अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर उठे सवाल अब राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुके हैं। स्वतः संज्ञान याचिका के तहत यह मुद्दा उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, जहां 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर क्षेत्र सीमित करने पर विवाद गहरा गया है। खनन हितों और पर्यावरण संरक्षण के बीच टकराव ने अरावली की सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
स्वतः संज्ञान याचिका संख्या (ई) न. 10, वर्ष 2025 में अरावली की परिभाषा क्यों, कैसे बनायी जाए? यह सब अरावली के लोग जानना चाहते हैं। माननीय मुख्य न्यायाधीश जो अब इस मामले का खुलासा करेंगे तो भारत का बड़ा हित होगा। मुख्य न्यायाधीश देश को जरूर बताएंगे कि हमारा उच्चतम न्यायालय 1991 से लेकर 2024 तक सदैव अरावली को भारत की प्राचीनतम विरासत मानकर बचाता रहा है।
नवंबर 2025 से रेयर मिनरल की चर्चा भी बहुत जोर पकड़ रही थी। किसी खास उद्योगपति के हित हेतु 100 मीटर ऊंची अरावली को परिभाषा अचानक क्यों स्वीकार कर ली गई है, जबकि भारत का भू सर्वेक्षण और वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट इस परिभाषा के विरुद्ध थी। अरावली के 125 जिलों में से केवल 38 जिलों को ही अरावली के जिले माना गया। 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर केवल 8 प्रतिशत से भी कम अरावली क्षेत्र ही बचेगा। इसके लिए ऐसा भयानक एफिडेविट सरकार की तरफ से प्रस्तुत करने वाले दंडित किया जाना चाहिए।
भारत के वन सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार अरावली पर्वत श्रृंखला के पूर्णतः, आधे या कुछ कम हिस्से वाले 125 जिले हैं। इनमें से भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने कुल 65 जिलों को ही माना है। इनमें से भी केवल 38 जिलों को ही अरावली के जिले माना गया है। ऐसा वन एवं पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार क्यों कर रहा है, यह समझ से बाहर है। भरतपुर में खनन चलवाना है, उसे अरावली से बाहर कर दिया गया है। ऐसा ही कई जगह देखने को मिल रही है। जहां विरोध की आवाजें हैं, उन्हें दबाया गया है। लेकिन अब धीरे-धीरे आवाजें उठने की तैयारी हो रही है। उच्चतम न्यायालय ने एक बार जनता को आश्वस्त किया है। अब बहुत धीमी गति से काम चालू है।
20 अप्रैल 2026 को तारीख लगी थी। ढाई बजे समाचार दिया गया कि यह बेंच तीन जजों की उपस्थिति में ही सुनेगी, जबकि वर्तमान में दो ही जज हैं, इसलिए आगे की तारीख दी जाएगी। खदानें उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवमानना करते हुए कुछ जगह चालू हैं, कुछ ही बंद हुई हैं। यह बेंच वर्तमान मुख्य न्यायाधीश द्वारा सुनकर अरावली विरासत को बचाने का उचित निर्णय देगी, ऐसी आशा है। अरावली का बचना भारत की विरासत, संस्कृति और प्रकृति को बचाने जैसा महान कार्य है। पूरी अरावली तीर्थों, मंदिरों, पीर, मस्जिद, दरगाह, गुरुद्वारों और गिरजाघरों से भरी हुई पर्वत श्रृंखला है। यह हिंदू, सिख, ईसाई, मुसलमान, जैन और बौद्ध सभी की प्राचीन तीर्थस्थली रही है।
आजकल अरावली भी तीर्थ से हटकर पर्यटन केंद्र बनती जा रही है। प्राचीन तीर्थ अब नए पर्यटन रूप में दिखाई देने लगे हैं। धर्म का व्यापारीकरण यहां अभी अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है, और यहां के तीर्थ आज भी अपने मूल स्वरूप में दिखाई देते हैं। ये तीर्थ अरावली की चौदह प्राचीन सभ्यताओं के केंद्र रहे हैं। अब खनन के कारण इन सभ्यताओं का भविष्य अनिश्चित है।
भारत को अपनी प्रकृति और संस्कृति की चिंता करते हुए अरावली में खनन पर पूर्ण रोक लगानी चाहिए। भले ही हम पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बन जाएं, लेकिन हमारी प्रकृति और संस्कृति का क्या होगा? पर्यावरण की रक्षा कैसे होगी?
अरावली का खनन भारतीय आस्था और पर्यावरण पर सबसे बड़ा संकट है। वर्तमान में सरकार संस्कृति और प्रकृति के समन्वय का स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं अपना रही है और न ही मानचित्र तैयार करने का विचार कर रही है। जबकि भारतीय परंपरा में पर्यावरण और आस्था का गहरा संबंध है। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारों में सभी के कल्याण हो, सद्भावना की कामना की जाती है, लेकिन व्यवहार में इसका समुचित पालन नहीं दिखता। सम्पूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक आस्था का दर्शन नहीं होता है।
सरकार ने अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक आस्था को भुला दिया है, जिसके कारण अरावली में खनन का तांडव जारी है। जबकि उच्चतम न्यायालय ने अरावली में नए खनन पर रोक लगा रखी है, फिर भी वैध और अवैध दोनों प्रकार का खनन जारी है। इससे स्पष्ट है कि उद्देश्य अरावली को बचाना नहीं, बल्कि खनन को बढ़ावा देना है।
खनन के लिए ही अरावली के क्षेत्र को अरावली से अलग किया जा रहा है। यह ध्यान रखने योग्य है कि अरावली को खनन मुक्त बनाने का कार्य 1985 में जल, जंगल, जमीन संरक्षण अभियान के तहत तरुण भारत संघ द्वारा स्थानीय जन आंदोलन के माध्यम से शुरू किया गया था। उन्नीस सौ इक्यानवे में उच्चतम न्यायालय में याचिका संख्या 509/91 केस के माध्यम से इस विषय को उठाया गया। इसके बाद समय-समय पर न्यायालय ने अरावली संरक्षण के पक्ष में निर्णय दिए। पहले सरिस्का, फिर अलवर, गुड़गांव और बाद में संपूर्ण अरावली क्षेत्र में खनन रोकने के प्रयास किए गए और कानून राजपि़त्रत किए गए। प्रत्यक्ष निरीक्षण के माध्यम से वैध और अवैध खनन को बंद कराया गया। आज भी यह प्रयास जारी है।
अब अरावली के क्षेत्र को कम करने का सरकारी षड्यंत्र सामने आ रहा है। भारत का वन सर्वेक्षण विभाग और भू सर्वेक्षण विभाग को आमने-सामने लाकर बाद में सहमति बनाई गई। अरावली के कुल 8 प्रतिशत क्षेत्र को ही मान्यता देने के लिए 100 मीटर ऊंचाई का सिद्धांत लागू कराया गया। इस संबंध में तैयार शपथ पत्र की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठे हैं कि, यह एफिडेविट कैसे तैयार किया गया? उच्चतम न्यायालय कैसे इस तरह के एफिडेविट को मान सकता है? उच्चतम न्यायालय इस प्रक्रिया की जांच कराए, अपराधियों को दंडित करे, ऐसा विश्वास है।
हमें अपनी न्यायपालिका पर भरोसा रखना चाहिए। अरावली क्षेत्र को कम करने के पीछे क्या षड्यंत्र है, इसका खुलासा होना आवश्यक है। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश इस दिशा में कार्य कर रहे होंगे और अरावली से जुड़े अपराधी दंडित होंगे; ऐसा विश्वास है।


