गंगा के पानी का सवाल बिहार में केवल बाढ़ और सूखे के बीच का विरोधाभास नहीं, बल्कि खेती, मत्स्य जीवन, भूजल और नदी की पारिस्थितिकी से जुड़ा प्रश्न है। 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि की समीक्षा के बीच फरक्का और बिहार के जल अधिकारों पर बहस फिर तेज है। जरूरत राजनीतिक दावों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक आंकड़ों और स्थानीय अनुभवों से भविष्य की जल नीति तय करने की है।
नदी का पानी खेत में उतरता है तो किसान उसे बाढ़ कहता है और वही पानी गर्मियों में कम पड़ जाए तो प्यास। बिहार में गंगा का यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक ओर नदी किनारे बसे गांव हर साल कटाव और बाढ़ की मार झेलते हैं, दूसरी ओर गर्मी में सिंचाई, पेयजल, नौवहन और मत्स्य जीवन के लिए पर्याप्त प्रवाह का सवाल खड़ा रहता है। इसलिए गंगा का हिसाब केवल क्यूसेक में नहीं हो सकता। उसका हिसाब खेत, मछली, मिट्टी, भूजल, गांव और नदी पर निर्भर लोगों की जिंदगी में भी दर्ज होना चाहिए।
इसी संदर्भ में दिसंबर 2026 में 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि के 30 वर्ष पूरे होने और उसकी समीक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है। जनता दल (यू) के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य संजय कुमार झा ने मांग की है कि संधि का उसी रूप में नवीनीकरण करने के बजाय वर्ष 2050 तक गंगा बेसिन से जुड़े राज्यों की जल जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन किया जाए और बिहार की कृषि, पेयजल, उद्योग, भूजल, मत्स्य तथा पर्यावरणीय जरूरतों को इसमें उचित स्थान मिले।
लेकिन इस मांग पर राजनीतिक मतभेद भी सामने आ गए हैं। बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने 24 अगस्त 2026 को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संजय झा के बयान को भ्रामक बताया और कहा कि भारत-बांग्लादेश जल संधि जैसे संवेदनशील विषय पर बोलने से पहले इतिहास और उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन जरूरी है। उन्होंने कहा कि बिहार के हितों और जल अधिकारों को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा तत्कालीन जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह पहले भी आवाज उठाते रहे हैं।
सुधाकर सिंह का मूल सवाल इससे आगे जाता है—जब बिहार के पास गंगा का पानी है तो उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा? उनका कहना है कि कभी बिहार में गरमा धान की खेती होती थी, लेकिन पानी के अभाव में वह व्यवस्था खत्म होती गई।
यही वह विरोधाभास है जिसे फरक्का के प्रश्न के केंद्र में रखना होगा।
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा पर बनाया गया और 1975 में चालू हुआ। इसका उद्देश्य गंगा से पानी मोड़कर भागीरथी-हुगली तंत्र में प्रवाह बढ़ाना और कोलकाता बंदरगाह में गाद की समस्या को कम करना था। इसके लिए लगभग 38 किलोमीटर लंबी फीडर नहर बनाई गई। उस समय यह एक बड़ी इंजीनियरिंग परियोजना थी, लेकिन नदी पर किसी बड़े अवरोध का असर केवल पानी की मात्रा तक सीमित नहीं रहता। नदी के साथ गाद, पोषक तत्व, मछलियां और पूरा पारिस्थितिक तंत्र भी चलता है।
बिहार में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि फरक्का के कारण नदी की धारा और गाद के व्यवहार में क्या परिवर्तन आया। स्थानीय समाज का अनुभव है कि कई इलाकों में कृषि भूमि पर बालू जमने से खेती प्रभावित हुई और कटाव ने लोगों को विस्थापित किया। हालांकि बिहार की हर बाढ़ या कटाव के लिए केवल फरक्का को जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। नेपाल और हिमालय से आने वाला पानी, मानसूनी वर्षा, कोसी, गंडक और घाघरा जैसी सहायक नदियां, तटबंध, जल निकासी, नदी की प्राकृतिक संरचना और जलवायु परिवर्तन भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि फरक्का के प्रभाव का अध्ययन ही न किया जाए।
पिछले पांच दशकों के जलप्रवाह, गाद, नदी तल, कटाव और कृषि भूमि के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन ही इस बहस को तथ्य तक पहुंचा सकता है। यही वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जिसकी जरूरत आज है।
इस बहस में मछुआरों की आवाज भी महत्वपूर्ण है। लोक में गाया जाता है—
“गंगा जी में मिले न मछरिया,
केना के दिनमा जयते हो भाय…”
यह पंक्ति वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, लेकिन नदी किनारे रहने वाले समाज के अनुभव का दस्तावेज जरूर है। मछुआरा नदी में परिवर्तन को सबसे पहले महसूस करता है। धारा बदले, पानी की गुणवत्ता बदले, मछलियों का प्रवास प्रभावित हो या प्रजनन क्षेत्र बदलें—उसकी रोजी-रोटी सीधे प्रभावित होती है।
गंगा में गांगेय डॉल्फिन और अनेक जलीय प्रजातियां भी हैं। हिलसा जैसी मछलियों के प्राकृतिक प्रवास का प्रश्न भी फरक्का से जुड़ा रहा है। इसलिए भविष्य की जल नीति में यह केवल नहीं पूछा जाना चाहिए कि भारत और बांग्लादेश के बीच कितना पानी बांटा जाए। यह भी पूछा जाना चाहिए कि गंगा को जीवित रखने के लिए कितना और किस प्रकार का प्रवाह आवश्यक है।
यहीं पर्यावरणीय प्रवाह का प्रश्न सामने आता है। नदी में केवल न्यूनतम क्यूसेक छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। मौसम के अनुसार प्रवाह का स्वाभाविक उतार-चढ़ाव, मछलियों के प्रजनन, डॉल्फिन के आवास, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के लिए आवश्यक है। नदी को केवल पानी की पाइपलाइन में बदल देना उसके साथ अन्याय होगा।
फरक्का की बहस में गंगा मुक्ति आंदोलन के प्रवर्तक अनिल प्रकाश जैसे लोगों की आवाज भी रही है।वे 1982 से ही इसके विरोध में आंदोलन कर रहे हैं।बैराज हटाने की उनकी मांग पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उससे जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक प्रश्नों की वैज्ञानिक जांच से बचा नहीं जा सकता। इसी तरह कहलगांव की फेकियां देवी, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से जुड़े रहे प्रो. योगेंद्र तथा खगड़िया-मुंगेर में कटाव के मुद्दे उठाने वाले नागेंद्र सिंह त्यागी, राकेश कुमार मंडल और संजय कुमार पोद्दार जैसे लोगों के अनुभव भी इस विमर्श का हिस्सा होने चाहिए।
क्योंकि खेत कटता है तो केवल जमीन नहीं जाती, किसान की आर्थिक सुरक्षा जाती है। घर कटता है तो केवल दीवार नहीं गिरती, परिवार की सामाजिक जड़ें टूटती हैं।
बक्सर सांसद सुधाकर सिंह ने 24 जनवरी 1997 की सचिव-स्तरीय बैठक के दस्तावेज को भी महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार उस बैठक में बिहार के अधिकारियों ने भारत-बांग्लादेश संधि को अंतिम रूप देने से पहले बिहार से परामर्श न किए जाने और उसके संभावित प्रभावों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। बैठक में केंद्र के अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया था कि संधि फरक्का पर उपलब्ध जल के बंटवारे से संबंधित है और इसका उद्देश्य ऊपरी तटवर्ती राज्यों के जल उपयोग पर रोक लगाना नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया था कि गंगा जल के सह-बेसिन राज्यों के बीच बंटवारे का प्रश्न सभी आठ गंगा बेसिन राज्यों को शामिल करके देखा जाना चाहिए।
यह दस्तावेज आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार अपने जल अधिकारों को केवल भारत-बांग्लादेश विवाद के संदर्भ में नहीं, बल्कि पूरे गंगा बेसिन के संदर्भ में देखना चाहता है।
सुधाकर सिंह ने मांग की है कि बिहार को आगामी भारत-बांग्लादेश वार्ता में औपचारिक हितधारक बनाया जाए। उन्होंने गंगा के ऊपरी तटवर्ती राज्यों के जल उपयोग की समीक्षा, सभी गंगा बेसिन राज्यों के बीच हिस्सेदारी तय करने, नई परियोजनाओं की स्वीकृति पर पुनर्विचार, नेपाल में सप्तकोशी उच्च बांध परियोजना को प्राथमिकता, राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर वर्षभर नौवहन योग्य गहराई और गाद प्रबंधन की वैज्ञानिक व्यवस्था की मांग भी उठाई है।
यहां संजय झा और सुधाकर सिंह के तर्कों में राजनीतिक अंतर के बावजूद एक साझा प्रश्न दिखाई देता है—बिहार की दीर्घकालिक जल सुरक्षा।
संजय झा वर्ष 2050 तक की जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन चाहते हैं। सुधाकर सिंह पुराने दस्तावेजों और बिहार के जल अधिकारों को केंद्र में रखकर समीक्षा की मांग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बिहार के लिए यह बहस राजनीतिक बयानबाजी से आगे जाकर नीति का विषय बननी चाहिए।
2050 का बिहार आज के बिहार जैसा नहीं होगा। आबादी, शहरीकरण, कृषि, उद्योग और पेयजल की जरूरत बढ़ेगी। जलवायु परिवर्तन वर्षा और नदी प्रवाह को अधिक अनिश्चित बना सकता है। ऐसे में तीन दशक पुराने आंकड़ों के आधार पर अगले तीन दशक की जल नीति तय करना दूरदर्शी नहीं होगा।
1996 की संधि की समीक्षा इसलिए केवल भारत और बांग्लादेश के बीच बातचीत का विषय नहीं होनी चाहिए। बिहार, पश्चिम बंगाल और गंगा बेसिन के अन्य राज्यों की वास्तविक जरूरतों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही नेपाल से आने वाली नदियों और पूरे गंगा बेसिन की पारिस्थितिकी को भी विमर्श का हिस्सा बनाना होगा।
फरक्का को पश्चिम बंगाल बनाम बिहार या भारत बनाम बांग्लादेश के विवाद में बदल देना आसान है। लेकिन गंगा का संकट इससे कहीं बड़ा है। कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों की जरूरत है, पश्चिम बंगाल की अपनी जल आवश्यकताएं हैं, बांग्लादेश की अपनी जरूरतें हैं और बिहार के किसानों, शहरों तथा उद्योगों को भी पानी चाहिए। इन सबके ऊपर स्वयं गंगा की पारिस्थितिक जरूरत है।
इसलिए समाधान किसी एक पक्ष की जीत में नहीं, संतुलन में है।
जरूरत इस बात की है कि फरक्का के प्रभाव पर स्वतंत्र बहुविषयी अध्ययन कराया जाए। पिछले पचास वर्षों के नदी प्रवाह, गाद, कटाव, कृषि, मत्स्य जीवन, डॉल्फिन, भूजल और नौवहन के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। फरक्का की संचालन प्रणाली, पुनर्रचना और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विशेषज्ञों की राय ली जाए। नदी किनारे रहने वाले किसानों, मछुआरों और प्रभावित समुदायों को भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
क्योंकि नदी का ज्ञान केवल प्रयोगशाला में नहीं होता। वह किसान के खेत में, मछुआरे की नाव में, कटाव से उजड़े गांव में और नदी में घटती मछलियों की संख्या में भी मिलता है।
फरक्का का असली हिसाब यह नहीं कि उसने किसे कितना पानी दिया। असली हिसाब यह है कि उसकी वजह से नदी की धारा, गाद, खेत, मछलियां, डॉल्फिन और नदी किनारे बसे समाज पर क्या असर पड़ा।
यह हिसाब भावनाओं से नहीं, आंकड़ों और जमीन की गवाही—दोनों से करना होगा।
बिहार को पानी चाहिए। बांग्लादेश को पानी चाहिए। पश्चिम बंगाल को पानी चाहिए। लेकिन गंगा को भी पानी चाहिए।
आने वाली जल नीति की पहली शर्त यही होनी चाहिए कि नदी के हिस्से का पानी उसके जीवन और पारिस्थितिकी के लिए सुरक्षित रहे। क्योंकि गंगा बचेगी तभी उसके किनारे बसे समाज बचेंगे, खेत बचेंगे, मछुआरे बचेंगे और गंगा से जुड़ी सभ्यता भी।
फरक्का की अगली कहानी पानी बांटने की नहीं, नदी बचाने की कहानी होनी चाहिए।


