संकट के मुहाने पर खड़ी पृथ्वी

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22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। विकास और उपभोग की अंधी दौड़ के बीच पृथ्वी अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है—जलवायु परिवर्तन, जल संकट, प्रदूषण और घटती जैव विविधता इसके स्पष्ट संकेत हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अब भी संतुलित और जिम्मेदार जीवनशैली नहीं अपनाई गई, तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को प्रभावित कर सकता है।


22 अप्रैल विश्व पृथ्वी दिवस

संध्‍या राजपुरोहित

22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस हर वर्ष हमें एक ठहराव देता है सोचने का, समझने का और स्वयं से प्रश्न करने का। यह दिन मानो हमसे पूछता है कि जिस पृथ्वी ने हमें जन्म दिया, पाला-पोसा और अपने संसाधनों से जीवन को संभव बनाया, क्या हम उसके प्रति उतने ही संवेदनशील और उत्तरदायी हैं? आज जब हम विकास, आधुनिकता और उपभोग की चमक में डूबे हुए हैं, उसी समय पृथ्वी चुपचाप अपने भीतर एक गहरा संकट समेटे हुए है। यह संकट अब दूर का कोई खतरा नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान का यथार्थ बन चुका है।

पृथ्वी पर जीवन की यह सुंदर संरचना, जो करोड़ों वर्षों में विकसित हुई, आज कुछ ही दशकों में असंतुलन की कगार पर खड़ी दिखाई देती है। इसका सबसे बड़ा कारण है मानव की अनियंत्रित विकास यात्रा, जिसमें प्रकृति को संसाधन मानकर उसका दोहन किया गया, न कि सहचर मानकर उसके साथ संतुलन बनाया गया। परिणामस्वरूप आज हम ऐसे दौर में खड़े हैं, जहाँ प्रकृति का धैर्य जवाब देने लगा है और उसके संकेत पहले से अधिक स्पष्ट और तीखे होते जा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन इस संकट का सबसे व्यापक और चिंताजनक रूप है। जलवायु परिवर्तन केवल एक वैज्ञानिक शब्द नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है। जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर – सरकारी पैनल की रिपोर्टों के अनुसार, पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक काल से अब तक लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। यह वृद्धि भले ही मामूली प्रतीत हो, किंतु इसके परिणाम भयावह हैं। पहाड़ों पर जमी बर्फ का पिघलना, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, शहरों में झुलसाती गर्मी और गाँवों में सूखते खेत ये सब उसी परिवर्तन के संकेत हैं।

भारत में बीते कुछ वर्षों में तापमान के नए रिकॉर्ड, असमय वर्षा और बार-बार आने वाली बाढ़-सूखे की स्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की समस्या है। किसान, जो धरती के सबसे करीब होता है, इस बदलाव को सबसे पहले और सबसे गहराई से महसूस करता है। उसके खेतों में उगती फसलें अब मौसम की अनिश्चितताओं के भरोसे हैं, जो कभी भी उसका श्रम और उम्मीद दोनों छीन सकती हैं।

वनों का क्षरण इस संकट को और अधिक गहरा कर रहा है। जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन का आधार हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, हर वर्ष लगभग एक करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो रहा है। यह आँकड़ा केवल भूमि के नुकसान का नहीं, बल्कि उन असंख्य जीवों के घर उजड़ने का है, जिनका अस्तित्व इन वनों पर निर्भर है। प्रकृति के लिए विश्वव्यापी कोष  की “लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2022” बताती है कि 1970 के बाद से वन्यजीवों की संख्या में औसतन 69 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह गिरावट केवल जैव विविधता का संकट नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक संतुलन के टूटने का संकेत है, जिस पर मानव जीवन भी टिका हुआ है।

जल संकट भी एक ऐसी चुनौती बनकर उभर रहा है, जिसे अब नजरअंदाज करना संभव नहीं। संयुक्‍त राष्‍ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की दो अरब से अधिक आबादी को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है, जहाँ कई शहर और गाँव धीरे-धीरे जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं। नदियाँ सिकुड़ रही हैं, भूजल स्तर गिरता जा रहा है और वर्षा का स्वरूप अनिश्चित होता जा रहा है। पानी, जो कभी जीवन का सहज हिस्सा था, अब संघर्ष का कारण बनता जा रहा है।

प्रदूषण इस पूरी स्थिति को और अधिक जटिल बना देता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर वर्ष लगभग 70 लाख लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण होती है। यह आँकड़ा बताता है कि हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वही हमारे लिए खतरा बन चुकी है। जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे का बढ़ता अंबार पृथ्वी को धीरे-धीरे बीमार बना रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, हर वर्ष करोड़ों टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुँचता है, जिससे समुद्री जीवन पर गहरा संकट उत्पन्न हो रहा है।

इन सभी समस्याओं की जड़ में यदि कोई एक तत्व है, तो वह है मानव की बढ़ती आवश्यकताएँ और अनियंत्रित उपभोग। विश्व की जनसंख्या 8 अरब से अधिक हो चुकी है और इसके साथ ही संसाधनों पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का अनुमान है कि यदि संसाधनों का संतुलित उपयोग नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह असंतुलन और गंभीर हो सकता है।

इस पूरी परिस्थिति का सबसे अधिक प्रभाव उन समुदायों पर पड़ता है, जो प्रकृति के साथ सहअस्तित्व में जीवन जीते हैं विशेष रूप से आदिवासी समाज। उनके लिए जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और पहचान का आधार हैं। जब जंगल कटते हैं, तो केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि उनके साथ एक संपूर्ण जीवन पद्धति भी बिखर जाती है।

इन गंभीर चुनौतियों के बीच आशा की किरण भी मौजूद है। समाधान असंभव नहीं है, बशर्ते हम अपनी सोच में परिवर्तन लाएँ। सतत विकास की दिशा में उठाए गए छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। जब हम ऊर्जा की बचत करते हैं, पानी को सहेजते हैं, पेड़ लगाते हैं या प्लास्टिक के उपयोग को कम करते हैं, तो हम केवल एक आदत नहीं बदलते, बल्कि पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित बनाने में योगदान देते हैं।

सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की नीतियाँ तभी प्रभावी होंगी, जब आम नागरिक उनका हिस्सा बनेंगे। पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों का विषय नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनना चाहिए। अंततः, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि पृथ्वी कोई बाहरी तत्व नहीं, बल्कि हमारा अपना विस्तार है। यदि यह बीमार होगी, तो हम स्वस्थ नहीं रह सकते। अभी भी समय है अपने कदमों को रोककर, अपनी दिशा को बदलने का।

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