लोकतंत्र को अपने वैभव का इंतज़ार

लेखक की फोटो

क्रिकेट की थकी और उबाऊ होती दुनिया में जैसे वैभव सूर्यवंशी अचानक आकर खेल की ऊर्जा, सौंदर्य और उम्मीद लौटा देता है, वैसे ही भारतीय समाज और लोकतंत्र भी आज किसी ऐसे ही साहसी, ताज़ा और जीवंत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में दिखाई देते हैं। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, शिक्षा व्यवस्था और राजनीति के बढ़ते अविश्वास के बीच सवाल यही है कि क्या कोई नया वैभव सूर्यवंशी इस जड़ता को तोड़ पाएगा?


क्रिकेट जैसे तेज खेल में, उसकी आईपीएल जैसी गलाकाट स्पर्धा वाली श्रृंखला में भी जब ठहराव व उबासी आने लगे तब किसी वैभव सूर्यवंशी की जरूरत पड़ती है। वह आता है और ऐसा विस्फोट करता है कि सारी जड़ता, ऊब व पस्ती की चिंदियां उड़ जाती हैं। क्रिकेट फिर निखर उठता है। और कमाल यह भी है कि वैभव का खेल क्रिकेट की सारी बारीकियों व नजाकत को संभाल कर चलता है। उसका खेल छक्का उड़ाने की डंडेबाजी नहीं है, क्रिकेट का संपन्न विस्तार है वह। क़रीब से देखिए तो आप पाएंगे कि वैभव गावस्कर, सचिन और क्रिस गेल का वैसा मिश्रण है जिसमें वीरेंद्र सहवाग की छौंक भी लगती रहती है। अभी वह आया ही है, ठीक से उसके पांव भी जमे नहीं हैं लेकिन उसने बड़ी गहराई से क्रिकेट का व्याकरण बदल दिया है।

भारतीय समाज को और उसकी राजनीतिक बुनावट को भी किसी वैभव सूर्यवंशी का इंतजार है। आज हमारा सामाजिक-राजनीतिक माहौल  इतना बेजान व प्रेरणाहीन हो गया है कि अब उसमें से अधिकाधिक पतन व सडांध ही निकल सकती है। यह माहौल बना रहा व इसे हम खींचते व चलाते रहे तो हमारा सारा समाज अंधकूप में अधिकाधिक गिरता जाएगा। वह लगातार गिरा रहा है।

जब देश की सर्वोच्च न्यायपालिका यह कहे कि लाखों-लाख मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में से काट देना कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है कि जिससे हमारी नींद हराम हो : “ इस बार न सही, आप अगली बात वोट डाल लेना !” तो हमारी न्यायपालिका के पतन का अंदाजा लगाया जा सकता है। वह फैसला सुनाती है कि चुनाव आयोग को पूरा संवैधानिक अधिकार है कि वह मतदाता सूची को दुरुस्त करती रहे और इसलिए बिहार से बंगाल तक चली ‘सर’ की प्रक्रिया पूर्णतः वैध है। कोई अदालत से पूछे कि किसने, कब कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेवारी नहीं है ? कब कहां ? वह उसकी ही जिम्मेवारी है जिसे उसने निभाया नहीं है। वह अपनी उस विफलता का ठीकरा मतदाता के सर कैसे फोड़ सकती है ?

See also  77वें गणतंत्र पर भारत : गर्व भी, प्रश्न भी, संकल्प भी

चुनाव आयोग मतदाताओं का आका नहीं है, मतदाताओं की सुविधा देखने व मतदान का विधिसम्मत संचालन करने की एक एजेंसी भर है। हमारा संविधान उसे मनमाना करने की इजाजत नहीं देता है। चुनाव से ठीक पहले, बग़ैर किसी मान्य प्रक्रिया के व मतदाताओं को न्यायपूर्ण समय दिए बिना मतदाताओं के नाम काटने व जोड़ने का अधिकार चुनाव आयोग को है, यह कहां लिखा है संविधान में ? मी लार्ड, संविधान आप ही नहीं, हम भी पढ़ते हैं; उसे आप ही नहीं, हम भी समझते हैं। इसलिए हमें समझाइए तो कि ‘सर’ की प्रक्रिया के बारे में संविधान कहता क्या है ?                         

हम आपसे कहना चाहते हैं कि हमारी नागरिकता व मतदाता की हमारी हैसियत किसी सरकार या आयोग या अदालत की कृपा से नहीं है। यह हमें हमारे बनाए संविधान से मिली है और हमने ही इसके संरक्षण व संवर्धन के लिए विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि बनाई है। हम मतदाता स्थाई हैं, आप समेत बाकी सारी संरचनाएं अस्थाई हैं। यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि ज्ञानियों की समझ में न आए। लेकिन जो बारीक बात समझने में दिक़्कत आती है वह बात है लोकतंत्र की ! यह राजतंत्र की मानसिकता से न समझा जा सकता है, न चलाया जा सकता है। इसके लिए एक अलग प्रतिबद्धता व अनुशासन की जरूरत है जिसका हमारे यहां सिरे से अभाव है। जैसे औपनिवेशिक शासन की चाकरी में लगी नौकरशाही रातोंरात स्वतंत्र देश की सेवा करने वाली सेना नहीं बन सकती है, वैसे ही औपनिवेशिक मानसिकता से आप लोकतांत्रिक न्यायपालिका का दायित्व नहीं निभा सकते हैं। जिस न्यायपालिका ने आपातकाल में हमारे जीवन के अधिकार को भी राज्य की कृपा पर छोड़ कर अपना मुंह फेर लिया था, वह आज इतनी संवेदनशील व विवेकवान हो जाएगी कि संविधान के साथ खड़ी रहे, ऐसी खामख्याली हम नहीं पालते हैं। इसलिए हम आग्रह करते हैं कि न्यायपालिका की ऊंची कुर्सी पर बैठ कर नहीं, ज़मीन पर आ कर हमसे संवाद कीजिए। आपकी भाषा में कहूं, तो कॉक्रोच जहां रहते हैं, वहां पहुंचिए।

See also  विचार : क्या गवई के ‘धैर्य’ से सत्ता के सिंहासनों की चूलें हिल गईं ?

हमें आप बता सकें तो बताएं कि डेरा सच्चा सौदा के बलात्कारी प्रमुख गुरुमीत राम 16वीं बार पैरोल पा बाहर आ गए हैं, तो कैसे ? कैदियों के भी संवैधानिक अधिकार हैं, और उनका पालन भी होना चाहिए लेकिन कोई न्यायमूर्ति बताएं तो हमें कि संविधान में इस तरह पैरोल बांटने की व्यवस्था कहां है ?     

‘नीट’ की परीक्षा का पेपर लीक होना आज इतना स्वाभाविक हो गया है कि अगर वह न हो तो, उस झटके से ही लोग मूर्छित हो जाएंगे। इसलिए हमारे ओडिशा से देश को उपहार में दिया गया देश का शिक्षामंत्री बड़ी आसानी से बोल पड़ता है : ‘ कोई बात नहीं, हम यह परीक्षा रद्द कर, परीक्षा की नई तारीख घोषित कर रहे हैं; और हमारी उदारता देखिए कि हम इस परीक्षा के लिए बच्चों से फ़ीस भी नहीं लेंगे. हताश-निराश बच्चों को वे डपटते हैं : अरे पैसा नहीं ले रहे हैं न, अब जान लोगे क्या ?’ अगले चुनाव में वोट डाल लेना, अगली परीक्षा दे लेना,अगली बार पैरोल नहीं देंगे भाई जैसे जुमले प्राणहीन व्यवस्था का प्रमाण देते हैं।

सीबीएसई की परीक्षा की कापियां कौन जांचता है ? सच कहूं तो मुझे मालूम नहीं था कि यह काम भी अब कंप्यूटर कर रहा है। 17,68,962 छात्रों की कॉपियां स्कैन कर कंप्यूटर में डाली गईं, और परीक्षकों से कहा गया कि कंप्यूटर के पर्दे के सामने बैठ कर, इन कॉपियों की ऑनस्क्रीन जांच कीजिए व छात्रों के भविष्य की घोषणा कीजिए। स्कैनर कैसा है, स्कैन छवि कितनी साफ है, परीक्षक कंप्यूटर से कितना परिचित है, वह ऐसी जांच-प्रक्रिया से कितना सहज है, इस काम के लिए उसका प्रशिक्षण कब, कैसे व कितना हुआ है आदि बातें व्यर्थ हैं। अपना कंप्यूटर है न तो बात खत्म ! गांधीजी ने मशीनों के पीछे की इसी अंधी दौड़ से मानवता को सावधान किया था। कॉपियों का परीक्षण अध्यापक प्रत्यक्ष करते थे, उसमें ऐसी क्या खामी थी कि आपने शिक्षक की जगह मशीनों को दे दी ?  आप मशीनों से वोटिंग और मशीनों से कॉपियों की जांच में कोई साम्य पाते हैं ? दोनों जगह कोशिश यह है कि इस प्रक्रिया को आदमी की पहुंच से दूर कर दिया जाए। इधर आलम यह है कि आदमी ही तो लोकतंत्र की प्राथमिक व अंतिम इकाई है ! उससे जितनी दूर जाएंगे आप, लोकतंत्र से उतनी ही दूरी बनती जाएगी। गांधी ‘डाइरेक्ट डिमोक्रेसी’ का संधान चाहते थे, आप ‘डिमोक्रेसी’ का ‘डाइरेक्शन’ ही बदल देना चाहते हैं। 

See also  हमारे देश में लोकतंत्र Democracy नागरिकों के कारण बचा है और नागरिकों के कारण ही बचेगा

4,04,319 छात्रों ने अपनी स्कैन कॉपियों की मांग की है, ताकि उसकी फिर से समीक्षा की जा सके। आपकी ही बनाई यह व्यवस्था भी है, तो शिक्षा मंत्रालय के हाथ-पांव फूल रहे हैं और वह बहाने बना रही है। स्कैन कॉपियों की फिर से जांच की यह प्रक्रिया मुफ्त भी नहीं है। बच्चों से इसके लिए खासी रकम वसूली जा रही है। किसकी जिम्मेवारी है यह ? कौन किससे पूछे ? आप ख़ुद से भी जवाब नहीं देते हैं, प्रेसवार्ता भी नहीं करते ! तो गूंगों का समाज बनेगा क्या ? अदालत इसकी तरफ कैसे ध्यान देगी, वह तो सत्ता-संस्थानों की वैधता स्थापित करने में जुटी हुई है। उसके पास समय कहां है कि वह पूछे कि जिस सरकार के पास कल तक पेट्रोल-डीजल-गैस का पर्याप्त भंडार था, वह चुनाव खत्म होने की रात से ही खत्म कैसे हो गया? हर दिन इनकी कीमतों में बढ़ोत्तरी कैसे व क्यों हो रही है ? अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के भाव व हमारे भाव में कोई तर्कसंगत संतुलन है क्या ? कहा जा रहा है कि तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है, तो लोगों का गला कटा जा रहा है, यह आपको नहीं दीखता है?

कभी जयप्रकाश नारायण ने कहा था : भ्रष्टाचार ऊपर से चल कर नीचे तक पहुंचता है। गंगोत्री में ही जहर मिला हो तो नीचे गंगा का प्रवाह शुद्ध कैसे हो सकता है ? ऐसे सवाल पूछने वाला व इनके जवाब के लिए जूझ पड़ने वाला कोई वैभव सूर्यवंशी हमें चाहिए। हमें उसका इंतज़ार नहीं करना है, उसकी खोज में निकल पड़ना है। यह किसी दूसरे के लिए आह्वान नहीं है, आंतरिक प्रतीति है।

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »