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पंचायत राज : विकेंद्रीकरण का सपना या जमीनी हकीकत से भटका तंत्र?

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भारत में 73वें संविधान संशोधन के जरिए मजबूत की गई पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ग्राम स्तर पर लोकतंत्र, विकास और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। लेकिन 33 वर्षों बाद भी यह व्यवस्था अपनी मूल भावना से भटकती दिख रही है। राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और प्रशिक्षण की कमी ने इसे कमजोर किया है, जिससे “पंच परमेश्वर” की अवधारणा लगभग खत्म होती नजर आती है।


पंचायत राज दिवस (24 अप्रैल)

डॉ. परशुराम तिवारी

भारत में वर्तमान पंचायत राज व्यवस्था ग्रामीण स्वशासन की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, जिसे 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। यह संशोधन 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ, जिसका उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण और ग्राम स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी को सशक्त बनाना भी था।

हमारी प्राचीन न्याय व्यवस्था में गाँव या कबीले के लोग मिलकर अनुभवी एवं समझदार व्यक्तियों की पंचायत लगाकर अपने आंतरिक विवादों का समाधान करते थे। लोकतांत्रिक व्यवस्था आने के बाद भी इस परंपरा के कुछ अवशेष आज भी दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं। इन पंचायतों के निर्णय इस भावना से प्रेरित होते थे कि सदस्य समदर्शी दृष्टि से विचार करें, उनका मन, वचन और निश्चय एक समान हो, जिससे समाज में समरसता और सुख-शांति बनी रहे।

इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रसिद्ध कहानी “पंच परमेश्वर” में पंचों को न्याय और धर्म का प्रतीक माना और उन्हें परमेश्वर की उपमा दी।

आजादी के बाद कई उतार-चढ़ावों के पश्चात 33 वर्ष पूर्व 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायत राज अधिनियम लागू किया गया। इसका उद्देश्य था—ग्राम स्तर पर सुशासन स्थापित करना, महिलाओं एवं कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व देना, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना तथा समग्र विकास और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना।

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किन्तु इन 33 वर्षों में यह व्यवस्था अपनी मूल भावना से भटकती हुई प्रतीत होती है। अपेक्षा थी कि गैर-दलीय जनप्रतिनिधि—पंच, सरपंच, जनपद एवं जिला पंचायत सदस्य—विकास के नए प्रतिमान स्थापित करेंगे और लोकतंत्र की स्वच्छ नर्सरी बनेंगे, जो आगे चलकर विधानसभाओं और संसद को सशक्त एवं ईमानदार नेतृत्व देंगे।

परंतु आज स्थिति इसके विपरीत दिखती है। पंचायत प्रतिनिधि केवल भ्रष्ट विधायक, सांसद और मंत्रियों को अपना आदर्श मानते हैं। यही कारण है कि अधिकांश पंचायतें राजनीतिक, सामाजिक दुश्मनी और आर्थिक अनियमितताओं के अड्डे बन कर रह गयी हैं।

क्या है पंचायत राज व्यवस्था?

भारत में पंचायत राज व्यवस्था जमीनी लोकतंत्र को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यह त्रिस्तरीय संरचना पर आधारित है- निचले (ग्राम) स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्यम स्तर (ब्लॉक) पर जनपद पंचायत एवं जिला स्तर पर जिला परिषद। इस व्यवस्था की विशेषता है कि सभी स्तरों पर महिलाओं तथा अनुसूचित जाति/जनजाति सहित कमजोर वर्गों के लिए 50 प्रतिशत तक आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।

इस व्यवस्था की विशेषता है कि सभी स्तरों पर महिलाओं तथा अनुसूचित जाति/जनजाति सहित कमजोर वर्गों के लिए 50 प्रतिशत तक आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।

ग्राम सभा, जिसमें गाँव के सभी मतदाता शामिल होते हैं, पंचायत की योजनाओं के निर्माण, अनुमोदन, सामाजिक लेखा-जोखा (सोशल ऑडिट) और निगरानी की जिम्मेदारी निभाती है। पंचायतों को 29 विषयों पर कार्य करने का अधिकार दिया गया है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) तथा भारत सरकार की विकास प्राथमिकताओं के 9 विषय शामिल हैं।

इन पंचायतों के सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान, राज्य स्तर पर पंचायत राज संचालनालय, राज्य ग्रामीण विकास संस्थान तथा विभिन्न प्रशिक्षण संस्थान कार्यरत हैं। साथ ही, केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं तथा वित्त आयोगों के माध्यम से पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। कुल मिलाकर, व्यवस्थाओं और संसाधनों की दृष्टि से पंचायतों में कोई विशेष कमी नहीं है।

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पंचायत राज व्यवस्था की प्रमुख खामियाँ

ग्राम विकास, खुशहाली और आत्मनिर्भरता के लिए कुशल जनशक्ति का निर्माण अनिवार्य है। इसी उद्देश्य से पंचायतों को 29 विषयों पर कार्य सौंपे गए थे—जैसे कृषि विस्तार, भूमि सुधार, जल प्रबंधन, लघु एवं कुटीर उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, सामाजिक वानिकी, पेयजल, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता आदि।

किन्तु विशेषकर मप्र के सन्दर्भ में जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक है। ग्राम भ्रमण और प्रशिक्षण के दौरान बार-बार यह अनुभव हुआ कि अधिकांश पुरुष पंच या सरपंच को इन 29 विषयों में से मुश्किल से 5–10 विषयों की ही जानकारी होती है, और वे विषय भी प्रायः ठेकेदारी से जुड़े होते हैं।

महिला प्रतिनिधियों की स्थिति इससे भी अधिक दयनीय है। वे न तो पर्याप्त रूप से बैठकों में भाग ले पाती हैं और न ही निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा पाती हैं। कई स्थानों पर उनकी भूमिका केवल निर्णयों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित होती है। असल में निर्णय उनके पति या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा लिए जाते हैं। एक तथ्य यह भी है कि पंचायत व्यवस्था का पर अब तीन ताकतों का नियंत्रण हो गया है- सरपंच या शक्तिशली व्यक्ति, पंचायत सचिव और सीईओ है। जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ सत्ता दल के ऊपरी राजनीतिक नेतृत्व का हस्तक्षेप है। इस तरह पंचायत व्यवस्था में अब “पंच परमेश्वर” की भावना लगभग समाप्त हो चुकी है। पंचायत प्रतिनिधियों का ध्यान ग्राम स्वराज या समग्र विकास के बजाय ठेकेदारी और आर्थिक लाभ तक सीमित होता जा रहा है।

क्या सुधार आवश्यक हैं?

विगत 33 वर्ष में अरबों रूपये खर्च करके भी भारत सरकार के निर्धारित मापदंडों के अनुसार अब तक मप्र में राज्य की लगभग 23 हजार में से एक भी आदर्श ग्राम पंचायत या सांसद ग्राम नहीं बना सकी है। आत्मनिर्भर और खुशहाल पंचायत की तो चर्चा ही व्यर्थ है।       

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यदि पंचायत राज व्यवस्था वापस पटरी पर लाना है तो सरकार और नागरिक समाज को फिर से ईमानदार प्रयास करना होंगे। इस हेतु कुछ सुधार तत्काल आवश्यक हैं जिनमें पंचायत प्रतिनिधियों का उचित प्रक्रिया से वर्षिक आधार पर प्रशिक्षण सपोर्ट एवं निगरानी में दक्ष स्वयं सेवी संस्थाओं की भागीदारी और जिम्मेदारी तय होना, महिला पंचायत प्रतिनिधियों के लिए पृथक से प्रशिक्षण आयोजित करना, सचिव और सीईओ के गठजोड़ की सर्जरी, प्रशासनिक नियत्रण कम करना, कामकाज में राजनीतिक दखल की समाप्ति,  पंचायतों के स्वयं के राजस्व के स्रोत बढ़ाना, केंद्र और राज्य स्तर से समय पर बजट/ अनुदान राशि का आवंटन, सभी कार्यों में ग्राम सभा के उचित आयोजन द्वारा सामुदायिक सहभागिता पारदर्शिता बढ़ाना, नवाचारों द्वारा मानव विकास सूचकांकों पर विशेष ध्यान केन्द्रित करना आदि विशेष रूप से शामिल हैं।        

आज आवश्यकता है कि सरकार और नागरिक समाज मिलकर ईमानदारी से प्रयास करें, ताकि पंचायतें पुनः “पंच परमेश्वर” की भावना के साथ कार्य कर सकें और ग्रामीण भारत के सशक्त, आत्मनिर्भर और समरस विकास का आधार बन सकें।

डॉ. परशुराम तिवारी पंचायत राज विषय के शोधार्थी एवं प्रशिक्षक हैं।

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