Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

दो स्तरों की शिक्षा : बच्चों को बंधुआ बनाने की साज़िश

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्रों, युवाओं के हाल के प्रदर्शन ने परीक्षा-प्रणाली की बदहाली और ‘नीट’ के ‘पेपर लीक’ के अलावा मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। आखिर शिक्षा के नाम पर क्या किया जा रहा है, हमारे छात्रों, युवाओं के साथ? क्या शिक्षा की प्रचलित पद्धति से हम अपने बच्चों को बेहतर नागरिक में तब्दील कर पा रहे हैं? क्या हैं, शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा गफलतें?


हम हर शाम टीवी स्क्रीन पर ‘शिक्षा के भगवाकरण’ जैसी जिन सतही और खोखली बहसों को देखते हैं, वे असल में आम जनता के दिमाग को उलझाने और उन्हें हिंदू-मुस्लिम के बाज़ारों में व्यस्त रखने के लिए ही डिज़ाइन की गई हैं। असली खेल तो उस अदृश्य सिंडिकेट का है, जो हमारे ही टैक्स के पैसों से देश की पूरी-की-पूरी पीढ़ी के दिमाग को ‘री-प्रोग्राम’ कर रहा है। यह कोई प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी, नीतिगत और संस्थागत हत्या है।

साल 2014 के बाद से शिक्षा मंत्रालय ने ‘रैशनलाइजेशन’ यानी तर्कसंगतीकरण का एक नया जादुई शब्द गढ़ा और आम जनता को बड़ी मासूमियत से यह समझाया गया कि कोरोना महामारी के बाद बच्चों पर बस्ते का बोझ कम करना है। जब इस कटे हुए पाठ्यक्रम का पोस्टमार्टम किया गया, तो रोंगटे खड़े करने वाला सच सामने आया कि यह बस्ते का बोझ कम करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के दिमाग का दायरा सिकोड़ने का एक क्रूर राष्ट्रीय प्रोजेक्ट था।

कक्षा दसवीं की विज्ञान की किताब से चार्ल्स डार्विन का ‘विकासवाद का सिद्धांत’ साफ कर दिया गया, तो वहीं इतिहास की किताबों से लोकतांत्रिक आंदोलन, असहमति और मुगलों का पूरा इतिहास ही गायब कर दिया गया। जब आप एक बच्चे को यह पढ़ने ही नहीं देंगे कि इतिहास में सत्ता से सवाल कैसे पूछे गए और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कैसे की गई, तो आप एक जागरूक नागरिक नहीं, बल्कि एक रीढ़हीन, दब्बू प्रजा तैयार कर रहे होंगे। इस खामोश पतन पर शिक्षाविद् प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने बिल्कुल सच कहा था कि जब आप किसी विश्वविद्यालय के शीर्ष पर एक विचारधारक को बिठाते हैं, तो वह शिक्षाविदों की नहीं, बल्कि अपने अनुयायियों की फ़ौज तैयार करता है। यह संस्था का पतन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी संस्थागत हत्या है।

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इस सिंडिकेट का सबसे खौफनाक चेहरा रक्षा मंत्रालय की एक ‘आरटीआई’ रिपोर्ट से उजागर हुआ है। इसके मुताबिक दशकों तक जो ‘सैनिक स्कूल’ देश का गौरव थे और धर्मनिरपेक्ष व योग्यता-आधारित युवा तैयार करते थे, उन्हें साल 2021 में ‘ट्रिपल पी मॉडल’ के तहत निजी हाथों में सौंपने का खेल शुरू हुआ। शुरुआती 40 सैनिक स्कूलों में से 62 प्रतिशत सीधे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (आरएसएस) से जुड़े ट्रस्टों, दक्षिणपंथी राजनेताओं और भाजपा के विधायकों-सांसदों के ‘एनजीओ’ को सौंप दिए गए। कमाल की बात यह है कि इन प्राइवेट सैनिक स्कूलों को खड़ा करने और चलाने के लिए भी हमारे दिए गए इनकम टैक्स के पैसों से प्रति छात्र सब्सिडी और इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रांट दी जा रही है। यानी पैसा देश की आम जनता का और ‘ब्रेनवॉश’ का धंधा एक खास विचारधारा के सिंडिकेट का!

यही मॉडल प्राथमिक शिक्षा में भी लागू है, जहाँ पिछले दस सालों में विलय के नाम पर हज़ारों सरकारी स्कूलों पर ताला लगा दिया गया और गरीब व मिडिल क्लास का बच्चा मजबूर होकर उन सस्ते, ‘विचारधारा-फंडेड’ प्राइवेट स्कूलों में जाने लगा जहाँ उसे विज्ञान से ज़्यादा संस्कार और तर्कों से ज़्यादा आज्ञाकारिता की घुट्टी पिलाई जाती है। यह एक पूरी पीढी को बिना गोली चलाए वैचारिक रूप से गुलाम बनाने का दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग है।

आखिर डार्विन और ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ से इस सत्ता को इतनी नफ़रत क्यों है? क्योंकि जब एक बच्चा डार्विन का सिद्धांत पढ़ता है, तो वह सीखता है कि प्रकृति में बदलाव ही एकमात्र शाश्वत नियम है और जो चीजें व्यवस्था के अनुकूल काम नहीं करतीं, उन्हें बदल दिया जाता है। जब वह यह सीखता है, तो उसके भीतर व्यवस्था से प्रश्न पूछने का साहस पैदा होता है, लेकिन आज के ‘सत्ता समीकरण’ और ‘कॉर्पोरेट मोनोपोली’ को सोचने वाले दिमागों की ज़रूरत ही नहीं है। अडानी, अंबानी या किसी भी ग्लोबल कॉर्पोरेशन को ऐसे युवा बिल्कुल नहीं चाहिए जो अपने अधिकारों के सवाल उठाएं।

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‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन’ की रिपोर्ट साफ कहती है कि भारत के कुल बेरोजगारों में 83 प्रतिशत युवा हैं और जो ग्रेजुएट हैं, उनमें आधे से अधिक नौकरी के लायक ही नहीं बचे हैं। यह एक भयानक बेरोजगारी संकट है, क्योंकि कॉर्पोरेट्स को ‘गिग इकॉनॉमी’ के लिए सस्ते, आज्ञाकारी मज़दूर चाहिए। उन्हें जोमैटो-स्विगी के ‘डिलीवरी बॉय’ चाहिए, अमेज़न के वेयरहाउस में 14-14 घंटे खटने वाले बंधुआ मज़दूर चाहिए और रीढ़हीन ‘डेटा एंट्री ऑपरेटर’ चाहिए जो सिर्फ़ ‘कमांड’ मानें और कभी विद्रोह न करें।

जब भी इस दमघोंटू व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो सोशल मीडिया के ‘सभ्रांत’ वकीलों द्वारा एक बेहद आकर्षक तर्क उछाला जाता है कि यह बदलाव मैकाले की औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति है। यह सुनने में बहुत सुहावना लगता है, लेकिन जैसे ही इस पाखंड के गुब्बारे में हम ‘डेटा’ की सुई चुभाते हैं, एक घिनौना सच बाहर आता है। अगर यह स्वदेशी और पौराणिक शिक्षा इतनी ही महान और ‘विश्वगुरु’ बनाने वाली है, तो देश के बड़े-बड़े राष्ट्रवादी नेता, कैबिनेट मंत्री, आईएएस-आईपीएस अफसर और रात-दिन टीवी पर राष्ट्रवाद बेचने वाले न्यूज़ एंकर्स अपने बच्चों को इन शिशु मंदिरों या ‘ट्रिपल पी’ ‘सैनिक स्कूलों’ में क्यों नहीं पढ़ाते? उनके बच्चों के प्रोफाइल खँगालिए, वे आपको हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, ऑक्सफोर्ड या देश के उन अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में पढ़ते दिखेंगे जिनकी सालाना फीस 20 लाख रुपए है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि सिलिकॉन वैली या ग्लोबल मार्केट में ‘डेटा साइंस’ और ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ बिकती है, कोई खोखली राजनीतिक विचारधारा नहीं।

इन्होंने जानबूझकर देश में एक क्रूर ‘द्वि-स्तरीय’ व्यवस्था स्थापित की है, जिसके पहले हिस्से में शासक वर्ग के बच्चों के लिए विश्वस्तरीय शिक्षा है जो उन्हें मालिक बनाएगी। दूसरे हिस्से में आम जनता के बच्चों के लिए इतिहास के मुर्दे उखाड़ने, मिथकों को रटने और अंधभक्त सिपाही बनने की सस्ती शिक्षा है जो उन्हें भविष्य का आज्ञाकारी दास बनाएगी। यह राष्ट्र निर्माण नहीं, बल्कि मिडिल क्लास के खिलाफ छेड़ा गया एक ‘क्लास वॉर’ है।

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संविधान सभा में डॉ. बीआर आंबेडकर ने एक ऐतिहासिक चेतावनी दी थी कि भक्ति, धर्म के क्षेत्र में आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है, लेकिन राजनीति और संस्थानों में भक्ति सीधे तानाशाही और पतन की ओर ले जाती है। सस्ती, तार्किक और वैज्ञानिक शिक्षा एक सोचने वाला नागरिक पैदा करती है जो रोजगार और टैक्स का हिसाब माँगता है, जबकि इसके विपरीत वैचारिक रूप से अंधी शिक्षा सिर्फ़ एक वफ़ादार वोटर और शोषित मज़दूर पैदा करती है।

हमारा शिक्षा-तंत्र अब इंसानों को शिक्षित नहीं कर रहा, वह इस क्रूर ‘क्रोनी-कैपिटलिज्म’ की मशीन के लिए ऐसा ‘सॉफ्टवेयर’ तैयार कर रहा है जो कभी विद्रोह न कर सके। इसलिए अगली बार जब आप अपने बच्चे के स्कूल की भारी-भरकम फीस भरने के लिए अपनी जिंदगी भर की कमाई दांव पर लगाएं, तो खुद से यह सवाल ज़रूर पूछिए कि आप जिस शिक्षा के लिए अपनी रातों की नींद कुर्बान कर रहे हैं, क्या वह सच में आपके बच्चे का भविष्य बना रही है या वह किसी और का राजनीतिक और कॉर्पोरेट साम्राज्य खड़ा करने में आपके बच्चे को महज़ एक मज़दूर बना रही है? (सप्रेस)

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