मां रुक्मिणी के कहने से भगवद्गीता का मराठी भाष्य गीताई के रूप में किया।

देश के गांवों की रीढ गौवंश को बचाने के लिए देवनार कत्लखाने के सामने अहिंसक, अराजनीतिक और असांप्रदायिक सत्याग्रह करने का आदेश दिया, जो 32 साल लगातार चला। इस सत्याग्रह की दो ही मांगें थी जो आज भी कायम हैं : देश में किसी भी उम्र के गौवंश का कत्ल केंद्रीय कानून से बंद हो और मांस निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाए। भूदान आंदोलन में से संपत्ति दान, सर्वोदय पात्र, मालकियत विसर्जन, शांतिसेना का विचार निष्पन्न हुआ। जयहिंद के स्थान पर जयजगत मंत्र निकला। भूदान में से ही आचार्यकुल विचार भी आया। देश को निष्पक्ष आचार्यों का मार्गदर्शन मिलना चाहिए। शिक्षा शासन के शिकंजे से मुक्त होना चाहिए। खादी कमीशन से मुक्त होने के लिए खादी मिशन की स्थापना की। स्वावलंबी खादी के लिए सरकार ने मुफ्त बुनाई योजना को स्वीकार किया। देश में भाषा की समस्या को हल करने के लिए देवनागरी लिपि अपनाने पर जोर दिया। चंबल क्षेत्र में विनोबा के समक्ष 11 बागियों ने अपनी बंदूकें समर्पित कीं।

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राजनीतिक विचारक, समाज सुधारक और बुध्दिजीवी नैतिक आधार पर अवलंबित सर्वोदय विचारधारा को यूटोपिया बताकर खारिज करते रहे हैं। इसके मूल में राजनीति से समाज परिवर्तन का विचार है। साम्यवादी विचार कार्ल मार्क्स ने लगभग 125 साल पहले कहा था कि औद्योगिकरण के परिणामस्वरूप भारत में छोटी जोत के किसानों को अपनी जमीन बचाना कठिन होता जाएगा।

विनोबा का ग्रामदान से ग्रामस्वराज विचार भारत की ग्रामीण सभ्यता के रक्षण में समर्थ है। महात्मा गांधी के सर्वोदय विचार को साकार करने के लिए संत विनोबा ने अपना पूरा जीवन समर्पित किया। राजनीतिक आजादी तो 1947 में हासिल हुई। देश को आर्थिक गुलामी से मुक्त करने के लिए ग्रामदान विचार अपनाना आवश्यक है।

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