इजरायल की उत्पत्ति : एक जटिल संघर्ष की शुरुआत

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पश्चिम एशिया में जारी भीषण मारकाट का खलनायक और अमेरिका समेत तमाम खाड़ी के देशों को हांकने वाला इजरायल आखिर दूर-दराज के उस इलाके में पैदा कैसे हुआ? क्या जहां वह है, वह उसकी पारंपरिक ‘पितृ-भूमि’ है? क्या है, इजरायल का इतिहास?


फिलिस्तीन की भूमि पर इजरायल का जन्म आधुनिक इतिहास की एक अत्यंत जटिल घटना है। आधुनिक राष्ट्र के रूप में इसका उदय 20 वीं शताब्दी की राजनीतिक, औपनिवेशिक और सामाजिक उथल-पुथल का परिणाम था। इसकी जड़ों को गहराई से समझने के लिए इसके ऐतिहासिक संदर्भ, वैश्विक परिस्थितियों और इस संघर्ष से जुड़े विभिन्न पक्षों के दृष्टिकोणों को खंगालना आवश्यक है।

यह कहानी यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच संघर्ष की है। यूरोप में हुए उत्पीड़न से बचने के लिए यहूदियों ने योजनाबद्ध ढ़ंग से फिलिस्तीन में प्रवेश किया और ब्रिटेन तथा अमेरिका की मदद से वहां स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में इजरायल की स्थापना की। अब इजरायल अपने अस्तित्व का हवाला देकर फिलिस्तीनियों और पड़ौसी देशों पर आक्रामक रुख अपनाते हुए ‘ग्रेटर इजरायल’ बनाने और क्षेत्रीय भू-राजनीति पर प्रभुत्व स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

ऐतिहासिक रूप से लंबे समय तक यहूदियों के पास अपना कोई स्वतंत्र राष्ट्र नहीं था। 19 वीं सदी के उत्तरार्ध तक उनकी एक करोड़ से थोड़ी अधिक वैश्विक आबादी मुख्य रूप से यूरोप में बसी हुई थी, जहां उन्हें भेदभाव, हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। इस दमन के पीछे सदियों पुराने धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक कारण थे, जिन्हें ‘यहूदी-विरोध’ (एन्टीसेमिटिस्म) कहा जाता है।

ईसाई समुदाय में यह धारणा थी कि ईसा मसीह की मृत्यु के लिए यहूदी जिम्मेदार थे, जिसके कारण उन्हें ‘ईश्वर के हत्यारे’ माना जाता था। भूमि स्वामित्व और कई प्रतिष्ठित पेशों पर लगे प्रतिबंधों के कारण उन्हें व्यापार, बैंकिंग और सूदखोरी जैसे क्षेत्रों की ओर रुख करना पड़ा। इसी व्यावसायिक संलिप्तता के कारण उन पर समाज के शोषण के आरोप भी लगाये गए।

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अपनी विशिष्ट जीवनशैली और धार्मिक परंपराओं के कारण उन्हें मुख्य शहरों से अलग, तंग और गंदी बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया गया, जिन्हें ‘घेटो’ कहा जाता था।

19 वीं सदी के अंत में यूरोप में बढ़ते ‘एन्टीसेमिटिस्म’ के कारण एक ओर जहां यहूदी आबादी का एक बड़ा हिस्सा तेजी से अमेरिका की ओर पलायन कर रहा था, वहीं दूसरी ओर एक स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र की मांग ने भी जोर पकड़ लिया था। इस वैचारिक आंदोलन को ‘जियोनिज़्म’ कहा गया। इसके समर्थकों का मानना था कि दो हजार साल पहले यहूदी ‘फिलिस्तीन’ में निवास करते थे और उनकी सबसे पवित्र नगरी ‘यरुशलम’ भी इसी क्षेत्र में स्थित थी, अतः ऐतिहासिक और धार्मिक आधार पर फिलिस्तीन उनकी प्राचीन ‘पितृ-भूमि’ है।

‘जियोनिज़्म’ के विचार से प्रेरित होकर 20 वीं सदी की प्रारंभ में यहूदियों का फिलिस्तीन की ओर प्रवास बढ़ने लगा। इस दौरान अनेक यहूदी प्रवासियों ने वहां भूमि खरीदकर बसना शुरू किया। यहूदियों की बसाहट और उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करने में संपन्न रॉथ्सचाइल्ड परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

फिलिस्तीन ऐतिहासिक रूप से विभिन्न साम्राज्यों के अधीन रहा है। यहां सदियों से अरब निवास करते रहे हैं जिनका जीवन मुख्यत: कृषि, स्थानीय व्यापार और सामुदायिक संबंधों पर आधारित था। भूमि और स्थानीय संसाधन उनकी पहचान और आजीविका का केंद्र थे। यरुशलम स्थित ‘अल-अक्सा मस्जिद’ इस्लाम का तीसरा सर्वाधिक पवित्र स्थान है। कई शताब्दियों तक यह क्षेत्र ‘उस्मानी साम्राज्य’ (ऑटोमन एम्पायर) के अधीन रहा है। 

‘प्रथम विश्वयुद्ध’ (1914–1918) के दौरान मध्य-पूर्व में ‘ऑटोमन साम्राज्य’ को पराजित करने और क्षेत्र में अपने सामरिक हितों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ब्रिटेन यहूदी समुदाय का समर्थन चाहता था। इसी संदर्भ में 1917 में ब्रिटेन के विदेश मंत्री आर्थर जेम्स बालफोर ने लॉर्ड वॉल्टर रॉथ्सचाइल्ड को पत्र भेजा था, जिसे ‘बालफोर घोषणा’ कहा जाता है, जिसमें फिलिस्तीन में यहूदियों के लिये ‘राष्ट्रीय घर’ की स्थापना के प्रति समर्थन व्यक्त किया गया था। इस घोषणा ने इजरायल राज्य की नींव रखी।

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‘प्रथम विश्वयुद्ध’ के बाद ब्रिटेन को फिलिस्तीन पर ‘मेंडेट’ (1922) मिला, जिससे वह इस क्षेत्र का प्रशासनिक नियंत्रक बन गया। इसके तहत 1920 से 1947 के दौरान यूरोप से बडी संख्या में यहूदी प्रवासी फिलिस्तीन में आकर बसते गए और उनकी संख्या बढ़ती गई। इससे जनसंख्या संतुलन और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं।

फिलिस्तीनियों के बीच राजनीतिक चेतना विकसित हुई और उन्होंने ब्रिटिश नीतियों तथा बढ़ती यहूदी बसावट के खिलाफ संगठित विरोध शुरु किया। 1936-1939 का ‘अरब विद्रोह’ इस असंतोष का प्रमुख उदाहरण था, जिसमें उन्होंने आत्मनिर्णय का अधिकार और अपनी भूमि की सुरक्षा की मांग की।

ब्रिटेन ने इस विद्रोह को बेहद कठोरता से कुचल दिया। हजारों फिलिस्तीनी मारे गए, सैकड़ों को फांसी दी गई, गांवों को नष्ट किया गया और अरब नेतृत्व को गिरफ्तार या निर्वासित कर दिया गया। इस दमन ने फिलिस्तीनी समाज को गहरे आघात पहुंचाए और उनके सशस्त्र प्रतिरोध की क्षमता को कई वर्षों के लिए कमजोर कर दिया।

‘द्वितीय विश्वयुद्ध’ के दौरान (1939-1945) हिटलर के नाजी जर्मनी द्वारा लगभग 60 लाख यहूदियों का नरसंहार (होलोकास्ट) किया गया। इस त्रासदी ने वैश्विक स्तर पर यहूदियों के प्रति गहरी सहानुभूति पैदा की और यहूदियों के लिए एक सुरक्षित ‘राष्ट्रीय गृह’ की मांग को और मजबूत कर दिया।

बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन ने फिलिस्तीन का मुद्दा नवगठित ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ को सौंप दिया जिसने 1947 में ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ लागू कर फिलिस्तीन की भूमि को अरबों और यहूदियों के लिये दो हिस्सों में बांटने का ‘प्रस्ताव 181’ पारित किया। 1. यहूदी राज्य और 2. अरब राज्य 3. यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर का दर्जा दिया गया, जो इस्लाम, ईसाई और यहूदी तीनों धर्मों के लिए पवित्र स्थल है।

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यहूदी नेतृत्व ने इस योजना को स्वीकार किया, जबकि अरब देशों और फिलिस्तीनियों ने इसे अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि यह प्रस्ताव पक्षपाती है और उनकी बहुसंख्यक आबादी की इच्छा के विरुद्ध उनकी भूमि का बंटवारा करता है। उनका मानना था कि वे लंबे समय से इस क्षेत्र में निवास करते आए हैं, लेकिन उनके ऐतिहासिक और सामाजिक दावों को नजरअंदाज किया गया है।

‘द्वितीय विश्वयुद्ध’ के बाद लाखों की संख्या में आए यहूदी शरणार्थी फिलिस्तीन पहुंचे। यहूदियों का जर्मनी से पलायन एक सोची-समझी रणनीति और मजबूरी दोनों का परिणाम था। इसे ‘आलिया’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है अपनी पवित्र भूमि की ओर लौटना। उनके लिए फिलिस्तीन केवल एक शरण स्थान नहीं, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र स्थापित करने का लक्ष्य बन गया था। इस बीच, स्थानीय अरब आबादी में अपने राजनीतिक अधिकारों और भूमि को लेकर चिंता बढ़ती गई।  

ब्रिटेन द्वारा ‘राष्ट्रीय घर’ का समर्थन, ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ द्वारा फिलिस्तीन को दो राष्ट्रों में बांटने का प्रस्ताव और उसके बाद की ब्रिटेन की औपनिवेशिक नीतियों में इजरायल और फिलिस्तीन संघर्ष की जड़ें देखी जाती हैं। ब्रिटेन की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने फिलिस्तीन को हमेशा के लिये संघर्ष में झोंक दिया। यही कारण है कि यह भूमि आज दुनिया के सबसे जटिल संघर्षों का केंद्र बन गई है। (सप्रेस)

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