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पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा दे सकती है कार्बन फुटप्रिंट लेबलिंग: पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी

पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा दे सकती है कार्बन फुटप्रिंट लेबलिंग: पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी

नई दिल्ली, 2 जून। विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) तथा हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज़ एंड कंज़र्वेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (हेस्को) के संयुक्त तत्वावधान में ‘कार्बन फुटप्रिंट’ विषय पर एक गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें पर्यावरणविदों,...

नई दिल्ली, 2 जून। विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) तथा हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज़ एंड कंज़र्वेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (हेस्को) के संयुक्त तत्वावधान में ‘कार्बन फुटप्रिंट’ विषय पर एक गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें पर्यावरणविदों, विधि विशेषज्ञों, समाजशास्त्रियों, सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं, शिक्षाविदों तथा नीति-निर्माण से जुड़े हितधारकों ने जलवायु उत्तरदायित्व के नवाचारी उपायों पर गंभीर विमर्श किया।

जलवायु परिवर्तन और तीव्र गति से बदलते उपभोक्तावादी व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में सम्मेलन में वाणिज्यिक उत्पादों पर अनिवार्य रूप से कार्बन फुटप्रिंट संबंधी जानकारी प्रदर्शित किए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा हुई, जिससे उपभोक्ता जागरूक निर्णय ले सकें तथा उद्योग जगत में पर्यावरणीय जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (आईएनएसए) के अध्यक्ष प्रो. शेखर मांडे, न्यायमूर्ति संगीता धींगरा, यूपीईएस के कुलपति प्रो. सुनील राय, आईआईटी दिल्ली के सीआरडीटी की प्रो. (डॉ.) प्रियंका कौशल, डॉ. वत्सला, दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज के प्रो. वेद प्रकाश, डॉ. अनिल सागर, बिहार के पर्यावरण कार्यकर्ता पंकज मालवीय, पवन सिंह तथा नदी उत्सव के संयोजक श्री अभय मिश्रा सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।

इस अवसर पर डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि एक समाज और राष्ट्र के रूप में हमें पर्यावरणीय चिंताओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में गहन शोध और सार्थक कार्य कर रहे लोगों को एक मंच पर लाना सभी हितधारकों के लिए लाभकारी होगा तथा ज्ञान की कमी को पाटने में सहायक सिद्ध होगा। डॉ. जोशी ने आगे कहा कि जिस प्रकार खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर कैलोरी और पोषण सम्बंधी जानकारी अंकित होती है, उसी प्रकार वाणिज्यिक उत्पादों पर उनके कार्बन फुटप्रिंट की भी जानकारी प्रदर्शित की जानी चाहिए। इससे जनसामान्य में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और उत्पादों से जुड़े कार्बन उत्सर्जन के प्रति उपभोक्ता संवेदनशील होकर पर्यावरण-अनुकूल विकल्प चुन सकेंगे। उन्होंने कहा, “स्वच्छता ही देवत्व है और नदियां जीवन हैं।”

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उन्होंने यह भी कहा कि यह विमर्श एक महत्वपूर्ण संवाद की शुरुआत है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस चर्चा से प्राप्त सुझावों, निष्कर्षों और अनुशंसाओं को संकलित कर माननीय प्रधानमंत्री को पत्र के रूप में भेजा जाएगा, ताकि यह विमर्श नीति-निर्माण और जन-जागरूकता में सार्थक योगदान दे सके।

प्रो. शेखर मांडे ने कार्बन और मीथेन उत्सर्जन से उत्पन्न पर्यावरणीय चिंताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कार्बन ट्रेडिंग योजना जैसे प्रयासों का उल्लेख किया।

विमर्श के दौरान डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने बताया कि उपभोक्ताओं की आदतें और उपभोक्तावाद की प्रवृत्तियां कार्बन फुटप्रिंट को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि उत्पादों पर जीवनशैली और उपभोग से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी प्रदर्शित की जानी चाहिए, जिससे उपभोक्ता अधिक जागरूक निर्णय ले सकें। उपलब्ध आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग 37 से 40 अरब टन कार्बन उत्सर्जित होता है, जबकि फ्लोरीनयुक्त कार्बन का उत्सर्जन लगभग 1.5 से 2 अरब टन है। उन्होंने यह भी कहा कि इन नुकसानों को रिवर्स करने की संभावना अत्यंत सीमित है, जो लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक ही संभव हो सकती है।

डॉ. जोशी ने कहा कि प्रकृति सभी के साथ समान व्यवहार करती है। उन्होंने घर में बने उत्पादों और व्यावसायिक रूप से निर्मित उत्पादों के कार्बन उत्सर्जन की तुलनात्मक जानकारी प्रस्तुत करते हुए उनके पर्यावरणीय प्रभावों में अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पारिस्थितिकी और जैविक खाद्य पद्धतियां कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सहायक हो सकती हैं तथा उपभोक्ताओं की जीवनशैली में परिवर्तन से कार्बन फुटप्रिंट में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

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प्रो. सुनील राय ने अकादमिक दृष्टिकोण से अपने विचार साझा करते हुए कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियां दो स्तरों – समाज और औद्योगिक समाज – पर कार्य करती हैं तथा इनके बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि उपभोक्ता स्वयं समाधान का हिस्सा बन जाएं, तो इस समस्या का बड़े स्तर पर समाधान संभव है।

उनके अनुसार लगभग 70 प्रतिशत समस्या उपभोक्ताओं की आदतों से जुड़ी है, जबकि 30 प्रतिशत उत्पादन प्रक्रियाओं से सम्बंधित है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कार्बन फुटप्रिंट से जुड़ी समस्याएं और गंभीर हुईं, तो उनकी भरपाई अत्यंत कठिन हो जाएगी, इसलिए समय रहते हस्तक्षेप आवश्यक है। उपभोग से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा कि हमें यह विचार करना होगा कि क्या, क्यों, कब और कितना उपभोग किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अपव्यय की क्षमता को प्रायः समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत परम्परागत रूप से सस्टेनेबल जीवनशैली का पालन करता रहा है, किंतु समय के साथ ऐसी अनेक परम्पराएं क्षीण होती गई हैं। प्रो. राय ने यह भी कहा कि अनेक इंजीनियरिंग प्रणालियां आवश्यकता से अधिक जटिल रूप से डिज़ाइन की जाती हैं और सतत प्रक्रिया अभियंत्रण तथा प्रक्रियागत सुधारों के माध्यम से पर्यावरणीय प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बिहार के पंकज मालवीय भारतीय ज्ञान परम्परा का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में समस्याओं को समग्र दृष्टि से देखने की दीर्घकालिक संस्कृति रही है, जहां ज्ञान, चिंतन, मनन और तर्कसंगत विचार सदैव निर्णय प्रक्रिया का आधार रहे हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय विमर्श में ऐसे विचारों को शामिल करना आवश्यक है, जो व्यावहारिक होने के साथ-साथ सतत विकास और जलवायु अनुकूलन को भी प्रोत्साहित करें।

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अन्य वक्ताओं और प्रतिनिधियों ने भी इस विषय पर अपने महत्त्वपूर्ण विचार और सुझाव प्रस्तुत किए। ‘कार्बन फुटप्रिंट’ विषयक इस गोलमेज सम्मेलन में विविध क्षेत्रों से आए विद्वानों, विशेषज्ञों और हितधारकों की सक्रिय सहभागिता रही, जिससे एक सार्थक और रचनात्मक विमर्श संभव हुआ।

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