चिंतन : भय से भयभीत समाज

लक्ष्मीदास

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए भय एक ऐसी बीमारी है जो सतत कमजोर करती है। लालच, प्रतिस्पर्धा, हायरार्की यानि श्रेणी-बद्धता आदि वजहों से भय फलता-फूलता है और नतीजे में एक-दूसरे से डरते हुए हम लगातार कमजोर होते जाते हैं। क्यों होती है,समाज में भय की ऐसी मौजूदगी?

भय हमारे जीवन की सबसे दुखद कमजोरी है! जो व्यक्ति भयभीत रहता है वह व्यक्ति कमजोर रहता है। जो परिवार भयभीत होता है वह परिवार कमजोर रहता है। जो राष्ट्र भयभीत रहता है, वह दुनिया में मस्तक ऊंचा करके नहीं चल सकता! डरपोक व्यक्ति डरता भी बहुत है और डराता भी बहुत है। वह अपने से कमजोर को डराता है और अपने से ताकतवर से डरता है।

गुरु नानक देव ने कहा है, “निर्भय निर्वैर” गुरु नानक देव को इस बात की अनुभूति थी कि निर्वैर व्यक्ति ही निर्भय हो सकता है। इसीलिए उन्होंने अपनी वाणी में निर्भयता को महत्व दिया। आचार्य विनोबा भावे ने जब लोकसेवकों के लिए शर्तें निर्धारित कीं तो लोकसेवक निर्भय, निर्वैर, निष्पक्ष होना चाहिए, ऐसी अपेक्षा रखी। गांधी जी ने अपने ‘एकादश व्रतों’ में “सर्वत्र भय वर्जन” का मंत्र दिया है। 

भय, व्यक्ति को सच नहीं बोलने देता। भयभीत व्यक्ति को हर समय यह भय बना रहता है कि यदि मैंने कोई बात कह दी तो मुझे दंड मिल सकता है। उसे हर समय लगता है कि मेरा भेद खुल गया तो मैं मारा जाऊंगा। भयभीत व्यक्ति, सदैव भयातंकित रहता है। उसके मन-मस्तिष्क पर भय का आतंक बना रहता है इसलिए वह कुछ भी कर नहीं पाता। कोई ठोस निर्णय भी ले नहीं पाता। ऐसा व्यक्ति जब भी कोई निर्णय लेता है या उसे निर्णय लेने की मजबूरी पैदा होती है तो वह अनिर्णय की स्थिति में पहुंच जाता है। उसका व्यक्तित्व शंकाओं से घिरा रहता है। एक डरा हुआ व्यक्ति समाज तथा घर-परिवार के लिए बोझ है।

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लोग रामायण का उदाहरण देकर समझाने की कोशिश करते हैं कि “भय बिन होय न प्रीत।” यह सही है कि यह वाक्य रामायण में है और रामायण हमारे लिए पवित्र ग्रंथ है, लेकिन रामायण के किस प्रसंग में इस वाक्य का इस्तेमाल हुआ है? यह समझना जरूरी है। उस वाक्य और शब्द का पूरा संदर्भ जाने बिना यदि मात्र शब्दार्थ पर जाएंगे तो कई उपद्रव हो सकते हैं। मसलन “भय बिन होए न प्रीत” का अर्थ तो यह भी होता है कि जो प्रीति भय के कारण होगी वह भय समाप्त होते ही समाप्त हो जाएगी। अर्थात् प्रीति बनाए रखने के लिए भय बनाए रखना होगा!

समय-विशेष या परिस्थिति-विशेष में इस्तेमाल हुआ कोई शब्द या वाक्य, परिस्थिति बदलने या समय बदलने पर अनुपयोगी लगने लगता है। बारिश, धूप में छाता बहुत आवश्यक लगता है, लेकिन सुहावने मौसम में भी यदि कोई छाते का इस्तेमाल करता है तो वह दूसरों के मजाक का पात्र बन जाता है।

डरपोक व्यक्ति कभी अहिंसक नहीं हो सकता। अहिंसा उसकी मजबूरी होती है। सामने वाला शक्तिशाली है तो वह अहिंसक है, सामने वाला कमजोर है तो वह हिंसक है। डर हमारा गहना नहीं, बल्कि दोष है। यहां यह भी समझना आवश्यक है कि डर और सम्मान में फर्क है। डरपोक होना दोष है। डर से नजरें झुकाना कमजोरी है, जबकि सम्मान से नजरें झुकाना नम्रता और महानता का प्रतीक है। यह स्वाभिमान है। स्वाभिमानी व्यक्ति कभी डरपोक नहीं हो सकता। उसे अपने स्वाभिमान पर सदैव गौरव होता है। स्वाभिमान के साथ यदि नम्रता जुड़ जाए तो व्यक्ति महान बन जाता है।

डरपोक व्यक्ति कभी विश्वसनीय नहीं हो सकता। वह अपनी विश्वसनीयता खो देता है, क्योंकि वह स्वयं को बचाने या सही प्रमाणित करने के लिए कभी भी कुछ भी बोलता है। अभी कुछ बोलता है थोड़ी देर में कुछ और बोल देता है! इससे उसकी प्रामाणिकता का भी हनन होता है। भय रुपी दोष पर कुछ भी लिखा जा सकता है। हम परिवार में रहते हैं। परिवार में नम्रता आवश्यक है, भय नहीं। हम अनुभव करके देखें तो जो डरपोक व्यक्ति है वह अपने पराए किसी भी व्यक्ति को कभी भी हानि पहुंचा सकता है। किसी को भी किसी भी समय में गर्त की ओर धकेल सकता है।

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भारत में जहां विकास की गति चाहिए, वहां इसके हर नागरिक को निर्भय भी होना चाहिए। कठिनाइयां बहुत हैं, दुख बहुत हैं, जरूरतें भी बहुत हैं। स्वार्थ, हमेशा छलांगें मारता रहता है। भययुक्त व्यक्ति स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ भी अनाप-शनाप करने को तैयार हो जाता है। भय युक्त व्यक्ति या भय युक्त कौम कभी भी मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती। इतिहास गवाह है कि भय से राष्ट्र की, समाज की सदैव हानि हुई है। जितने लोगों ने समाज, राष्ट्र को धोखा दिया है, यदि उनका विश्लेषण किया जाए तो हम पाएंगे कि उस हर धोखे के पीछे उसका भय मुख्य कारण है।

कभी हम अपना सुख नहीं छोड़ना चाहते, कभी हम सामने वाले का हक नहीं देना चाहते, कभी हम साथ वाले को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते। हम हर समय भयातंकित रहते हैं इसीलिए सही दिशा में, सही समय पर, सही कदम नहीं उठा पाते। इस तरह देश, समाज पिछड़ता रहता है। देश या समाज मात्र किसी चारदीवारी का नाम नहीं है। देश या समाज की ताकत उस समाज या देश का नागरिक है। नागरिक यदि भय मुक्त होगा तो देश शक्तिशाली होगा। नागरिक यदि डरपोक होगा तो राष्ट्र भी कमजोर ही होगा। भय किसी को मजबूत नहीं होने देता।

हमें भारत को भय मुक्त बनाना है। भारत का नागरिक निर्भीकता के साथ अपनी बात कह सके। भारत के विकास के बारे में निर्भीकता से सोच सके। भारत का नागरिक निर्भीक चिंतन कर सके। भारत विश्वगुरु रहा है, यह हमने अपने पूर्वजों से और इतिहास से सीखा है। भारत को वह पदवी फिर से प्राप्त करनी है। इसलिए हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, मजहब, क्षेत्र, भाषा का हो, पुरुष या स्त्री हो सबको निर्भय बनाना है। सबका सम्मान करते हुए, बड़ों का आदर करते हुए, छोटों से प्यार करते भयमुक्त नागरिक ही देश के स्वाभिमानी नागरिक हो सकते हैं। (सप्रेस)

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